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रीतिका खेड़ा और ज्यां द्रेज़ का कॉलम:आधार से जुड़ी पांच तरह की परेशानियां और उनके निराकरण के सुझाव

9 दिन पहले
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रीतिका खेड़ा(अर्थशास्त्री दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं) और ज्यां द्रेज़(अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता) - Dainik Bhaskar
रीतिका खेड़ा(अर्थशास्त्री दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं) और ज्यां द्रेज़(अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता)

पिछले दस वर्षों से आधार पर बहसें होती रही हैं। पर हम इसमें नहीं पड़ते हुए ‘कल्याणकारी योजनाओं’ में आधार से संबंधित परेशानियों की ओर ध्यान दिलाना चाहते हैं। ये परेशानियां अक्सर लाखों लोगों के लिए, विशेष रूप से वंचित समूहों के लिए विकट स्थिति पैदा करती हैं। सवाल है कि संभावित सुरक्षा उपाय क्या हों? आइए आधार से संबंधित पांच तरह की परेशानियों और निराकरण पर बात करते हैं।

1. बहुत ज्यादा अनिवार्यता : सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि आधार प्रमाणीकरण को केवल भारत के राजकोष से मिलने वाले लाभों के लिए अनिवार्य बनाया जा सकता है। साथ ही आधार विफल होने पर सत्यापन के विकल्प होने चाहिए। बच्चों को इससे छूट दी गई थी। इसके बावजूद, आंगनबाड़ी सेवाओं या स्कूल नामांकन जैसे बुनियादी अधिकारों के लिए बच्चों से बार-बार आधार की मांग की जाती है।

वयस्कों के लिए आधार के विकल्पों में कमी है और अगर कोई विकल्प है भी तो लोगों को इसके बारे में अंधेरे में रखा जाता है। उपाय है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट का निर्देश माने और खासकर आधार की अनिवार्यता पर नियंत्रण के बजाय पर्याप्त विकल्प की व्यवस्था करे और बच्चों के लिए बिना शर्त छूट हो।

2. मनमानी : केंद्र और राज्य सरकारों ने आधार के साथ कल्याणकारी लाभ जोड़ने के लिए ‘अल्टीमेटम’ देने वाली मैथड लागू की है, अगर कोई आधार लिंक नहीं कर पाया, तो लाभ से वंचित रह जाता है। आमतौर पर, जब पेंशन बंद कर दी जाती है, नरेगा मजदूरी रुक जाती है, तब भी उन्हें न तो अग्रिम चेतावनी दी जाती है और न ही सूचित किया जाता है। सरकार को चाहिए कि कल्याणकारी योजनाओं से जिनका नाम हटाना है, उन संभावित लोगों को पहले सूचना दे और उचित कारण बताए। अपील के लिए उन्हें अवसर दिया जाना चाहिए। इसके अलावा ये मामले कारण के साथ सार्वजनिक किए जाने चाहिए।

3. आधार से जुड़ी सुविधाओं की कमी : आधार के लिए नामांकन, डाटाबेस में व्यक्तिगत जानकारी अपडेट करना और खोए हुए आधार नंबर फिर से पाना लोगों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बन गया है। आधार कार्ड में सुधार या अपडेशन गरीबों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण है। यूआईडीएआई को देखना चाहिए कि आधार नामांकन सुनिश्चित हो, साथ ही आधार में लंबी कतारों के बिना आधार बायोमेट्रिक या जनसांख्यिकीय विवरण का अपडेशन हो और सभी परिस्थितियों में खोए हुए आधार नंबर फिर से मिलें। ये भी देखना चाहिए कि ये सुविधाएं ब्लॉक स्तर पर या निचले प्रशासनिक स्तर पर निःशुल्क उपलब्ध हों।

4. गैरभरोसेमंद जानकारी : कई बार देखा गया है कि आधार कार्ड पर डेमोग्राफिक जानकारी अक्सर असत्यापित और गैरभरोसेमंद होती है, खास तौर पर व्यक्ति की उम्र। फिर भी आधार आधारित उम्र का उपयोग अक्सर वृद्धावस्था पेंशन या स्कूल में प्रवेश के लिए पात्रता की जांच करने के लिए किया जाता है। आयु के सत्यापन के उद्देश्य से आधार कार्ड का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। आधार डाटाबेस में उम्र में सुधार उन लोगों के लिए आसान बनाया जाना चाहिए, जिनके पास सहायक दस्तावेजों की कमी है।

5. भुगतान में गड़बड़ी: बैंक खातों को आधार से लिंक करने और सीधे लाभ ट्रांसफर करने (डीबीटी) के लिए आधार पेमेंट ब्रिज सिस्टम (एपीबीएस) का इस्तेमाल करने का दबाव बढ़ने से कल्याणकारी भुगतानों में देर से भुगतान, अस्वीकृत, डायवर्ट भुगतान और अवरुद्ध भुगतान, त्रुटियों की 4 प्रमुख श्रेणियां हैं। इससे कई योजनाओं पर प्रभाव पड़ रहा है।

सरकार को चाहिए कि स्वतंत्र विश्वसनीय संस्था द्वारा एपीबीएस और डीबीटी प्रणालियों की व्यापक समीक्षा की जाए। साथ ही आरबीआई और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम को सभी प्रकार की भुगतान समस्याओं की निगरानी करनी चाहिए और विस्तृत मंथली रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए। इसके अलावा सरकार को डीबीटी प्रणाली में ‘खाता आधारित भुगतान’ से ‘आधार आधारित भुगतान’ माइग्रेशन के रोक लगाने पर विचार करना चाहिए।

यहां साधन-संपन्न लोग भी इनमें से कुछ परेशानियों से मुक्त नहीं हैं, लेकिन वे ऑनलाइन सुविधाओं, निजी संपर्क और मिडिलमैन के कारण मिली सुविधाओं से कुछ हद तक सुरक्षित बने हुए हैं। पर गरीबों का कोई व्यक्तिगत कनेक्शन नहीं होता है और उनके लिए बिचौलिया ‘विकल्प’ अक्सर शोषण का एक स्रोत होता है।

(ये लेखकों के अपने विचार हैं)

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