जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:राज कपूर आज भी करते हैं दिलों पर राज

5 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

आज राज कपूर का जन्मदिन है। उनकी मृत्यु को 33 वर्ष हो चुके हैं परंतु आज भी उनकी फिल्में सराही जा रही हैं। कुछ फिल्म समालोचकों का कहना है कि शैलेंद्र की फिल्म ‘तीसरी कसम’ में उनके द्वारा अभिनीत पात्र, गांव के ठेठ गाड़ीवान हिरामन को भुलाना संभव नहीं है।

इस तरह भूमिका को आत्मा का अंश बनाना, भावना को अपनी शिरा में रक्त की तरह बहाना आसान काम नहीं है। फिल्म में नौटंकी वाली हीराबाई और गाड़ीवान हिरामन ताउम्र साथ रह सकते थे परंतु हीराबाई लाल बेगम अभिनीत करना नहीं छोड़ सकती थी और गाड़ीवान हिरामन लीक से हटकर गाड़ी चलाना नहीं छोड़ सकता था।

गौरतलब है कि राज कपूर के जन्म के समय कुंडली देखकर पंडित ने कहा था कि बालक का नाम सृष्टिनाथ रखा जाए। लेकिन उनके पिता पृथ्वीराज को नाम में अहंकार का भाव लगा। बहरहाल, आगे चलकर राज कपूर ने फिल्म जगत में एक सृजन संसार रचा। मात्र 22 वर्ष की आयु में राज कपूर ने अपनी पहली फिल्म ‘आग’ बनाई।

फिल्म की असफलता के बाद मात्र 9 महीने में राज ने सफल फिल्म ‘बरसात’ बनाई। दुनिया के अनेक देशों में अभूतपूर्व सफलता पाने वाली ‘आवारा’ के समय राज कपूर ने जीवन के 25 वर्ष ही पूरे किए थे और धीरे-धीरे सुविधा संपन्न स्टूडियो के मालिक राज 26 वर्ष के हो गए।

राज कपूर की ‘आह’ की असफलता के बाद लोगों को लगा कि उनका खेल खत्म हो गया। लेकिन उन्होंने कमाऊ फिल्म ‘बूट पॉलिश’ का निर्माण किया। इसी तरह ‘मेरा नाम जोकर’ से भारी घाटे के बाद, उन्होंने हिट फिल्म ‘बॉबी’ बनाई। राज कपूर ‘हिना’ फिल्म के चार गीत रिकॉर्ड कर चुके थे और इस बीच उनकी मृत्यु हो गई। इस दुखद घटना के बाद रणधीर कपूर ने पिता की अधूरी फिल्म की शूटिंग पूरी की।

राज कपूर अपनी अत्यंत महत्वाकांक्षी फिल्म ‘रिश्वत’ की कथा लिख चुके थे। लेकिन यह फिल्म भी उनकी मृत्यु के कारण बनाई ना जा सकी। ‘रिश्वत’ का कथासार यह था कि एक कस्बे के सेवानिवृत्त स्कूल शिक्षक बेहद ईमानदार थे और अवकाश लिए बगैर काम करते थे। उनके पड़ोसी यह चाहते थे कि अब वे कुछ दिनों के लिए दिल्ली जाएं, जहां उनका पुत्र उद्योग मंत्री है। वे आखिरकार दिल्ली जाते हैं । इस तरह देखें तो ‘जागते रहो’ का घटनाक्रम एक बहुमंजिला इमारत में घटित होता है और ‘रिश्वत’ का घटनाक्रम रेलगाड़ी का है।

आगे की कथा में दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मास्टर जी का सामान चोरी चला जाता है। वे आधी रात के बाद अपने पुत्र के बंगले पर पहुंचते हैं। पहचान पत्र के अभाव में चौकीदार उन्हें भीतर नहीं आने देता। इत्तेफाक से बंगले के पीछे लगे बाग का द्वार खुला रह जाता है। मास्टर जी वहां से भीतर जाते हैं। वे देखते हैं कि उनके, मंत्री पुत्र को एक व्यापारी रिश्वत देने नोटो से भरा सूटकेस लेकर आया था। व्यापारी चाहता था कि आगामी बजट में कुछ जीवन उपयोगी वस्तुओं के दाम बढ़ा दिए जाएं तो करोड़ों का मुनाफा हो सकता है।

तभी मास्टर साहब बेटे पर नाराज होते हैं। बेटा बार-बार कहता है कि ‘पिताजी यह धन उसे कई लोगों को बांटना है।’ पिता कहता है कि पुत्र उनकी नहीं वरन भ्रष्ट व्यवस्था की रचना है। क्या यह फिल्म आज अंग्रेजी भाषा में बनाकर विदेशों में प्रदर्शित की जा सकती है?

बहरहाल, राज कपूर ‘अजंता’ नामक फिल्म भी बनाना चाहते थे। उन्हें आश्चर्य था कि अजंता की गुफाएं बनाने में कई कारीगरों और कलाकारों की पीढ़ियां खप गईं। एक पीढ़ी ने कृति के पैर बनाए तो अगली ने कमर बनाई तथा किसी अन्य ने शेष काम पूरा किया परंतु आकल्पन एक ही व्यक्ति का लगता है। सृजन सामूहिक प्रयास नहीं होता, वह हमेशा एक ही प्रतिभा का व्यक्तिगत कार्य होता है। फिर अजंता में यह सब कैसे हुआ होगा?