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एन. रघुरामन का कॉलम:भोजन समेत हर काम से जुड़ी होती है गुणवत्ता, ‘चलता है’ एटीट्यूड के भंवर में न फंसें

4 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

मेरा एक मित्र विदेश में रह रहे अपने बच्चों से मिलना चाहता था। चूंकि वह वरिष्ठ नागरिक है, इसलिए टीके के दोनों डोज तय समय पर लगवा सका। पर वह विदेश नहीं जा सका क्योंकि टीके के प्रमाण पत्र में एक अक्षर इधर का उधर हो गया था। नाम में विसंगतियों के कई मामले आ रहे हैं। मैं ऐसे चार लोगों को जानता हूं।

अहमदाबाद के मिकी ए कपाड़िया का उदाहरण लें, दोनों डोज़ के बाद मिले प्रमाण पत्र में मिकी एम कपाड़िया लिखा था, जो कि पूरी तरह प्रशासनिक गड़बड़ी थी। अगर वैक्सीन सर्टिफिकेट में आपका नाम पासपोर्ट से मेल नहीं खाता, तब टीका लगवा चुके व्यक्ति के लिए अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट बुक करना और वीज़ा हासिल करना असंभव हो जाएगा। हालांकि कल ही ऐसी खबर सामने आई कि कोविन पोर्टल पर सर्टिफिकेट में नाम सुधारा जा सकता है।

जब मेरा मित्र कम्प्यूटर में उसका नाम लिखने वाले शख्स के पास नाम सुधरवाने पहुंचा, तो उसने मदद करने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी और किसी हेल्पलाइन का नंबर दिया वो भी बेकार निकला। जब उससे पूछा कि ऐसी मूर्खतापूर्ण गलती क्यों हुई, तो एक लाइन में उसका जवाब था -‘काम में बहुत ज्यादा तनाव।’

इन बहानों से मुझे हमारे बुजुर्गों की याद आ गई, जो कहा करते थे ‘खाना खाते समय बात कम करो और खाने पर ध्यान दो।’ ये कोई एक दिन की या एक काम से जुड़ी सलाह नहीं थी। वे वही बात महीनों, सालों तक कहते रहते थे जब तक हम उसमें निपुण नहीं हो जाते थे। बड़े-बुजुर्ग एकाग्रता में विश्वास रखते थे क्योंकि वे चाहते थे कि हम मन-मस्तिष्क और शरीर के बीच मजबूत संबंध स्थापित करें और भोजन के साथ-साथ परोक्ष रूप से हम जो कुछ भी करते हैं उसके साथ संबंध बेहतर करें।

उन्हें ये भी पता था कि परफेक्शन की इस राह पर चलने में समय लगता है। इसलिए अक्सर उसी बात को कई बार त्योरियां चढ़ाकर तो कई बार सिर्फ मुंह बनाकर बार-बार दोहराने में भी वे धैर्य रखते थे। याद करिए उस दौरान वे कभी नहीं चिल्लाए क्योंकि इससे उनकी खाने के प्रति सजगता (माइंडफुल ईटिंग) भंग हो जाती। और जब हम उनके निर्देशों का पालन किया तो धीरे-धीरे खाने के रंग, सुगंध, आवाज़, बनावट व स्वाद पर ध्यान देकर इंद्रियों को उसमें शामिल कर लिया।

इन दिनों जब टेबल-कुर्सी के चारों तरफ ही जिंदगी घूम रही है, तब ऑनलाइन स्कूल और घर से काम के कारण पूरा परिवार हर समय खाता रहता है, पर हम इस बात से अनजान हैं कि एकजगह बैठे रहने से शरीर में अनावश्यक फैट इकट्‌ठा हो रहा है। इसके अलावा हम सजगता से भोजन भी नहीं कर रहे हैं। कंप्यूटर पर देखते हुए खाना खाना निश्चित तौर पर माइंडफुल ईटिंग नहीं है। और ये खाने का सही तरीका भी नहीं है। याद करें कि ऐसे कड़कमिज़ाज बड़े-बुजुर्ग अपने कार्यक्षेत्र के साथ उनके हर काम में अपनी सख्ती व परफेक्शन के लिए जाने जाते थे।

यही कारण है कि उनके अधिकारी भी उनका सम्मान व प्रशंसा करते थे। आज की कार्यशैली में डेस्कटॉप कम्प्यूटर ठीक हैं, पर आप अपनी जीवनशैली को डेस्कटॉप भोजन में नहीं बदल सकते क्योंकि ये दिमाग व शरीर के लिए घातक है! गुणवत्ता जीवन के हर क्षेत्र का निर्विवाद रूप से हिस्सा बन गई है इसलिए पहले उसे अपने निजी जीवन में लागू करें जैसे भोजन में, जो अंततः आपको कार्यस्थल पर बेहतर करने में मदद करेगी।

फंडा यह है कि जैसे हम जिन चीज़ों के लिए पैसे देते हैं, उनमें कुछ गुणवत्ता की उम्मीद करते हैं वैसे ही हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारी उत्पादकता भी गुणवत्ता से भरी हो। नहीं तो हम भी ‘चलता है’ एटीट्यूड के भंवर में फंस जाएंगे।