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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:एक-दूसरे के प्रति कृतज्ञ हो जाने से सद्‌भाव फैलता है

12 दिन पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

अच्छी आदतें, व्यवहार, विचार और वाणी का भी संक्रमण होता है। राम वही कर रहे थे। अयोध्या आने पर सखाओं को बुलाकर अपने गुरु वशिष्ठजी से भेंट करवाई। राम के सखा में वानर थे, विभीषण और उनकी सेना के प्रमुख लोग थे। वानर नहीं जानते थे कि राजमहल में धर्मसत्ता के प्रमुख लोगों से कैसे व्यवहार किया जाए, तो राम ने उन्हें सिखाया। लेकिन उसी समय राम को लगा कि गुरु वशिष्ठजी के मन में अभी भी वानरों को लेकर कुछ अलग भाव है तो तुरंत अपने सखाओं का परिचय दिया- ‘ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे।

भए समर सागर कहं बेरे।’ मुनि सुनिए, ये सब मेरे सखा हैं। ये संग्राम रूपी समुद्र में मेरे लिए बेड़े यानी जहाज के समान हुए। मेरे हित के लिए इन्होंने जन्म तक हार दिए यानी प्राण दे दिए। ये मुझे भरत से भी अधिक प्रिय हैं। यह बात राम इसलिए बोल रहे थे कि अगर किसी ने किसी के लिए कुछ किया है तो कम से कम आभार तो लौटाया ही जाए।

राम इस आदत को समाज में उतारना चाहते हैं कि यदि हम एक-दूसरे के प्रति कृतज्ञ हो जाएं और ये भावना सबमें फैल जाए कि यदि थोड़ा-सा भी काम किसी ने हमारे लिए किया है तो हम तुरंत उसका आभार व्यक्त करें या उसके लिए कुछ करें। इससे समाज में सद्भाव फैलता है। एक-दूसरे की मदद करने की वृत्ति को प्रोत्साहन मिलता है।