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राजदीप सरदेसाई का कॉलम:योगी के ‘80 बनाम 20’ बयान से उठे सवाल; चुनाव अभियान के डिजिटल फुटप्रिंट चुनौतीपूर्ण साबित होंगे

6 दिन पहले
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राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार - Dainik Bhaskar
राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार

योगी आदित्यनाथ ने अपनी भगवा राजनीति कभी नहीं छिपाई। यही वजह है कि जब उन्होंने देश की सबसे ज्यादा आबादी वाले सूबे में चुनावों को ‘80 बनाम 20’ के बीच मुकाबला बताया तो आश्चर्य नहीं हुआ, जाहिर है उनका इशारा राज्य में हिंदू-मुस्लिम आबादी के अनुपात की ओर था। उनका तर्क था कि ‘80 फीसदी वे लोग हैं, जो राष्ट्रवाद, गुड गवर्नेंस और विकास के समर्थक हैं और 20 फीसदी रामजन्मभूमि के विरोधी हैं।’

शायद ही किसी मुख्यमंत्री ने इस तरह से सांप्रदायिक ‘हम’ बनाम ‘वे’ वाले राजनीतिक विमर्श को आकार देने की कोशिश की हो। कुलमिलाकर आदित्यनाथ सिर्फ 2022 के चुनाव के लिए एक एजेंडा सेट करने की कोशिश कर रहे हैं, जहां राजनीतिक ध्रुवीकरण और पहचान की राजनीति न सिर्फ उत्तरप्रदेश में महत्वपूर्ण कारक है, बल्कि सारे चुनावी राज्यों में भी।

विडम्बना है कि योगी का 80 बनाम 20 वाला राग ऐसे समय में आया है जब बीजेपी अपने लिए महत्वपूर्ण गैर-यादव ओबीसी वोटर वापस हासिल करने के लिए जद्दोजहद कर रही है, जो कि मतदाताओं का लगभग 35 फीसदी हैं। ‘राजनीतिक हिंदू’ के विचार को छोटे ओबीसी दलों के बढ़ते दावे से चुनौती दी जा रही है, जो भाजपा की उच्च जाति द्वारा संचालित सोशल इंजीनियरिंग से दबा हुआ-सा महसूस करते हैं।

दिलचस्प रूप से अखिलेश यादव इन पार्टियों को जोड़कर इंद्रधनुषी गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह अनिश्चित है कि क्या यह समूह भाजपा के हिंदुत्व के साथ शासन के कल्याणकारी मॉडल को निरंतर चुनौती दे सकता है। जहां यूपी की विभाजनकारी राजनीति और भी अधिक ध्रुवीकरण वाली हो गई है, चिंता ये है कि सांप्रदायिक संक्रमण दूसरे चुनावी राज्यों में भी फैल रहा है।

ये कोई इत्तेफाक नहीं कि विवादास्पद धर्म संसद उत्तराखंड में आयोजित हुई, जहां हेट स्पीच के आरोपी ज्यादातर साधु-संत, राज्य सरकार के करीबी हैं। पंजाब में प्रधानमंत्री की सुरक्षा चूक वाले मामले को बीजेपी की सोशल मीडिया सेना ने अभियान के रूप में चलाना शुरू कर दिया है। अकालियों के अब सहयोगी नहीं होने के कारण, भाजपा खालिस्तानी समर्थित आतंक फिर से भड़क उठने की आशंकाओं का हवाला देकर और कांग्रेस को राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में नरमी बरतने का आरोप लगाकर अपने पंजाबी शहरी हिंदू मतदाता को लुभाने की कोशिश कर रही है।

एक कमजोर सीमावर्ती राज्य में फिर से वही सब मुद्दे उठाना खतरनाक हो सकता है, जिसमें पिछले दो दशक में काफी कुछ सुधार हुआ था। छोटे से राज्य गोवा को देखें। गोवा में बीजेपी के असली शुभांकर स्वर्गीय मनोहर पर्रिकर ने 2012 के चुनावों में चर्च तक पहुंचने के लिए एक निरंतर प्रयास किया था, उनके प्रयासों से बीजेपी के आठ में से सात कैथोलिक उम्मीदवार विजयी हुए थे और पहली बार गोवा में भाजपा ने अपने दम पर बहुमत हासिल किया था।

अब पड़ोसी राज्य कर्नाटक में चर्च पर हुए हमले की पृष्ठभूमि के बीच राज्य में कैथोलिक बहुल आबादी का विश्वास हासिल करना बीजेपी के लिए मुश्किल होगा। सीएम प्रमोद सावंत ने पुर्तगालियों द्वारा 500 साल पहले नष्ट किए मंदिरों को फिर से बनाने का राग छेड़ दिया है। वास्तव में, जिन नेताओं के पास हमारे असल मुद्दों का कोई गंभीर जवाब नहीं है- चाहे वह नौकरी हो, शिक्षा हो, भ्रष्टाचार हो या सार्वजनिक स्वास्थ्य हो, वहां पुराने विवादों पर आधारित धार्मिक पहचान हमेशा मजबूत होती है।

पुनश्च : ओमिक्रॉन की छाया में लड़े जा रहे 2022 के चुनाव अभियानों में लग रहा है कि इनका बड़ा डिजिटल फुटप्रिंट होगा। जिससे बड़ी चुनौती भी पैदा होगी कि चुनाव आयोग डिजिटल दुनिया में पनपने वाली नफरत की फैक्ट्रियों को कैसे रोकता है? शुरुआती तौर पर आयोग एक सीधे से सवाल का जवाब दे सकता है कि क्या योगी का ‘80 बनाम 20’ बयान आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है। ये समय है कि चुनाव आयोग अपनी रीढ़ की हड्‌डी फिर से सीधी करे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)