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रीतिका खेड़ा का कॉलम:भूख सूचकांक में खामियां हैं, पर कमी हमारी व्यवस्था में भी है

7 महीने पहले
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रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं - Dainik Bhaskar
रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं

अमर्त्य सेन ने महबूब-उल-हक़ के साथ मानव विकास सूचकांक बनाया था। एक बार सेन ने उनसे कहा कि वे ‘एक सिंगल, एक अंकीय सूचक बना सकते हैं, लेकिन वह बहुत भद्दा होगा।’ महबूब-उल-हक़ ने जवाब दिया, ‘ऐसा सूचक बनाओ जो जीएनपी (सकल राष्ट्रीय उत्पाद) जितना ही भद्दा हो, लेकिन जीवन की गुणवत्ता के बारे में उसकी तुलना में ज्यादा बताता हो।’ सेन ने चेतावनी दी कि हमें इसे ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए। यही तर्क वैश्विक भूख सूचकांक (जीएचआई) पर भी लागू होता है।

जीएचआई रैकिंग भारत में जनता का ध्यान इस ओर खींचने का उपयोगी अवसर है कि बहुत से लोग अब भी भोजन के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जीएचआई स्कोर किसी देश के चार संकेतकों के अंकों का औसत है, जिसमें प्रत्येक को बराबर महत्व देते हैं। ये संकेतक हैं: अपर्याप्त कैलोरी सेवन, वेस्टिंग (वजन के हिसाब से लंबाई), स्टंटिंग (उम्र के हिसाब से लंबाई) और बाल मृत्यु दर। स्टंटिंग और वेस्टिंग के लिए इसने 2016 से 2020 के बीच का डेटा इस्तेमाल किया है क्योंकि ये वार्षिक सर्वेक्षण नहीं हैं।

भारत के लिए यह राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस)-4 के 2015-16 के डेटा पर निर्भर है। हालांकि एनएफएचएस-5 सर्वे 2019-20 में किया गया, लेकिन पहले चरण के नतीजे ही दिसंबर 2020 में जारी हुए थे। भूख को मापना आसान नहीं है। कुछ भारतीय सर्वेक्षणों ने भूख मापने के लिए कुछ सवाल पूछे, जैसे क्या लोग ‘भूखे सोने’ या ‘कम बार खाने’ या ‘कम खाने’ के लिए मजबूर हैं। जीएचआई द्वारा भूख के दायरे में पोषण को भी शामिल करने का विचार स्वागतयोग्य है, फिर भी सूचकांक के घटक विवादास्पद हैं।

जीएचआई की अन्य सीमाएं भी उजागर हुई हैं। कितनी आबादी अपर्याप्त कैलोरी सेवन करती है, यह तय करने के लिए एफएओ (संयुक्त राष्ट्र का खाद्य एवं कृषि संगठन) के डेटा इस्तेमाल करने में बहुत से अवास्तविक अनुमान शामिल हैं। इस साल इन रैंकिंग तक पहुंचने की प्रक्रिया पर ध्यान गया है क्योंकि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने प्रक्रिया को चुनौती देते हुए बयान जारी किया है। सरकार का दावा है कि जीएचआई की रिपोर्ट में ‘जमीनी हकीकत और तथ्य नहीं हैं’, जिसके पीछे कई अनियमितताएं हैं।

उदाहरण के लिए पहले इसने कहा, ‘कुपोषण के वैज्ञानिक माप के लिए वजन व ऊंचाई के माप की जरूरत होगी, जबकि यहां शामिल प्रक्रिया गैलप के उस सर्वेक्षण पर आधारित है, जो पूरी तरह आबादी से फोन पर बातचीत पर आधारित है।’ बयान का पहला हिस्सा वैध है, लेकिन दूसरा हिस्सा नहीं है। इसी बयान के आखिरी वाक्य से स्पष्ट है कि ‘2020 की तुलना में, दो संकेतकों, बाल वेस्टिंग और बाल स्टंटिंग पर स्थिति में 2021 में कोई बदलाव नहीं हुआ है।’

क्या हमें भारत की कम रैंक (116 देशों में 101वीं रैंक) पर चिंतित होना चाहिए? शायद इसका जवाब उन्हें देखकर मिले जो हमसे ऊपर और नीचे हैं। हिंसा पीड़ित पड़ोसी अफगानिस्तान हमसे दो रैंक पीछे है। उत्तर कोरिया (जो लोकतंत्र नहीं है) की हमसे बेहतर रैंक (96) है। वेस्टिंग में भारत की दुनिया में सबसे बुरी रैंक है। सबसे जरूरी बात, अगर सिर्फ कुपोषण के मजबूत संकेतक स्टंटिंग को ही देखें तो भारत इसी तरह निचले पायदान पर है। भारत में भूख, पोषण और स्वास्थ्य को दशकों से नजरअंदाज किया जाता रहा है, इसलिए निचली रैंक कोई रहस्य नहीं है।

बाल पोषण कार्यक्रमों का बजट बहुत कम है, जिनमें 2014 के बाद से और कटौती होती रही है। कोविड-19 ने महत्वपूर्ण सामाजिक मदद को बाधित कर पोषण की स्थिति और बुरी कर दी है। यह देखा गया है कि पहले लॉकडाउन में आंगनवाड़ियों के बंद रहने से स्वास्थ्य तथा पोषण से जुड़े हस्तक्षेप भी रुक गए, जिनका समय से होना जरूरी होता है। इनके बंद रहने से बाल टीकाकरण, प्रसवपूर्व देखभाल व स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बाधित हुई।

शोधकर्ता ज्यां द्रेज़ और विपुल पैकरा ने अध्ययन में पाया कि पहले लॉकडाउन के दौरान इन सेवाओं की उपलब्धता, पहले की (बेसलाइन) अवधि की तुलना में बुरी तरह प्रभावित थीं। बाल टीकाकरण 65-74% पर था, प्रसवपूर्व देखभाल के लिए रजिस्ट्रेशन 78-80% पर आ गए व संस्थागत प्रसवों की संख्या 71-78% पर थी। याद रखें कि पोषण के नतीजे बच्चे के जीवन के 1000 दिनों में ही तय हो जाते हैं। इसलिए, गर्भवती और स्तनपान करा रही महिलाओं तथा 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों तक पहुंचना बहुत जरूरी है।

खुशकिस्मती से भारत में बाल पोषण के लिए आंगनवाड़ियों तथा बच्चों के लिए स्कूल में भोजन के जरिए जनकल्याण व्यवस्थाएं हैं। यह 20 करोड़ बच्चों तक पहुंचता है और 80 करोड़ लोगों के लिए जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) है। उनका पूरी तरह इस्तेमाल करने की बजाय, महामारी के दौरान ये ज्यादातर समय बंद ही रहे।

पीडीएस को विस्तार देने, आंगनवाड़ियों व स्कूलों में मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता सुधारने, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत मातृत्व लाभ को यूनिवर्सल करने और प्रक्रिया के सरलीकरण जैसे आसान विकल्पों पर काम किया जा सकता है। सरकार अब और इंतजार न करे।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)