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रीतिका खेड़ा का कॉलम:टीके पर शुरुआत से परेशानी कायम, यह सरकार की वैक्सीन नीति पर भी सवाल

5 महीने पहले
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रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री - Dainik Bhaskar
रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री

वैक्सीन की कमी की आशंकाएं मार्च के पहले सप्ताह में ही उभरने लगी थीं। मार्च में ही सरकार ने प्राथमिकता श्रेणी का दायरा बढ़ा दिया- पहले फ्रंट लाइन वर्कर्स, इसके बाद 60 साल से ज्यादा उम्र के लोग, जिन्हें और बीमारियां हैं, जिससे उनके लिए कोविड जानलेवा होने की आशंका ज्यादा है। फिर सभी 60 साल से ज्यादा, फिर 45 साल से ज्यादा उम्र के लोग, इत्यादि।

तब सरकार का दावा था कि वैक्सीन की कमी नहीं है। कोविड की दूसरी लहर के संकेत थे, लेकिन सरकार और जनता का ध्यान राज्य में चुनावों और कुंभ मेले पर था। लोगों के मन में टीके को लेकर सवाल भी थे, जिसकी वजह से पात्र होने के बावजूद टीका लगवाने से हिचकिचा रहे थे। तब आवाज उठी कि 18 से ज्यादा उम्र को भी टीका लगवाने की अनुमति हो।

ऐसी मांग मानना तब जायज़ था, जब टीकों की सप्लाई की कमी न हो। अप्रैल में दूसरी लहर व्यापक रूप से फैल गई। यह भी स्पष्ट हुआ कि केंद्र सरकार ने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया को कोवीशील्ड का केवल 11 करोड़ वैक्सीन का ऑर्डर दिया है, जिससे देश की 4% आबादी को ही टीका मिल सकता है।

केंद्र सरकार ने हड़बड़ाहट में ‘उपाय’ खोज निकाला
सब राज्य वैक्सीन की सप्लाई का बंदोबस्त खुद कर लें। 21 अप्रैल को केंद्र सरकार ने ऐलान किया कि नए नियमों के अनुसार 18 साल से ज्यादा उम्र के लोग टीका लगवा सकते हैं। साथ ही, उन्होंने वैक्सीन बनाने वाली दोनों कंपनियों को छूट दी कि वे राज्यों और निजी अस्पतालों के साथ अपनी मर्ज़ी से कीमत तय कर खुद समझौता कर लें।

राज्यों को पहले यह आश्वासन था कि केंद्र वैक्सीन उपलब्ध करवाएगा और उन्हें इसे लोगों तक पहुंचाने का काम करना है। यकायक उन्हें कहा गया कि टीके का बंदोबस्त भी खुद कर लें। अमेरिका जैसे पूंजीवादी देश में भी ऐसा नहीं हुआ।

ऐसी स्थिति क्यों हुई?
18-45 उम्र वर्ग के लिए कई राज्यों में टीके नहीं हैं तो उनके लिए टीकाकरण बंद हो रहा है। कई राज्यों में 45 से ऊपर के लोगों के लिए कोवैक्सिन की दूसरी खुराक समय पर मिलने में मुश्किल हो रही है। जब देश की आबादी 130 करोड़ है और केंद्र के बजट में रु. 35,000 करोड़ वैक्सीन के लिए रखे गए थे तो केंद्र की तरफ से अप्रैल तक केवल 11 करोड़ वैक्सीन का ऑर्डर क्यों गया?

क्या सरकार समझ बैठी थी, जैसा प्रधानमंत्री ने जनवरी के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के भाषण में कहा, कि कोरोना देश से ख़त्म हो गया है? क्या सरकार सोच रही थी कि इतनी ज़्यादा आबादी को कोरोना हो चुका है कि अब ‘हर्ड इम्युनिटी’ आ चुकी है? या वैसे भी कई लोगों में टीके को लेकर भय है तो टीकों की जरूरत ही नहीं होगी?

खैर, जो भी गलतियां हुईं, सरकार की आगे की रणनीति क्या है? क्या होनी चाहिए? विशेषज्ञों ने कई सुझाव दिए हैं। कोवैक्सिन (जिसे बनाने में सरकारी संस्थानों का भी हाथ है) बनाने की पद्धति देश की अन्य कंपनियों से साझा हो ताकि सप्लाई जल्द बढ़ा जा सकें। नई नीति लागू हुए एक महीने से ऊपर हो चुका है।

भारत के राज्य वैक्सीन खरीदने की होड़ में हैं। लेकिन अब तक एक भी राज्य किसी बाहरी कंपनी से समझौता करने में कामयाब नहीं हुआ। 19 अप्रैल से पहले जो वैक्सीन आपूर्ति की नीति थी, जिसके अनुसार केंद्र सरकार 150 रुपए में कंपनी से खरीदकर राज्यों को उपलब्ध करवा रही थी, वापस लागू होना ज़रूरी है।

जब तक वैक्सीन की सप्लाई नहीं बढ़ती तब तक सरकार को फिर से टीका लगाने में प्राथमिकताओं वाली राह पर चलना होगा ताकि जिन्हें कोरोना से ज्यादा खतरा है, उन्हें पहले सुरक्षित किया जाए। विशेषज्ञों से यह राय भी लेना जरूरी है कि कोरोना से बचाव के लिए कौन-सा रास्ता सबसे कारगर होगा: उदाहरण के लिए, क्या ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को पहला टीका दिया जाए या जिन लोगों को दोनों डोज़ मिलें, उनकी संख्या बढ़ाई जाए?
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)