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आचार्य किशोर कुणाल का कॉलम:अयोध्या में रामनवमी पर सदियों से लाखों भक्त जुटते रहे, राम हर काल और हर क्षेत्र में शिखरता के सोपान पर रहे हैं

2 महीने पहले
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आचार्य किशोर कुणाल, सचिव, महावीर मंदिर न्यास - Dainik Bhaskar
आचार्य किशोर कुणाल, सचिव, महावीर मंदिर न्यास

अयोध्या में भगवान श्रीरामचन्द्र के जन्मोत्सव रामनवमी के अवसर पर सदियों से भक्तों की भीड़ लाखों में जुटती रही है। जब देश की आबादी आज के अनुपात में बहुत कम थी, तब इतनी भारी संख्या में भक्तों का आना इस तथ्य का प्रमाण है कि राम हर काल और हर क्षेत्र में शिखरता के सोपान पर विराजमान रहे हैं। यहां उस भीड़ का संक्षिप्त विवरण देखते हैं, जो सरकारी दस्तावेजों या प्रामाणिक वृत्तांतों में उपलब्ध है।

1. सन 1908 में आक्सफोर्ड से ब्रिटिश सरकार की ओर से प्रकाशित इम्पिरियल गजेटियर ऑफ इंडिया में कहा गया है- ‘अयोध्या में तीन बड़े मेले लगते हैं, रामनवमी के अवसर पर मार्च-अप्रैल में, सावन में झूलन के अवसर पर जुलाई-अगस्त में और कार्तिक परिक्रमा के अवसर पर अक्टूबर-नवम्बर के दौरान।’ इन मेलों में चार लाख की भीड़ तो मामूली-सी बात है। किन्तु इस साल रामनवमी के अवसर पर यह भीड़ दस लाख लोगों की थी।

2. 1891 में लंदन से पर्यटकों के लिए प्रकाशित पुस्तक ‘पिक्चरस्क्यू इंडिया : ए हैंडबुक फॉर यूरोपियन ट्रैवलर्स’ में लेखक डब्लु. ए. कैन ने लिखा है- ‘अयोध्या में अनेक मन्दिर-मठ हैं। वहां महान पर्व रामनवमी के अवसर पर चार लाख से अधिक भक्त दर्शन के लिए आते हैं।’

3. 1881 ई० में डब्लु. डब्लु. हंटर ने इम्पिरियल गजेटियर ऑफ इंडिया में यह जानकारी दर्ज की- ‘यहां स्थानीय व्यापार कम होता है; लेकिन रामनवमी के महान पर्व में, जो हर वर्ष मनाया जाता है, पांच लाख लोग भाग लेते हैं।’

4. 1879 में नेशनल रिपोजिट्री नाम की आधिकारिक संस्था ने ये जानकारी दी कि- ‘महानपर्व रामनवमीं, जो हर साल मनाया जाता है, अभी समाप्त हुआ है। इसमें देश भर से करीब दस लाख लोग आए।’

5. 1859 में रामनवमी के अवसर पर महाराष्ट्र के विष्णु भट्ट गोडसे वर्सेकर अयोध्या आए थे। उन्होंने अयोध्या का विस्तृत विवरण लिखा है। 10 अप्रैल, 1859 के वृत्तांत में वे लिखते हैं - ‘रामनवमी में अभी कुछ दिन शेष बचे हैं। लेकिन अनुमान है कि सात से आठ लाख भक्त अयोध्या पहुंच चुके हैं। रामनवमी पर जनसैलाब के बारे में वे लिखते हैं कि आज कितनी उपस्थिति है, कहना मुश्किल है। यह कल्पनातीत है। किन्तु वे यह बतलाते हैं कि अधिकांश तीर्थयात्री दूर-दूर से आए और अलग-अलग भाषा बोलते थे; भाषा अलग थी, लेकिन भगवान् राम के प्रति श्रद्धा ने सबको प्रेम के सूत्र में बांध रखा था।’

इसके पूर्व 1631 में इटली के जोन्स डी लेट, 1634 में इंग्लैंड के थामस हर्बट और ऑस्ट्रेलिया के जोसेफ टिफेनथेलर ने रामनवमी का वर्णन करते हुए लिखा है कि इस पावन अवसर पर देश के हर हिस्से से भारी संख्या में भक्त आते हैं; किन्तु उन्होंने भक्तों की भारी भीड़ की संख्या नहीं बतलाई है।

सोलहवीं सदी में सम्राट अकबर के महान इतिहासकार अबुल फजल ने भी 1580 ई० के आस-पास ‘आइने-अकबरी’ में लिखा है- ‘चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को अयोध्या में विशाल धार्मिक मेला होता है जो विष्णु के सप्तम अवतार राम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है।’

सदियों से अयोध्या में रामनवमी के अवसर पर राम भक्तों की अपार भीड़ होती है, भक्तों की संख्या चार लाख से दस लाख के बीच में होती थी। ये तादाद कहती है कि प्रभु श्रीराम का ख्याति कितनी थी। आज व्यवस्थापकों को भारी भीड़ की चिन्ता होना स्वाभाविक है; किन्तु भीड़-नियंत्रण का पहला सिद्धांत होता है, भीड़ को अधिक-से-अधिक दूरी में रखना।

संकीर्ण स्थान में या एक ही विशाल क्षेत्र में भारी भीड़ का जमा होने देना बुद्धिमानी नहीं होती; क्योंकि छोटी-सी घटना या भगदड़ होने पर व्यापक जानमाल की हानि होती है। जब अतीत में दस लाख लोग भगवान् राम का दर्शन कर लेते थे, तब भविष्य में भी इससे बहुगुणित संख्या में दर्शन अवश्य कर पाएंगे; दूरदर्शिता एवं सम्यक नियंत्रण की कला होनी चाहिए। प्रभु श्रीराम की कृपा सब पर बनी रहे।

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