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रीतिका खेड़ा का कॉलम:यह समझने की जरूरत है कि भेदभाव के खिलाफ लड़ने में हमारी क्या जिम्मेदारियां हैं

10 दिन पहले
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रीतिका खेड़ा, दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं। - Dainik Bhaskar
रीतिका खेड़ा, दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं।

यदि माहौल समावेशी हो, तो विविधता का फल मीठा हो सकता है, क्योंकि विविधता सीखने का सुनहरा मौका देती है। जाति, वर्ग, जेंडर, विकलांगता के लिए आरक्षण से हम कैंपस में विविधता लाने में सफल रहे हैं, अब समावेश पर काम करने का समय है। दो साल से आईआईटी दिल्ली में मैं पढ़ाने के साथ-साथ एसोसिएट डीन स्टूडेंट वेलफेयर के रूप में कार्यरत रही हूं। इस दौरान विद्यार्थियों की खुशहाली से जुड़े मुद्दों पर सोचने का मौका मिला।

संस्थान में बहुत विविधता है और ये विविधता एक स्टूडेंट को सीखने का अद्भुत मौका प्रदान करती है; सही मायने में- केवल किताबी ज्ञान नहीं- ‘शिक्षा’ प्राप्त करने का अवसर मिलता है। लेकिन इस विविधता के फल का स्वाद तभी मिल सकता है, जब संस्थान में भिन्न हालात से आने वाले विद्यार्थी अपने आप को इस माहौल में समावेशित महसूस करें, उनका स्वागत हो।

उदाहरण के लिए यदि कोई विद्यार्थी व्हीलचेयर पर हो या देख न पाए, तो अन्य सहपाठी उनसे दृष्टि या शारीरिक क्षति के बारे में बहुत कुछ सीख सकते हैं, लेकिन यह तभी होगा जब अन्य विद्यार्थी उनके प्रति खुलकर व्यवहार करें। हमें अहसास हुआ कि इसके लिए सक्रिय और संस्थागत कदम उठाने होंगे। इस सोच के साथ आईआईटी दिल्ली ने अब ऑफिस ऑफ डाइवर्सिटी एंड इन्क्लूज़न को स्थापित किया है।

इस ऑफिस के पांच स्तंभ हैं। जेंडर, सेक्सुएलिटी, डिसेबिलिटी, एससी/ एसटी सेल और मेंटल हेल्थ। संस्थान में जेंडर पर कुछ वर्षों में काफी काम हुआ है, क्योंकि छात्राओं और महिला अध्यापकों की संख्या हमेशा से बहुत कम रही है। संस्थान के जेंडर सेल ने इससे हो रहे नुकसान को रेखांकित किया है और कुछ उपाय भी सुझाए हैं। जैसे लड़कियों के लिए अतिरिक्त सीटें, जेईई के परिणाम के बाद जेंडर काउंसिलिंग, संस्थान के नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना।

इन सब मुद्दों पर काम हुआ है। बावजूद इसके कुछ विभागों में महिला प्रोफेसर बिल्कुल नहीं हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ हैदराबाद के छात्र रोहित वेमुला ने जब 2016 में अपनी जान ली, तब आईआईटी दिल्ली में कुछ दलित छात्रों के साथ हमने बात की। उनमें से एक छात्रा ने अपने कड़वे अनुभव साझा किए। दुखद है कि आरक्षित श्रेणी के विद्यार्थियों को यह अहसास दिलाया जाता है कि यह संस्थान उनके लिए नहीं हैं।

इस नए ऑफिस के जरिए विकलांग विद्यार्थियों को ऑफिस ऑफ एक्सेसिबल एजुकेशन द्वारा मदद की कोशिश होगी। उनका सपोर्ट करने वाली डिवाइस (जैसे घूमने के लिए व्हीलचेयर, दृष्टिबाधितों के लिए डिवाइस आदि), कैंपस में रहने के लिए हाउसिंग पॉलिसी, प्लेसमेंट कंपनियों को उनके प्रति संवेदनशील बनाना, खेल-कूद की सुविधाएं देने की कोशिश होगी।

उम्मीद यह है कि वह प्रभावशाली तरीके से पढ़-लिख सकें और जीवन को पूरी तरह से जी सकें। आईआईटी के माहौल में मानसिक दबाव काफी होता है, मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी है। छात्र ऐसी उम्र में यहां आते हैं जब वह दुनिया को स्वतंत्र रूप से पहली बार देखते हैं, खुद की पहचान समझने में लगे होते हैं।

संस्थान में पहले से ही काउंसलर्स हैं, जो छात्रों की चुनौतीपूर्ण समय में मदद करते हैं। उम्मीद है हम समाज में न्याय-समानता की नींव डाल सकें। जिन्हें भेदभाव या उपेक्षा का सामना करना पड़ा हो, उनका नजरिया बदलने का प्रयास है। यह समझने की जरूरत है कि भेदभाव के खिलाफ लड़ने में हमारी क्या जिम्मेदारियां हैं।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)