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रीतिका खेड़ा का कॉलम:आधार को वोटर आईडी से जोड़ना सवालों में; ऐसे मामले में कभी भी ऐच्छिक जैसा कुछ नहीं होता!

5 महीने पहले
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रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री, दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं। - Dainik Bhaskar
रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री, दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं।

2009 में कांग्रेस की सरकार के दौरान, नंदन नीलेकणि ने आधार का प्रस्ताव रखा, तब इसका जोर-शोर से स्वागत किया गया। लेकिन इसकी मूल कल्पना में कई सवाल हैं। भारत में जहां पलायन इतने बड़े पैमाने पर होता है, क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि कोई व्यक्ति एक ही पते से जोड़ा जा सकता है? आधार में नामांकन-सुधार की प्रक्रिया ठेकेदारों के हाथों में है, वहां आश्चर्य की बात नहीं कि लोग मूल सेवाओं (जन्मतिथि-नाम में सुधार, पता अपडेट आदि) के लिए बिचौलियों के जाल में फंस जाते हैं।

आधार की कल्पना को ‘बेचने’ के लिए कहा गया कि देशवासियों के पास कोई भी पहचान पत्र नहीं। लेकिन आंकड़े दूसरी कहानी कहते हैं। आज भी आधार से देश की ज्यादा जनसंख्या के पास जन्म प्रमाण पत्र हैं। जानकारी के अनुसार कुल आधार में से एक प्रतिशत से कम ने ‘इंट्रोड्यूसर’ सिस्टम का प्रयोग किया (यह उनके लिए था जिनके पास और कोई पहचान पत्र नहीं) आधार के समर्थन में एक और तर्क ये था कि कल्याणकारी सेवाओं में फर्जी नाम की वजह से भ्रष्टाचार हो रहा है। यह तथ्यों के विपरीत था।

जन वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार जरूर था (आज भी है) लेकिन फर्जी नाम भ्रष्टाचार का बड़ा जरिया नहीं। सबसे ज्यादा अनाज की चोरी तब होती है जब लोग राशन लेने जाते हैं और वहां, हस्ताक्षर/मशीन में अंगूठा 20-25 किलो पर लगवाया जाता है, लेकिन कम दिया जाता है। इस तरह की चोरी को रोकने में आधार की कोई भूमिका नहीं। फर्जी नाम बहुत कम संख्या में थे, तो इस जरिए से चोरी भी बहुत कम थी। इस ‘चूहे’ को पकड़ने के लिए आधार को अनिवार्य बना दिया गया है, जिसके चलते कल्याणकारी योजनाओं का घर जलने की स्थिति में है।

आधार न बनवाने की स्थिति में (क्योंकि बीमारी की वजह से बिस्तर पर हैं या मशीन अंगुलियों के निशान नहीं ले रही आदि), आधार को सरकारी योजनाओं से न जोड़ पाने की स्थिति में या फिर अंगुलियों का सत्यापन फेल होने पर लाखों की संख्या में लोग हकों से वंचित हुए हैं। नीति आयोग की एक रिपोर्ट में प्रधान मंत्री वंदना योजना में पाया कि 28% पेमेंट गलत खाते में चले गए हैं। पीएम किसान योजना का पैसा भी सरकारी लोगों के खातों में गलती से आ गया है।

झारखंड में 2017 में लाखों लोगों के नाम पीडीएस से इसलिए काट दिए गए, क्योंकि उनके नाम के साथ आधार नहीं जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में कहा था कि आधार का उपयोग केवल कल्याणकारी योजनाओं के लिए हो, बच्चों को इससे बचाया जाए और निजी कंपनी इसे अनिवार्य रूप से नहीं मांग सकती। लेकिन सरकार ने इस सप्ताह संसद में एक ऐसा बिल पारित किया है, जिससे अब वोट डालने के लिए भी आधार को वोटर आईडी से जोड़ना होगा।

कहने के लिए कहा जा रहा है कि यह वॉलंटरी यानी ऐच्छिक है, लेकिन आधार के इतिहास से एक बात स्पष्ट है: वॉलंटरी यानी कंपल्सरी। पिछले कई सालों से हमने आधार से हो रहे नुकसानों पर शोध किया है। लोगों से पूछा कि उन्हें आधार में सुधार करवाने में दिक्कत आई या पैसे खर्च करने पड़े, तो लगभग आधे हाथ खड़े हो जाते हैं। सब को हैरानी होती है कि कितने लोग उन्हीं की तरह आधार से त्रस्त हैं।

हैरानी का कारण यह है कि आधार का प्रचार खूब जोरों से होता है, लेकिन इससे हो रहे नुकसान पर कभी-कभार ही खबर आती है- बच्चे को स्कूल में एडमिशन नहीं मिला, अस्पताल में दाखिले के लिए आधार मांगा गया, भूख से मौत हो गई, धोखाधड़ी इत्यादि।

सक्षम वर्ग को कहीं जरूर सहूलियत हुई होगी (जैसे नई सिम लेने में) आधार को वोटर आईडी से जोड़ना लोकतंत्र के लिए बड़ा आघात हो सकता है। इस तरह के किस्से पहले हो भी चुके हैं, जब बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा जैसे 8% मतदाताओं ने पाया कि उनके नाम वोटर लिस्ट से गायब हो चुके थे। यदि वोटर लिस्ट में खोट है तो सरकार को इन्हें काटने के दूसरे उपाय ढूंढने चाहिए।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)