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रश्मि बंसल का कॉलम:इंदिरा नूयी की जिंदगी से मिला सबक...हमें बदलनी होगी पुरुष-प्रधान, प्रॉफिट-भगवान वाली सोच

2 महीने पहले
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रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर - Dainik Bhaskar
रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर

एमबीए विद्यार्थी के जीवन में दो सबसे महत्वपूर्ण दिन होते हैं। एक जब उसे एडमिशन की खुशखबरी मिलती है। दूसरा, नौकरी पाने के लिए उसका पहला इंटरव्यू। उस दिन एक बड़ा सवाल पैदा होता है। स्मार्ट दिखने के लिए मैं क्या पहनूं? लड़कियों को इस सवाल से ज्यादा जूझना पड़ता है। इसी दुविधा में थी एक छात्रा जिसे अमेरिका के येल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में दाखिला मिला था। मद्रास के मध्यमवर्गीय परिवार से उन्होंने अमेरिका का लंबा सफर तय किया था, स्कॉलरशिप और लोन के सहारे।

बिजनेस सूट खरीदने के लिए उनके पास थे सिर्फ पचास डॉलर। एक सस्ती दुकान से उन्होंने कपड़े खरीद तो लिए मगर इंटरव्यू के दिन जब शीशे में शक्ल देखी तो रोना आया। पैंट ऊंची थी, जैकेट ढीला। क्लास के बाकी लोग जो टिपटॉप तैयार थे, एक गंवार को देख हंसे। कोई चारा नहीं था, इसलिए ‘आई डोंट केयर’ एटीट्यूड के साथ मोहतरमा इंटरव्यू के लिए अंदर पहुंचीं। सवाल-जवाब का सिलसिला अच्छा गया मगर कमरे से बाहर निकलकर विद्यार्थी को अपने बेढंगे कपड़ों का फिर अहसास हुआ।

शर्म के मारे लाल, वो कॅरिअर डेवलपमेंट ऑफिस पहुंची और वहां की डायरेक्टर को परेशानी समझाई। डायरेक्टर ने पूछा, जब आप इंडिया में थीं तो इंटरव्यू के लिए कौन-सी ड्रेस पहनती थीं? जवाब आया ‘साड़ी।’ ‘अगले इंटरव्यू में आप साड़ी पहनिए’, डायरेक्टर ने कहा। ‘आप जो हैं, जैसी हैं, उन्हें स्वीकार करना चाहिए। और अगर नहीं किया तो उन्हीं का नुकसान है।’ विद्यार्थी को बात ठीक लगी। अगला इंटरव्यू उन्होंने कॉन्फिडेंस के साथ नीले रंग की साड़ी में दिया। कपड़ों की कोई चर्चा नहीं हुई।

सिर्फ बिजनेस के इर्द-गिर्द गहराई में पूछताछ। और आप अनुमान लगा चुके होंगे, नौकरी उन्हें मिली। साड़ी वाले इंटरव्यू के बाद भी और सूट वाले के बाद भी। यह कहानी है इंदिरा नूयी की। अपनी हाल में प्रकाशित आत्मकथा में उन्होंने अपने कॅरिअर के शुरुआती दिनों का यह दिलचस्प किस्सा शेयर किया। इंदिरा ने दूसरे इंटरव्यू वाली नौकरी स्वीकार की। शिकागो स्थित बूज़ एलन कंपनी में भी वे रोज़ साड़ी पहनती थीं। इस ऑफिस में स्कर्ट पहनने वाली औरतें भी सेक्रेटरी की पोस्ट पर ही थीं।

पर इंदिरा को हीन भावना महसूस नहीं हुई। दिमाग के बल पर उन्होंने मर्दों की दुनिया में अपनी एक पहचान बनाई। उनकी सफलता का दूसरा बड़ा राज़ था पति, परिवार और सहकर्मियों का सपोर्ट। जब इंदिरा प्रेग्नेंट थीं, हफ्ते के 3-4 दिन काम के सिलसिले में बाहर रहना पड़ता था। वे ठहरीं शाकाहारी, खाने की बड़ी समस्या। पहले पिज्जा से काम चल जाता था, पर अब पौष्टिक आहार जरूरी था। किसी तरह गुजारा चल रहा था। एक दिन वे ऑफिस पहुंचीं तो नोटिस बोर्ड पर कागज था।

सब सेक्रेटरीज ने मिलकर एक शेड्यूल बनाया कि सुबह-शाम इंदिरा क्या खाएंगी और कौन उसका इंतजाम करेगा। सालों बाद जब इंदिरा पेप्सी की सीईओ बनीं, उनकी असिस्टेंट बारबरा फोन पर बच्चियों की छोटी-मोटी समस्याएं सुलझा देती थीं। क्योंकि वे भी उनकी फैमिली का हिस्सा बन गई थीं। इंदिरा की मां, सास-ससुर और संयुक्त परिवार के सदस्यों ने, महीनों-सालों अमेरिका में रहकर, उनकी बच्चियों की परवरिश में सहारा दिया।

लेकिन इंदिरा को एहसास हुआ कि ऐसा सहारा ज्यादातर कामकाजी औरतों को नहीं मिलता, इसलिए वे कॅरिअर छोड़ देती हैं। क्योंकि आज भी बिजनेस की दुनिया का ढांचा आदमियों के हित में है। वो इस आधार पर बना है कि आदमी के पीछे एक औरत है, जो घर-परिवार संभाल रही है। कॉर्पोरेट जीवन दौड़ है जिसमें मां पीछे रह जाती है।

जापान, कोरिया व यूरोप में कामकाजी महिलाएं इसीलिए मां बनने से इनकार कर रही हैं। हमारी युवा पीढ़ी में भी यह ट्रेंड है। पुरुष-प्रधान और प्रॉफिट-भगवान वाले माइंडसेट को बदलना होगा। नहीं तो हमारे देश में भी परिवार का कंसेप्ट खत्म हो जाएगा। मदर इंडिया और फादर इंडिया को मिलकर एक नया इंडिया बनाना होगा।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)