रश्मि बंसल का कॉलम:अपने लाडलों को कोई छोटा बिजनेस करने की चुनौती दें

2 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर - Dainik Bhaskar
रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर

किसी भी कॉलेज में जब मैं लेक्चर देने जाती हूं तो एक बात बार-बार सुनने को मिलती है- ‘हमें नौकरी की तलाश है।’ छोटे शहरों में सरकारी नौकरी, इंजीनियरिंग कॉलेज में आईटी क्षेत्र की नौकरी, एलीट कॉलेज में एमएनसी की नौकरी। रोज शर्ट-पैंट पहनकर कम्प्यूटर के सामने बैठने वाली नौकरी! वैसे मैं लेक्चर देती हूं आंत्रप्रेन्योरशिप के विषय पर कि आप अपना खुद का कारोबार खोलें। अलग-अलग उद्यमियों की कहानियों के द्वारा विद्यार्थियों को कुछ करने की प्रेरणा मिले, यही मेरा उद्देश्य है। मगर लेक्चर के पश्चात ज्यादातर सवाल एक ही तरह के होते हैं : ‘अगर हम फेल हो गए तो?’ फेल होना हमारे समाज-परिवार में एक बहुत बड़ा कलंक है। इनकम टैक्स की चोरी करना, घर में पत्नी के साथ मारपीट या फिर बूढ़े मां-बाप से बुरा बर्ताव- ये हम नजरअंदाज कर सकते हैं। लेकिन किसी का बच्चा क्लास में फेल हो गया तो हाय, पूरे मोहल्ले में खबर फैल जाती है। क्या फेल्योर इतनी बुरी चीज है? 32 वर्षीय करनवीर सिंह पिछले पांच साल से बेंगलुरू में पंजाबी रेस्तरां और क्लाउड-किचन चला रहे हैं। जब पहला आउटलेट खोला तो दो-तीन महीने तक उन्हें बहुत सारे निगेटिव रिव्यूज मिले। यहां तक कि उनका बावर्ची भी हताश हो गया। मगर हमारे सरदारजी लंदनवाले ने हार नहीं मानी। एक-एक कस्टमर को उन्होंने फोन किया और पूछा कि आपको हमारे खाने में क्या अच्छा नहीं लगा। कुछ ने कहा, क्वांटिटी कम है, कुछ ने कहा तेल ज्यादा है। मगर सब से बड़ी समस्या थी पैकेजिंग। पूरा फीडबैक लेने के बाद उन्होंने अपने काम करने के तरीके में परिवर्तन किया तो बिजनेस चल पड़ा। आज उनके 8 क्लाउड-किचन और 4 डाइन-इन रेस्तरां हैं। तो जो दुनिया की नजर में फेल्योर है, वो एक सकारात्मक और दृढ़-निश्चय वाले इंसान के लिए मौका है, कुछ सीखने का। वैसे बचपन में आप चलना कैसे सीखते हो? बार-बार गिरकर, उठकर, और वो भी बिना आंसू। मां-बाप प्रोत्साहित करते हैं, एक और कदम बढ़ाओ। मगर जैसे ही बच्चा थोड़ा बड़ा हुआ, हम चाहते हैं वो बिलकुल ठोकर न खाए। जो सक्षम हैं, वो आज अपने लाडलों को इतने ऐशो-आराम में रखते हैं कि उन्हें असली दुनिया का पता ही नहीं। ट्रेन या बस का सफर, गर्मी-सर्दी का अहसास, पैसे का अभाव जब आपने कभी देखा ही नहीं तो जूझने की शक्ति कहां से आएगी? इसी सिलसिले में एक कहानी शेयर करती हूं, जिसमें सीधा-सच्चा सबक है। एक 21 वर्षीय नौजवान नौकरी की तलाश में कोचीन शहर पहुंचा। न वो वहां की भाषा जानता था, न कोई घर-ठिकाना। मामूली नौकरी की तलाश में था, मगर हर जगह रिजेक्शन। पांच दिन के बाद एक बेकरी में जॉब मिली और लॉज में रहने का खर्चा पूरा हुआ। उसके बाद कॉल सेंटर, जूते की दुकान और फिर मैकडॉनल्ड्स में भी काम किया। शायद इस देश में ऐसे करोड़ों युवा हैं, मगर ये कहानी दिलचस्प इसलिए है कि द्रव्य ढोलकिया के पिताजी कोई आम आदमी नहीं। वो सूरत के हरे कृष्णा डायमंड एक्सपोर्ट्स के मालिक हैं, जिनकी कम्पनी की सालाना 6000 करोड़ की आय है। तो फिर उनका बेटा केरल में धक्के क्यों खा रहा था? असल में ये सावजी ढोलकिया की योजना थी कि मैं अपने बेटे को आम आदमी की जिंदगी का ऐसा अहसास दूं, जो उसे जिंदगी भर याद रहे। एक-एक वक्त की रोटी के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है। जीवन का एक ऐसा सबक जो आपको किसी स्कूल-कॉलेज में नहीं मिल सकता। महलों में पले इस नौजवान ने पिताजी का चैलेंज स्वीकार किया और उस पर खरा भी उतरा। तो आप अपने लाडलों को एक छोटा चैलेंज तो दे ही सकते हैं। कि एक महीना कुछ काम करो, अपनी पॉकेट मनी कमाओ। डोमिनोज़ या मैकडॉनल्ड्स में वैकेंसी तो बनी ही रहती है। लेकिन ‘अच्छे घर के बच्चे’ थोड़े ही वहां काम करते हैं। भाई लोग क्या कहेंगे? कहने दो, हमें बच्चे का भविष्य बनाना है। उसमें संघर्ष करने की शक्ति जगानी है। या फिर नौकरी नहीं, कोई छोटा बिजनेस करने की चुनौती दीजिए। अपनी लगन-परिश्रम से रुपए कमाने का मीठा भोग मूल रूप से उन्हें बदल देगा। सशक्त करना ही असली प्यार है, क्या ये चुनौती स्वीकार है?

जो सक्षम हैं, वो अपने बच्चों को इतने ऐशो-आराम में रखते हैं कि उन्हें असली दुनिया का पता ही नहीं। ट्रेन-बस का सफर, गर्मी-सर्दी, पैसे का अभाव जब देखा ही नहीं तो जूझने की शक्ति कहां से आएगी?

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)