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रीतिका खेड़ा का कॉलम:विश्वविद्यालयों के रैंकिंग इंडेक्स उच्च शिक्षा के मकसद से धोखा हैं, विदेशी इंडेक्स में रैंकिंग को इतना महत्व क्यों

9 महीने पहले
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रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं - Dainik Bhaskar
रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं

यूनिवर्सिटी रैंकिंग इंडेक्स ज्यादातर विदेश, मुख्यतः अमेरिका में रचे गए हैं। इंडेक्स में प्रतिष्ठा को 30-50%, शोध को करीब 20%, यूनिवर्सिटी में नोबेल विजेता के लिए 5% वजन दिया जाता है। इन रैंकिंग की कमियों पर बहुत लिखा गया है। जैसे कि भारत की अन्य भाषाओं में छपे लेख शोध में नही गिने जाएंगे और प्रतिष्ठा को कैसे नाप-तोल सकते हैं।

कुछ यूनिवर्सिटी रैंकिंग इंडेक्स में एक सूचक है कि कैंपस में कितने अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी या प्रोफेसर हैं। तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय लोगों से कैंपस में विविधता बढ़ती है और शिक्षा में विविधता का अनुभव विद्यार्थियों के क्षितिज को व्यापक करता है। अमेरिका जैसे देशों में सामाजिक विविधता का महत्वपूर्ण पहलू हैं अफ्रीकी-अमेरिकी (अश्वेत) लोग, जिनका उच्च शिक्षा में आज भी प्रतिनिधित्व कम है। यदि विविधता बढ़ानी है, तो रैंकिंग में अश्वेतों की हिस्सेदारी शामिल होनी चाहिए। लेकिन चूंकि उनकी वहां के लोकतंत्र में आवाज कम है, अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों और शिक्षकों पर जोर दिया गया।

भारत में विश्वविद्यालय पहला मौका होता है, जब बच्चे घर के संरक्षित वातावरण से निकलकर कुछ हद तक स्वतंत्र सोच बनाते हैं। यहां भी विविधता की अहमियत है। अमीर-गरीब, अलग भाषा बोलने वाले, विभिन्न समुदायों में पले बच्चे, विश्वविद्यालय में घुलमिल जाते हैं। अमेरिका के विपरीत, भारत में बहुत विविधताएं हैं। यूनिवर्सिटी रैंकिंग में इस विविधता को शामिल करने के लिए कोई मानदंड नहीं है। यहां भी विदेशी विविधता के मानदंड को थोपे जा रहे हैं।

कहीं-कहीं अनुकूल प्रभाव है। जैसे इंडेक्स में छात्र-शिक्षक के अनुपात पर जोर होने से शिक्षकों की नियुक्तियां हुई हैं। लेकिन रैंकिंग दबाव के फलस्वरूप, कई विश्वविद्यालयों की प्राथमिकताओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। जो यूनिवर्सिटी रैंकिंग के चक्कर में हैं, उन्हें अब आस पड़ोस के देशों से छात्र आकर्षित करने पड़ रहे हैं।

मानो ये भूल गए हों कि यदि अच्छी शिक्षा दें, और संसाधन हों, तो अमेरिका, इंग्लैंड, चीन की तरह छात्र खुद आकर्षित होकर दाखिला लेंगे। आज भी, देश में छात्र अन्य शहरों में इसलिए जाते हैं क्योंकि वहां सबसे अच्छी शिक्षा प्राप्त हो। जैसे, आज भी देशभर से डिजाइन के लिए लोग अहमदाबाद स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन जाते हैं, ललित कला के लिए महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय प्रख्यात है, या अर्थशास्त्र के लिए कलकत्ता के कॉलेज छात्रों को आकर्षित करते हैं।

एक मानदंड जिससे शोध पर और बौद्धिक खोज पर बुरा असर पड़ा है, वह है कि प्राध्यापक ने कितने शोध लेख प्रकाशित किए हैं। साथ ही, उन लेखों को कितने अन्य लेखों में रेफर किया गया। इसके पीछे अवधारणा है कि आपकी रिसर्च को औरों ने पढ़ा है और इनसे समझ बढ़ने का काम हुआ हो। प्रकाशन (और कुछ हद तक साइटेशन) के आधार पर प्राध्यापकों का आकलन होता है; पदोन्नति भी इसपर निर्भर है। इसीलिए पेपर प्रकाशन का दबाव रहता है।

इस पर इतना जोर है कि ‘फर्जी’ जर्नल का मानो धंधा शुरू हो गया। साथ ही, चूंकि कॉन्फ्रेंस पेपर की भी गिनती होती है, इसलिए कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुतकर्ताओं की संख्या में हद से ज्यादा बढ़ोतरी हो गई है। वास्तव में यूनिवर्सिटी रैंकिंग एक धंधा है, जिससे आम जनता, उच्च शिक्षा पाने के इच्छुकों का बहुत फायदा नहीं होता। हर साल रैंकिंग पर केंद्रित विज्ञापनों पर कॉलेज भारी खर्च करते हैं। इसके लिए संसाधन जरूरी है। वही संसाधन विश्वविद्यालयों में सुविधाएं उपलब्ध कराने में लगा सकते हैं। इन रैंकिंग इंडेक्स से मानो शिक्षा की गुणवत्ता से ज्यादा महत्वपूर्ण, विश्वविद्यालय की रैंक हो गई है।

दुनिया के बारे में सीखने का मौका, विचारों की दुनिया में खोज, नए हुनर सीखने का अवसर, विश्वविद्यालय इस सबसे ज्यादा है। उच्च शिक्षा सामाजिक और आर्थिक गतिशीलता के लिए अहम है। इन उद्देश्यों को नाप-तोलकर एक इंडेक्स में समाने की कोशिश करना उच्च शिक्षा के मकसद से धोखा है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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