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राम माधव का कॉलम:ऐसे सम्मेलनों में सुरक्षा मामलों पर चर्चा नहीं होती। फिर भी यूक्रेन की बात बहानों से उठती रही...

21 दिन पहले
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राम माधव सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारिणी, आरएसएस - Dainik Bhaskar
राम माधव सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारिणी, आरएसएस

साल 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी ने प्रभावशाली देशों के उन वित्त मंत्रियों के समूह को जी-20 सम्मेलन के स्तर की बैठक तक ला दिया था, जो आमतौर पर पर्दे के पीछे ही रहते थे। पिछले 14 वर्षों में जी-20 सम्मेलनों में अर्थव्यवस्था और विकास मुख्य मुद्दा बन गया है।

बाली में हुआ सम्मेलन भी इससे अछूता नहीं रहा। लेकिन इसपर यूक्रेन युद्ध का साया भी रहा। ऐसे सम्मेलनों में आमतौर पर सुरक्षा मामलों पर चर्चा नहीं की जाती थी। फिर भी यूक्रेन की बात अलग-अलग बहाने से उठती रही। जैसे खाद्य सुरक्षा, सप्लाई चेन में व्यवधान, आर्थिक गिरावट, शांति को खतरा। आखिर में सभी देशों का इस मामले में अपना-अपना मत था।

अमेरिकी इस बात से खुश थे कि उन्होंने युद्ध पर मज़बूत मत रखा, जो दुनियाभर में सुर्खियों में छाया रहा। उधर चीनी इससे नाखुश थे कि ‘अमेरिका के नेतृत्व में कुछ पश्चिमी देश’ ऐसे विषय को उछालने की कोशिश कर रहे थे, जो ‘जी-20 सम्मेलन में आर्थिक सहयोग के लिहाज से प्रासंगिक नहीं था।’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूक्रेन संकट का ज़िक्र मुख्यतः सप्लाई चेन में आ रहे व्यवधान के संदर्भ में किया, जिससे गरीबों पर असर पड़ रहा है। उन्होंने इस ओर ध्यान खींचा कि वैश्विक सप्लाई चेन के प्रभावित होने से दुनियाभर में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति का संकट बढ़ रहा है।

उन्होंने चेताया, ‘हर देश के गरीब नागरिकों के लिए चुनौती और भी ज्यादा गंभीर है। उनके लिए जीवन पहले ही संघर्षपूर्ण था। उनके पास दोहरी मार झेलने की क्षमता नहीं है।’ उनका यह बयान सम्मेलन में काफी चर्चा में रहा कि ‘आज खाद की किल्लत, कल खाद्य संकट में बदल जाएगी।’

हालांकि आखिर में भविष्य की महामारियों, डिजिटल मुद्रा, नई तकनीकों और यहां तक कि सांस्कृतिक मुद्दों जैसे विषयों पर भी बात हुई, लेकिन यूक्रेन और चीन के मुद्दे ही सबसे ज्यादा चर्चा में रहे। द्विपक्षीय बैठकों में बाइडेन और शी की तीन घंटे चली बैठक सबसे महत्वपूर्ण रही। बैठक का इतना लंबा समय और एक-दूसरे के खिलाफ कुछ न बोलना बताता है कि दोनों देश शायद अपने संबंधों को सुधारना चाहते हैं।

ताइवान जलडमरूमध्य में अगले संभावित संघर्ष से बचने के लिए दोनों देशों के बीच शांति बनी रहना ज़रूरी है। शी जिनपिंग अलग एजेंडे के साथ बाली आए। वह महामारी के बाद दुनिया से अलग-थलग पड़े चीन को वापस मुख्यधारा में लाने के लिए दृढ़ संकल्पित दिखे।

भारत 2022 में ही जी-20 की अध्यक्षता करने वाला था, लेकिन 2023 की मेजबानी मिली इससे भारत के नेतृत्व को यूक्रेन, ताइवान के संघर्ष की बातों से राहत मिल गई। मुश्किल दौर अभी खत्म नहीं हुआ है।

प्रधानमंत्री मोदी की भी सम्मेलन के पहले दिन शी जिनपिंग के साथ छोटी-सी मुलाकात हुई। लेकिन वे अपनी टिप्पणियों में बड़ी सावधानी से भारत-चीन तनाव के बारे में कुछ कहने से बचते रहे और अपनी बातों के केंद्र में खाद्य सुरक्षा, डिजिटाइजेशन, स्वास्थ्य सेवाओं को ही रखा। विभिन्न सत्रों में उनकी अभिव्यक्ति ने भारत के कद को ‘वैश्विक दक्षिण की आवाज’ के रूप में बढ़ाया।

एक तरह से मोदी ने ‘शांति, सद्भाव और सुरक्षा’ पर जोर देकर अगले शिखर सम्मेलन का एजेंडा तय करने की कोशिश की, जिसकी मेजबानी भारत करेगा। बाइडेन और शी के बीच दिख रही दोस्ती के बावजूद, उनके देशों के राजनीतिक घटनाक्रमों से संकेत मिलता है कि मुश्किल दौर अभी खत्म नहीं हुआ है।

यूएस हाउस में रिपब्लिकन की वापसी का मतलब है कि बाइडेन यूक्रेन के खर्च में कटौती कर सकते हैं। दूसरी ओर, शी के पास अगले साल मार्च में अपनी सरकार स्थापित करने का अधूरा एजेंडा है, तब तक वे ताइवान के प्रति अपने सख्त रुख को बनाए रख सकते हैं।

इसका मतलब है कि मोदी को तुरंत कुशल कूटनीति अपनाने की जरूरत है ताकि अगले साल के जी-20 के एजेंडे के शुरू होने से पहले ही क्षितिज पर छा रहे युद्ध के बादलों को साफ किया जा सके। वह पहले ही अपनी सलाह के माध्यम से यूक्रेन मुद्दे पर अपनी छाप छोड़ चुके हैं कि यह युद्ध का समय नहीं था। उनकी इसी बात से प्रेरित बात, बाली के घोषणापत्र में भी देखने को मिली कि ‘आज का युग, युद्ध का युग नहीं होना चाहिए।’

मोदी ने भारत को ‘बुद्ध और गांधी की पवित्र भूमि’ बताया और वे चाहते थे कि भारत में अगला जी-20 शिखर सम्मेलन, ‘विश्व के लिए शांति’ का अग्रदूत बने। यह एक बड़ा लक्ष्य है, जो शिखर सम्मेलन के, ‘एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य’ के सिद्धांत से भी मेल खाता है। हालांकि यह लक्ष्य बेहद चुनौतीपूर्ण है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)