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अमृत सागर मित्तल का कॉलम:केंद्र के संशोधित कृषि कानूनों के जरिए कृषि क्षेत्र में असल सुधारों में बहुत अधिक समय लगेगा

9 दिन पहले
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अमृत सागर मित्तल, पंजाब राज्य योजना बोर्ड के वाइस चेयरमैन, सोनालीका ग्रुप के वाइस चेयरमैन - Dainik Bhaskar
अमृत सागर मित्तल, पंजाब राज्य योजना बोर्ड के वाइस चेयरमैन, सोनालीका ग्रुप के वाइस चेयरमैन

खेती में कृषि भूमि (जोत) का आकार बहुत महत्व रखता है। देश के 70 फीसदी किसान छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनकी जोत एक हेक्टेयर से कम है। छोटी जोत की खेती में घाटा है, इस पर लागत कमाई से अधिक होती है। एनएसएसओ के मुताबिक दो हेक्टेयर भूमि मालिक किसान की औसतन आय 5240 रुपए प्रति माह है।

इन किसानों का पूरा परिवार खेती में लगा होने के बावजूद भी उपज सिर्फ खुद के उपभोग लायक होती है। केंद्र के कृषि कानूनों से कृषि क्षेत्र में दूरगामी सुधार हो सकते हैं पर छोटी जोत की खेती के साथ रोजगार का दूसरा विकल्प छोटे-सीमांत किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए जरूरी है।

अंशकालिक खेती के अलावा छोटे किसान के पास काम करने के लिए पर्याप्त समय है इसलिए वे अपने इलाके के आसपास की फैक्टरी में काम कर सकते हैं। इसके लिए ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में नए औद्योगिक निवेश को आकर्षित किया जाना चाहिए। पिछड़े और ग्रामीण क्षेत्रों में एक विशेष प्रोत्साहन पैकेज के साथ नए औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने से ग्रामीण भारत को रोजगार मिलेगा।

1991 में देश में आर्थिक उदारीकरण ने वैश्वीकरण और एफडीआई का मार्ग प्रशस्त किया, लेकिन इस उदारीकरण के साथ ही ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में औद्योगिक विकास को भी विराम लग गया। अर्थव्यवस्था के उदारीकरण से पहले पहले केंद्र सरकार केवल ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग को बढ़ावा देने के लिए सशर्त लाइसेंस और प्रोत्साहन पैकेज जारी करती थी। पिछले 30 वर्षों में औद्योगिक विकास ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों से विकसित शहरों के भीड़-भाड़ वाले औद्योगिक क्षेत्रों में स्थानांतरित हो गया है।

कोरोना महामारी से राहत पैकेज के रूप में केंद्र सरकार ने उद्योगों के लिए 1.96 लाख करोड़ रुपये की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन इससे ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में औद्योगिक निवेश आकर्षित नहीं होगा। इससे पहले, सरकार ने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को चार कोड में कोडित किया है, लेकिन ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में औद्योगिक निवेश को आकर्षित करने के लिए ये नीतियां पर्याप्त नहीं हैं।

ज्यादातर औद्योगिक निवेश दक्षिणी राज्यों की ओर इसलिए हो रहा है क्योंकि ये समुद्री पोर्ट के नजदीक हैं, लेकिन मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को साकार करने के लिए ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में रोजगार सृजन को अतिरिक्त प्रोत्साहन की जरूरत है।

औद्योगिक गलियारों और समूहों को विकसित करने के लिए विशेष प्रोत्साहन की पेशकश की जा रही है, लेकिन इस मॉडल को ग्रामीण व पिछड़े क्षेत्रों में रहने वाले छोटे किसानों को रोजगार के अवसर प्रदान करने के लिए दोहराया जाना चाहिए। रोजगार सृजन के पारंपरिक मॉडल का पुनर्मूल्यांकन किए जाने की जरुरत है। छोटी औद्योगिक इकाइयां खासकर शहरों के शाॅपिंग मॉल्स में बिक्री के लिए सब्जियों और फलों का प्रसंस्करण और पैकेजिंग एक बेहतर उद्यम हो सकता है। इसमें बड़े पूंजी निवेश की आवश्यकता भी नहीं है, किसान उत्पादक संगठन(एफपीओ) पिछड़े क्षेत्रों में ब्लॉक स्तर पर ऐसे उपक्रम स्थापित कर सकते हैं।

आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत को जो सपना महात्मा गांधी ने देखा था वह ग्रामीण इलाकों के किसानों-मजदूरों का शहरों की ओर पलायन रोककर ही पूरा किया जा सकता है। केंद्र के संशोधित कृषि कानूनों के जरिए कृषि क्षेत्र में असल सुधारों में बहुत अधिक समय लगेगा, लेकिन ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देकर लघु-सीमांत किसानों और खेतिहर मजदूरों को कृषि के अलावा रोजगार का एक सुरक्षित विकल्प दिया जा सकता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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