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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:लाभ और स्वार्थ को अलग करके नेटवर्किंग करना भी एक कला है

19 दिन पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

दौलत का मतलब केवल रुपया-पैसा ही नहीं है। पूंजी के कई और रूप भी हैं। इनमें एक है संबंध। हम सबके जीवन में कई ऐसे दायरे हैं जहां संबंध बिखरे पड़े हैं। इन्हें ठीक ढंग से गूंथ लिया जाए, तो हमारे लिए कंठहार बन सकते हैं। संबंध की इसी पूंजी को प्रबंधन की भाषा में नेटवर्किंग कहा जा रहा है। पिछले दिनों जयपुर में मुझे नेटवर्किंग की दुनिया के दो पुरुषार्थी मिले। आप क्या करते हैं, के उत्तर में उन्होंने नेटवर्किंग का जो खाका खींचा, सुनकर मैं भी चौंक गया।

वे बोले हम संबंधों को जुटाकर फिर एक लय में पिरोकर एक-दूसरे को सौंप देते हैं। व्यावसायिक दुनिया में संबंधों का ऐसा प्लेटफॉर्म देते हैं, जिसमें एक-दूसरे को लाभ तो मिले, पर स्वार्थ नहीं रहता। लाभ और स्वार्थ को अलग करके नेटवर्किंग करना भी एक कला है। मुझे याद आया कि हनुमानजी इसके महारथी हैं। दुनिया की शानदार नेटवर्किंग मानी जाएगी, जब उन्होंने पहली ही भेंट में विभीषण को रामजी के पक्ष में कर लिया था।

ये रावण की पराजय की पटकथा पर हस्ताक्षर थे। हमारा प्राथमिक क्षेत्र परिवार है। व्यवसाय की दुनिया जिसे नेटवर्किंग कहती है, परिवार का संसार उसे रिश्तेदारी कहता है। आज व्यावसायिक जगत में जितने व्यवस्थित ढंग से नेटवर्किंग की जा रही है, समय आ गया है परिवार में उतने ही प्रबंधकीय कौशल से रिश्ते निभाए जाएं। वहां लाभ की कामना होती है, यहां प्रेम का आग्रह हो।