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राजदीप सरदेसाई का कॉलम:बेहतर होगा कि देश के राज्य आर्थिक मोर्चे पर प्रतिस्पर्धा करें, पक्षपात के आधार पर नहीं

2 महीने पहले
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राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार - Dainik Bhaskar
राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार

देश के सबसे ताकतवर राजनेताओं से लेकर दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों तक- बीते एक दशक में गुजरात का जैसा दबदबा रहा है वैसा किसी और राज्य का नहीं रहा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ऐसा इसलिए है कि नीति-निर्माण की प्रक्रिया में गुजराती नेताओं और नौकरशाहों की भरमार है? शायद इसका जवाब फॉक्सकॉन-वेदांता विवाद में हो, जिसमें 22 अरब डॉलर के सेमी-कंडक्टर प्रोजेक्ट के बेस की स्थापना के लिए महाराष्ट्र के बजाय गुजरात को चुना गया।

जुलाई के आखिरी सप्ताह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने राज्य की विधानसभा को बताया था कि हजारों नौकरियां सृजित कर सकने वाला यह बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट महाराष्ट्र में स्थापित होगा। उन्होंने सहयोगी कम्पनियों से अनुबंध के लिए औपचारिक पत्र भी भेज दिया था। लेकिन महज छह हफ्तों में ही ऐसा क्या हो गया कि यह प्रोजेक्ट गुजरात चला गया? कहीं इसका कारण गुजरात में होने जा रहे विधानसभा चुनाव तो नहीं?

यहां यह संकेत नहीं किया जा रहा है कि निवेशकों के पास गुजरात को चुनने के ठोस कारण नहीं थे। वेदांता के चेयरपर्सन अनिल अग्रवाल का कहना है कि गुजरात को चुनने का निर्णय इस मल्टी-बिलियन डॉलर निवेश के लिए उपयुक्त स्थान का पेशेवर तरीके से निरीक्षण करने के बाद लिया गया था। साथ ही वैज्ञानिक रीति का पालन करते हुए अनेक शॉर्टलिस्टेड राज्यों में से गुजरात पर सहमति बनाई गई थी।

गुजरात ने भी अपनी ओर से इस प्रोजेक्ट की आवभगत करने और उसे अनेक इंसेंटिव मुहैया कराने में कोई कोताही नहीं बरती थी। लेकिन यह निर्णय जितनी तीव्र गति से लिया गया, उससे गुजरात और महाराष्ट्र के बीच अतीत के टकरावों के घाव हरे हो सकते हैं। याद करें कि 1960 में पश्चिम भारत के इन दोनों राज्यों का गठन पुराने बॉम्बे स्टेट के कटुतापूर्ण और कुछ अवसरों पर खूनखराबे से भरे टकरावों के बाद किया गया था।

उद्यमी मानसिकता के गुजरातियों ने मुम्बई की धन-सम्पदा में बड़ा योगदान दिया है और इन दोनों राज्यों में सगे भाइयों जैसी प्रतिद्वंद्विता हमेशा से रही है। लेकिन महाराष्ट्र इसमें हमेशा भाषाई और क्षेत्रीय बड़े भाई की भूमिका में रहा था। संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन और कालांतर में शिवसेना के उदय में भी यही देखा गया। लेकिन बीते एक दशक में तस्वीर बदल गई है।

इस महीने की शुरुआत में गृह मंत्री अमित शाह मुम्बई गए थे और वहां उन्होंने मुम्बईकरों से आग्रह किया कि वे आने वाले नगरीय निकाय चुनावों में शिवसेना को अपने ही घर में परास्त करें। महाराष्ट्र में जिस तरह से शिवसेना में विद्रोह करवाकर सत्ता हथियाई गई, उससे भी यही लगा कि भाजपा इस राज्य पर पूर्ण वर्चस्व चाहती है।

ऐसे में एक आम मराठी माणूस को लग रहा है कि गुजराती सत्ता उनकी महाराष्ट्रीयन अस्मिता पर हावी हो रही है। शिंदे को कैबिनेट निर्माण पर क्लीयरेंस लेने के लिए जितनी बार दिल्ली जाना पड़ा, उससे भी यही धारणा मजबूत होती है कि महाराष्ट्र का रिमोट कंट्रोल किसी और के पास है। 2020-21 में गुजरात को सर्वाधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी मिला था, जबकि महाराष्ट्र दूसरे क्रम पर था।

लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि महाराष्ट्र से गलतियां नहीं हुईं। 1990 के दशक में एनरॉन पॉवर प्रोजेक्ट को उदारीकरण के शुरुआती दिनों के ब्लूप्रिंट की तरह देखा जाता था, लेकिन वह घूसखोरी और भ्रष्टाचार में फंसकर राह भटक गया। इससे महाराष्ट्र इंकॉर्पोरेशन की छवि भी खराब हुई। हाल के सालों में बुनियादी ढांचे के अनेक प्रोजेक्ट राजनेताओं की प्रतिस्पर्धा के चलते लेटलतीफी के शिकार हुए।

महाराष्ट्र और गुजरात में सगे भाइयों जैसी प्रतिद्वंद्विता हमेशा से रही है। महाराष्ट्र अतीत में हमेशा भाषाई और क्षेत्रीय बड़े भाई की भूमिका में रहा था। लेकिन अब धीरे-धीरे तस्वीर बदलती जा रही है।

आरे मेट्रो कार शेड परियोजना को लेकर शिवसेना और भाजपा में ठनी हुई है, जिससे न केवल देरी हो रही है बल्कि लागत भी बढ़ रही है। जबकि गुजरात में एक पार्टी के स्थायी शासन ने विगत 25 वर्षों में सुस्पष्ट निर्णय-क्षमता का परिचय दिया है। ये और बात है कि गुजरात मॉडल जिस केंद्रीयकरण की प्रक्रिया से संचालित होता है, वह भारत के संघीय ढांचे के अनुरूप नहीं है।

सभी राज्यों को विकास के समान अवसर दिए जाने चाहिए। आखिर क्या कारण है कि आजकल दुनिया के प्रमुख नेताओं की भारत यात्रा के दौरान उन्हें गांधीनगर जाने के लिए प्रेरित किया जाता है, दूसरे राज्यों की राजधानियों में नहीं? बेहतर होगा कि देश के राज्य आर्थिक मोर्चे पर प्रतिस्पर्धा करें, राजनीतिक पक्षपात के आधार पर नहीं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)