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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:पुरुष की जिम्मेदारी है कि वह माता-बहनों के साथ अतिरिक्त रूप से पवित्र दृष्टि से व्यवहार करे

13 दिन पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

भारत के परिवारों में लंबे समय बाद एक दृश्य देखने में आया कि एक छत के नीचे रहने वाले लोग भी अपने आपको अकेला महसूस करने लगे। साथ रहने वाले लोग यात्री जैसे हो गए। रिश्ते सौदा बनकर रह गए। परिवार में एक-दूसरे के शोषण का इंतजाम कर लिया गया। कई सदस्यों को तो लगता है हम साथ हैं भी तो स्वार्थ के लिए। इसीलिए लोग घरों से बाहर निकले।

खासकर माता-बहनें जब काम करने निकलीं तो उसके दो बड़े कारण थे- आर्थिक व्यवस्था और अकेलापन। महिलाएं घर से बाहर तो निकल गईं, लेकिन उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ। आंकड़े बताते हैं कार्यस्थल पर यौन शोषण की घटनाएं बढ़ती गईं। जिस भी स्त्री के साथ इस तरह की घटना घटती है, स्मृतियों का विष उन्हें जीते-जी मार डालता है। केवल स्त्री ही ऐसी होती है कि जिसकी देह के साथ दुर्व्यवहार किया जाए तो उसकी अस्मत पर भी प्रहार होता है।

पुरुष इस मामले में बचा हुआ है। इसलिए घर हो या बाहर, पुरुष की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह अपने साथ रहने वाली या काम करने वाली माता-बहनों के साथ अतिरिक्त रूप से पवित्र दृष्टि से व्यवहार करे। महाभारत में द्रोपदी का सार्वजनिक अपमान होने के बाद कृष्ण ने जब वस्त्रावतार लिया था तो उस समय उनके बोले संवाद आज भी बहुत महत्वपूर्ण हैं और कार्यस्थलों पर कोड ऑफ कंडक्ट के रूप में लिखे जाना चाहिए।