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प्रो. गौरव वल्लभ का कॉलम:अभी अतिरिक्त मुद्रा आर्थिक ही नहीं, नैतिक जरूरत भी है, आर्थिक रूप से प्रभावितों को मिले मदद

3 महीने पहले
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प्रो. गौरव वल्लभ, फाइनेंस के प्रोफेसर और कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता - Dainik Bhaskar
प्रो. गौरव वल्लभ, फाइनेंस के प्रोफेसर और कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता

कोरोना महामारी से प्रभावित होते हुए हमें 14 माह बीत गए हैं। यह स्पष्ट है कि हम वायरस के फैलने की गति का अंदाजा नहीं लगा सकते और यह स्वास्थ्य आपदा, गंभीर आर्थिक आपदा भी बन गई है। दूसरी लहर कमजोर पड़ चुकी है, तो सरकार का ध्यान दो क्षेत्रों पर होना चाहिए: पहला, तीसरी लहर रोकने की तैयारी कैसे करें और दूसरा, आर्थिक रूप से प्रभावित लोगों की मदद कैसे करें।

उपभोग पर चलने वाली हमारे जैसी अर्थव्यवस्था, जहां प्राइवेट डोमेस्टिक कंजम्पशन की जीडीपी में 60% हिस्सेदारी है, वहां महामारी के दौरान मांग कम रहना चिंताजनक है। कम मांग सेे मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियां 60% से कम क्षमता पर काम करने पर मजबूर हो गईं। इससे बेरोजगारी बढ़ी है और नए रोजगार के सृजन में बाधा आई है। बिजनेस व आर्थिक गतिविधियों के संचालन की बंद-शुरू (स्टॉप-स्टार्ट) प्रकृति से नौकरियों का नुकसान हुआ, वेतनभोगी वर्ग की आय कम हुई और लॉकडाउन में असंगठित क्षेत्रों में आय तो शून्य तक हो गई।

‘प्यू’ रिसर्च के मुताबिक, 2020 में भारत के मध्यम आयवर्ग के 3.2 करोड़ लोग निम्न आय वर्ग में और 7.5 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गए। सिर्फ दूसरी लहर में ही अप्रैल 2021 में 73.5 लाख और मई 2021 में 1.5 करोड़ नौकरियां गईं। जब ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2020’ में भारत 107 देशों में 94वें पायदान पर है तो सरकार की सहायता देने में भूमिका और जरूरी हो जाती है।

इस समय सरकार को आर्थिक रूप से प्रभावितों की मदद दो तरीकों से करनी चाहिए। पहला, लोगों के हाथों में सीधा पैसा दें। मैं 14 महीनों से इसकी वकालत कर रहा हूं। कोरोना के असर से आर्थिक रूप से प्रभावित लोगों के भोजन में पोषण की कमी हुई व उनके बच्चे शिक्षा से वंचित तक हुए। प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण उन्हें सम्मान से जीने में मदद करेगा, साथ ही अर्थव्यवस्था में नई मांग पैदा होगी।

दूसरा, निकट अवधि में सरकार भारी पूंजी व्यय पर जोर दे। इससे निजी क्षेत्र अपनी क्षमता का पूरा इस्तेमाल कर पाएगा व निवेश बढ़ेगा। आरबीआई के मुताबिक केंद्र सरकार द्वारा किए गए पूंजी व्यय पर एक गुणक प्रभाव है, जो अनुमानत: 2.45 है। अर्थात सरकार 1000 करोड़ रु. का पूंजी व्यय करती है तो जीडीपी 2,450 करोड़ रुपए तक बढ़ जाती है।

इस स्थिति में सरकार के पास राजस्व सृजन का क्या विकल्प है। ऋण एक विकल्प है, लेकिन वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए भारत का ऋण-जीडीपी अनुपात 90% तक पहुंच गया है। आर्थिक गतिविधियों के स्टॉप-स्टार्ट मॉडल के कारण सरकार का राजस्व घटा है और वित्तीय घाटा बढ़ा है। ऐसे में एक विकल्प है कि सरकार अतिरिक्त मुद्रा छापकर मांग पुनर्जीवित करने पर विचार करे। मांग सबसे निचले स्तर पर होने के कारण अतिरिक्त मुद्रा छापने से मुद्रास्फीति संबंधी जोखिम नहीं होगा। सबसे पहले 15 करोड़ सबसे गरीब लोगों की प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण से मदद करें।

सरकार की मानें तो अगले 6 महीने में पूर्ण टीकाकरण हो जाएगा। ऐसे में सरकार को 6 महीनों तक इन 15 करोड़ लोगों में 1000 रु. प्रति व्यक्ति, प्रति माह नकद हस्तांतरण करना चाहिए, जिसका खर्च 90 हजार करोड़ होगा। सरकार ने 2021-22 के लिए पूंजी व्यय बजट बढ़ाया था, लेकिन इसे जमीनी स्तर पर लागू करना जरूरी है। इसके लिए यदि सरकार अतिरिक्त रु. 60 हजार करोड़ अगले 6 महीनों में पूंजी व्यय के रूप में खर्च करे, तो इन दो प्राथमिकताओं पर कुल व्यय 1.50 लाख करोड़ होगा। पूंजी व्यय में अतिरिक्त 60 हजार करोड़ रुपए खर्च होने पर जीडीपी को करीब 1.5 लाख करोड़ रु. की बढ़त मिलेगी।

सरकार आपदा के समय में अतिरिक्त मुद्रा छापकर देशवासियों की मदद में झिझके नहीं। अमेरिका ने 2020 में महामारी के हमले के तुरंत बाद ऐसा ही किया था। उसने 3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर अतिरिक्त छापे, जो उसकी जीडीपी का करीब 15% है। हमारे लिए अतिरिक्त 1.5 लाख करोड़ रुपए छापना समझदारी भरा कदम होगा, न केवल आर्थिक रूप से बल्कि नैतिक रूप से भी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)