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रश्मि बंसल का कॉलम:वॉट्सएप से ध्यान हटाएं, ज्ञान की गंगा में डूबें, ‘बैनिस्टर इफेक्ट’ से कीजिए अपने मन का कम्प्यूटर अपडेट

5 दिन पहले
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रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर - Dainik Bhaskar
रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर

सोचो कि आज है आपकी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण दिन। ऐसा दिन जो इतिहास के पन्नों पर हमेशा याद किया जाएगा। सुबह नींद से जागे तो खिड़की से झांककर देखा। उफ्फ ये बारिश! कम से कम आज तो मौसम थोड़ी शराफत दिखा देता। महीनों-सालों की मेहनत, लगता है सब पर पानी फिरने वाला है। और कल दोपहर पता है क्या हुआ? चलते-चलते आप फिसल गए, थोड़ी चोट लगी। एक तरफ भय, दूसरी तरफ हल्का उल्लास। शायद इस बहाने मुझे बंक मारने मिल जाए?

खैर सुबह तक शरीर तो बिल्कुल ठीक है, पर मन में अब भी हलचल। जो काम आज तक किसी ने नहीं किया, उसे करने की मेरी क्या औकात? धड़कते दिल के साथ आप ट्रेन में चढ़े और वहां मिले एक ज्ञानी। उन्होंने कहा कि जो उपलब्धि तुम चाहते हो, वो मुमकिन है। मैंने तुम्हारी प्रतिभा देखी-परखी है। शरीर वही करेगा, जिसका आदेश दिमाग देगा। दिमाग न-न कर रहा है तो मैदान में उतरने से पहले आप हार चुके हैं। इससे हिम्मत बढ़ी, आप वेन्यू पर पहुंचे। बारिश रुक गई।

मन की आंधी भी शांत हुई। पोजीशन लेने का वक्त आ गया। आप तैयार हैं, 3... 2... 1 और जीवन की निर्णायक रेस शुरू! फिर अहसास हुआ कि पैर मानो जमीन पर हैं ही नहीं, किसी अज्ञात शक्ति से ऊर्जित हैं। उस दिन, उस रेस में कमाल का प्रदर्शन हुआ। इंग्लैंड के रॉजर बैनिस्टर ने 4 मिनट के अंदर 1.6 किमी, यानी एक मील दौड़ कर दिखाया। लोग आश्चर्यचकित, क्योंकि विशेषज्ञों का मानना था कि इंसान के लिए यह मुमकिन नहीं।

उससे ज्यादा आश्चर्य की बात यह कि सिर्फ 46 दिन बाद ऑस्ट्रेलिया के जॉन लैंडिस ने बैनिस्टर का रिकॉर्ड तोड़ दिया। 6 मई 1954 से लेकर आजतक, 1400 एथलीट्स ने 4 मिनट से कम में एक मील दौड़ा है। इसे कहा जाता है ‘बैनिस्टर इफेक्ट’। यानी किसी एक सफलता को देखकर, बहुत सारे लोग प्रेरित होते हैं। उनका विश्वास, उनका हौसला बढ़ जाता है। और ये सिद्धांत सिर्फ खेल जगत में लागू नहीं होता। आस-पास देखें तो जिंदगी के हर क्षेत्र में आप इसे सच पाएंगे।

जब साधारण परिवार से कोई आईएएस/आईपीएस बनता है तो उसके मोहल्ले, उसके स्कूल के बच्चों में, उस दीदी या भैया की तरह बनने की ख्वाहिश जागती है। क्योंकि उन्हें अहसास होता है कि ‘हमारे जैसे’ लोगों में भी हुनर है। हम क्या कर सकते हैं, क्या बन सकते हैं, ये दो बातों पर डिपेंड है। एक, हमारे अंदर की महत्वाकांक्षा। दूसरी, हमारी मेहनत। रेस जीतने के सालों पहले, रॉजर बैनिस्टर लंच ब्रेक में दोस्तों को बहला-फुसलाकर ट्रैक पर लेकर जाकर अपने साथ दौड़ाते थे।

प्रैक्टिस कर-करके वे अपनी टाइमिंग बेहतर करते गए। एक मेडिकल स्टूडेंट होने के नाते वे जानते थे कि इंसान का शरीर कैसे काम करता है। उन्हें अहसास हुआ कि अगर मैं 4 मिनट एक सेकंड में एक मील भाग सकता हूं तो 4 मिनट से कम में भी हो सकता है। यह फिजिकल बैरिअर नहीं, सायकोलॉजिकल बैरिअर था। और रेस के दिन उन्होंने मानसिक हद को पार करके दिखा दिया। अक्सर हम समाज या परिवार को दोषी मानते हैं कि ‘उनकी’ वजह से मैं आगे नहीं बढ़ पाया।

लोग तो कई बातें कहेंगे, आपने सच मानकर अपने अंदर लक्ष्मणरेखा खींच दी। इंसान का दिमाग एक कम्प्यूटर की तरह है, उसे बार-बार अपडेट करना होगा। पुराने प्रोग्राम डिलीट करके, नए प्रोग्राम इंस्टॉल करने होंगे। एक आसान तरीका है। रोज बीस मिनट निकालकर किसी एक अचीवर के ऊपर गूगल सर्च करें।

उनकी आत्मकथा पढ़ें, वीडियो देखें। नोट्स लें कि उनके जीवन से क्या सीख मिलती है। आप जानेंगे कि तकदीर उन्हीं का साथ देती है, जिनके अंदर दम है, विश्वास है। वॉट्सएप फॉर्वर्ड से ध्यान हटाइए, ज्ञान की गंगा में मन डुबाइए। मनवांछित फल पाइए।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)