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राजदीप सरदेसाई का कॉलम:आठ साल पीएम रहने के बावजूद मोदी ने गुजरात से खास रिश्ते पर जोर देने का अवसर नहीं छोड़ा

22 दिन पहले
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राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार - Dainik Bhaskar
राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार

‘यह गुजरात हमने बनाया है’, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात चुनावों की घोषणा के बाद एक रैली में यह उद्घोष किया। उनका इशारा इस ओर था कि गुजरात के विकास का श्रेय उन्हें ही जाता है। पिछले दो दशकों में उन्होंने अपनी छवि गुजरात के सीईओ के तौर पर बनाई है।

यहां तक कि गांधीनगर से 7, लोक कल्याण मार्ग जाने पर भी गुजरातियों से उनका अनूठा संबंध कमजोर नहीं हुआ। अब जब फिर चुनावी सरगर्मी बढ़ी है, तो प्रधानमंत्री फिर गुजराती अस्मिता के उसी प्रतीक के रूप में खुद को स्थापित कर रहे हैं, जिससे उन्हें राजनैतिक गति मिली थी।

यह पंचलाइन नई नहीं है। 2002 में बतौर मुख्यमंत्री चुनाव में उतरने के बाद से ही वे गुजराती अस्मिता-आत्मसम्मान की बात करते रहे हैं। उसी साल की गुजरात गौरव यात्रा को याद करें, जब वे दंगों के मामले में गुजरात सरकार की किसी भी आलोचना को ‘गुजरात के लोगों’ की आलोचना से जोड़ देते थे।

साल 2007 में भाजपा का नारा ‘जीतेगा गुजरात’ था। इसके जरिए मोदी का इशारा, यूपीए सरकार द्वारा केंद्र के स्तर पर गुजरात के साथ किए जा रहे भेदभाव की ओर था। अब आते हैं 2017 यानी पिछले चुनावों पर। तब कांग्रेस ने गुजरात मॉडल को चुनौती देते हुए नारा दिया था ‘विकास पागल हो गया है’। तब मोदी सीएम नहीं थे, फिर भी उन्होंने इस नारे के साथ खुद से जोड़ लियाः ‘मैं गुजरात हूं, मैं विकास हूं’।

गुजरात 1993-94 में पांचवां सबसे अमीर राज्य था, जो 2011-12 में तीसरा सबसे अमीर राज्य बन गया। वास्तव में मोदी के नेतृत्व वाले वर्षों का मज़बूत आधार दूरदर्शी नेताओं-कुशल ब्यूरोक्रेट ने तैयार किया।

मोदी सबसे लंबे वक्त तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे और राज्य से रातोंरात केंद्र में पहुंचने वाले पहले नेता भी। इसलिए गुजरात के पहले नंबर के नेता की उनकी छवि को चुनौती नहीं दी जा सकती। आठ साल प्रधानमंत्री रहने और वाराणसी से सांसद होने के बावजूद, मोदी ने अपने गृहराज्य से खास रिश्ते पर जोर देने का कोई अवसर नहीं गंवाया। फिर वह किसी विदेशी नेता को अहमदाबाद लाने की बात हो या फिर पूरे गुजरात में किसी भी बड़ी परियोजना का उद्घाटन हो, उनकी प्रधानमंत्री की छवि और गुजरात की मिट्टी के बेटे की छवि हमेशा साथ-साथ ही रही है।

लेकिन क्या आधुनिक गुजरात को सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी ने ही आगे बढ़ाया है? दरअसल, 1990 के दशक में तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल ने गुजरात के औद्योगिक विकास को गति दी थी। चिमनभाई से पहले, माधवसिंह सोलंकी ने आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों पर ध्यान केंद्रित किया था। जहां बलवंतराय ने बतौर मुख्यमंत्री पंचायत व्यवस्था को बढ़ाया, वहीं हितेंद्र देसाई ने सहकारी क्षेत्र को बढ़ाने में योगदान दिया।

यहां तक कि भाजपा से गुजरात के पहले मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल भी अपने छोटे कार्यकाल में बंदरगाहों के निजीकरण में तेजी लाए थे। वास्तव में मोदी के नेतृत्व वाले वर्षों का मज़बूत आधार दूरदर्शी नेताओं-कुशल ब्यूरोक्रेट ने तैयार किया। सफल सुधारों, व्यापक सड़क नेटवर्क, बड़ी सिंचाई योजनाएं, मोदी युग की कई उपलब्धियां रहीं।

लेकिन गुजरात मॉडल का स्याह पक्ष भी है। अंतर-क्षेत्रीय असमानताएं, ज्यादातर धन और अवसरों का शहरी केंद्रों में होना, नगरपालिकाओं में प्रशासनिक अक्षमताएं, असमान सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं और एक कमज़ोर शिक्षा प्रणाली अभी भी परेशानी बनी हुई हैं। (उदाहरण के लिए, 2018-19 में उच्च शिक्षा पर हुए सर्वे से पता चलता है कि गुजरात 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में, छात्र-शिक्षक अनुपात के मामले में 26वें स्थान पर है)।

कुपोषण भी चिंता का विषय है। एनएफएचएस सर्वे (2019-20) के मुताबिक 2005-06 में 7% की तुलना में, 5 वर्ष से कम आयु के लगभग 11% बच्चे कम वजन के थे। जब इस साल की शुरुआत में 17 लाख लोगों ने तलाती (ग्राम प्रशासक) की नौकरी के 3,400 पदों के लिए आवेदन किया, तो ग्रामीण युवा बेरोजगारी की वास्तविकता उजागर हुई। इससे भी ज्यादा परेशानी वाली बात यह है कि सामाजिक सद्भाव के गांधीवादी मूल्यों को मानने वाला ‘पुराना’ गुजरात, अब ‘नए’ गुजरात के विभाजनकारी एजेंडे में फंस गया है।

पुनश्चः 2017 के चुनाव के दौरान हम भरूच के पास आदिवासी बहुल गांव में रुके। ज्यादातर ग्रामीणों ने तत्कालीन सीएम विजय रूपाणी के बारे में कम सुना था। उन्हें लगता था कि मोदी अभी भी राज्य चला रहे हैं। ज्यादातर पोस्टरों से भी रूपाणी नदारद थे। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने हमसे साफतौर पर कहा भी था, ‘मोदी गुजरात हैं और गुजरात मोदी है।’ इसमें 1970 के दशक के, कांग्रेस के नारे ‘इंदिरा ही भारत हैं’ की झलक दिखती है!

(ये लेखक के अपने विचार हैं)