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राजदीप सरदेसाई का कॉलम:हिंदुत्व बनाम हिंदू धर्म की बहस में राहुल-खुर्शीद की बातें सिर्फ भटकाती और बांटती हैं

19 दिन पहले
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राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार - Dainik Bhaskar
राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार

सोशल मीडिया पर नाराजगी, प्राइम टाइम के शोर और वॉट्सएप फॉर्वर्ड के इस दौर में बोला या लिखा गया हर शब्द बड़ी तेजी से हर ओर फैल जाता है। इसका ताजा उदाहरण है कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद की किताब के एक वाक्य पर तीखी प्रतिक्रियाएं, जिसमें उन्होंने राजनीतिक हिंदुत्व और आईएसआईएस तथा बोको हरम जैसे जिहादी इस्लाम समूहों को समान बताया है। इससे चुनावी मौसम में फिर नाराजगी पैदा हो गई है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी यह दावा कर इस बहस में उतर गए कि ‘हिंदू धर्म मासूमों को मारने के बारे में नहीं है, लेकिन हिंदुत्व है।’ बतौर अकादमिक बहस ‘हिंदू धर्म बनाम हिंदुत्व’ के धार्मिक व राजनीतिक पहलुओं पर चर्चा की जा सकती है, लेकिन हिंदुत्व के एक ‘स्वरूप’ को आईएसआईएस-बोकोहरम के ‘समान’ बता देना बात को तूल देना है। राजनीतिक हिंदुत्व के कुछ स्वरूपों ने बेशक हिंदू-मुस्लिम संबंध खराब किए और कई बार हिंसा भी हुई।

लेकिन क्या संघ परिवार के हिंदू राष्ट्र के विचार को हथियारबंद ऐसे जिहादी आतंकी संगठन के समान बताना ठीक है, जिसके मुख्य दुश्मन उसके साथी इस्लामवादी ही हैं? या नाइजीरिया के बोको हरम के समान बताना, जिसने हजारों लोगों की जान ली है? खुर्शीद के विवादास्पद वाक्य से हो सकता है कि किताब की कुछ ज्यादा प्रतियां बिक जाएं और राहुल गांधी का वीडियो वायरल हो जाए, लेकिन इससे उनकी पार्टी को अतिरिक्त वोट नहीं मिल सकते, खासतौर पर उत्तर प्रदेश में।

चुनाव के ऐन पहले इन बातों से भाजपा को जनता का ध्यान जरूरी स्थानीय मुद्दों से भटकाने में मदद ही मिलेगी। राजनीतिक हिंदुत्व पर मौजूदा सीधा हमला विपक्षी दलों में इसे लेकर स्पष्ट भ्रम दिखाता है कि भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता की चुनौती का सामना कैसे किया जाए। सिर्फ चार साल पहले, 2017 गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने अचानक हिंदू पहचान अपना ली थी और मंदिर जाकर खुद को ‘जनेऊधारी’ हिंदू बताया था। अन्य विपक्षी नेता भी अपनी हिंदू जड़ों पर सार्वजनिक रूप से जोर देते रहे हैं।

फिर वे 2020 दिल्ली चुनावों से पहले हनुमान चालीसा का पाठ करने वाले अरविंद केजरीवाल हों या इस साल बंगाल चुनाव में खुद को चंडीपाठ करने वाली हिंदू ब्राह्मण बताने वाली ममता बनर्जी हों। हिंदू मंत्रोच्चार रणनीतिक ‘सौम्य’ हिंदुत्व रहा था, जिसे भाजपा के तथाकथित हिंदू वोट बैंक पर एकाधिकार को चुनौती देने के लिए बनाया गया। तो फिर सही रास्ता क्या है? संघ परिवार की हिंदुत्व विचारधारा की निंदा करना या उसके साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए ज्यादा समावेशी हिंदू विकल्प बनना?

हालिया चुनावी इतिहास बताता है कि संघ परिवार के हिंदुत्व को हिंदू विरोधी बताने की राजनीतिक रणनीति असफल होती है, जब तक कि इसके पीछे मजबूत वैचारिक स्थिति या विश्वसनीय नेतृत्व न हो। याद कीजिए, 2013 में पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे की ‘भगवा आतंक’ टिप्पणी का कितना विरोध हुआ था। राहुल-खुर्शीद विवाद से कुछ लोगों को ‘हिंदुओं को पीड़ित’ बताने का मौका मिलेगा। खुर्शीद हिंदू धर्म का अपमान करने वाले प्रभावशाली मुस्लिम माने जाएंगे और राहुल हिंदुओं से डरने वाले लुटियन्स ‘नामदार’।

हालांकि लंबे समय से, धार्मिक कट्टरपंथियों और उग्रवादी समूहों के साथ अल्पकालिक समझौतों ने धर्मनिरपेक्षता को नुकसान पहुंचाया है। कांग्रेस भी खुद को नैतिक रूप से सही नहीं ठहरा सकती क्योंकि अतीत में उसने हिंदू व मुस्लिम पार्टियों संग अस्थायी चुनावी फायदों के लिए समझौते किए हैं।

अगर राहुल और खुर्शीद को धार्मिक नफरत के प्रति शून्य सहिष्णुता का पालन करना है, तो इसे सांप्रदायिक हिंसा के हर मामले में अपनाना होगा, फिर वह 1984 के सिख विरोधी दंगे हों या अयोध्या के बाद गोधरा हिंसा या केरल में आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्या। नहीं तो इसे ढोंग और एकतरफा राजनीतिक शोर माना जाएगा, जिससे सिर्फ नुकसान ही होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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