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रीतिका खेड़ा का कॉलम:एनीमिया से लड़ने के लिए सरकार अब राशन के चावल में आयरन मिलाएगी

6 महीने पहले
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रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री, दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं। - Dainik Bhaskar
रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री, दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं।

हाल ही में केंद्र सरकार ने घोषणा की कि जन वितरण प्रणाली के चावल को आयरन से फॉर्टीफाइ (अधिक मजबूत या पोषक बनाना) करेगी। इसे एनीमिया (खून की कमी) के खिलाफ एक अहम कदम बताया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि यह एनीमिया के खिलाफ कितना कारगर साबित होगा? देश के आधे से ज्यादा बच्चे और महिलाएं खून की कमी (एनीमिया) से पीड़ित हैं। डॉक्टरों के अनुसार एनीमिया के कई कारण हैं, जैसे खुराक में आयरन की कमी, शरीर की आयरन ग्रहण करने की क्षमता में कमी, आदि।

अनुमानित आधे एनीमिक (एनीमिया पीड़ित) लोगों में आयरन की कमी इसका कारण है। यानी, जिन्हें अन्य कारणों से एनीमिया है, उन्हें इस सरकारी कदम से लाभ नहीं होगा। डॉक्टरों का मानना है कि ज़रूरत से ज्यादा आयरन से स्वास्थ्य को नुकसान भी हो सकता है। एनीमिया दूर करने के लिए आयरन की कमी की जांच व उसकी सही मात्रा भी ज़रूरी है। आयरन खाली पेट लेना चाहिए, भोजन के साथ लेने से शरीर इसे कम ग्रहण करता है। नेशनल हेल्थ सर्विस ने आयरन की कमी से एनीमिया होने पर दिन में 210-420 मिग्रा आयरन लेने की सलाह दी है।

चावल में मिलाया जाने वाला आयरन पाउडर इस मात्रा से कई गुना कम है। सूचना के अनुसार, एक किलो चावल में 28-42.5 मिग्रा आयरन मिलाने का प्रस्ताव है। यदि दिन में कोई एक किलो आयरन-परिपूर्ण चावल भी खा ले तो एनीमिया कम होने की कितनी उम्मीद है? सरकारी नीति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए, खाद्य सचिव ने बताया कि इस योजना को लागू करने से पहले सरकार ने 15 ज़िलों में इसे प्रयोग के रूप में चलाया।

कोई भी बड़ी नीति लागू करने से पहले प्रयोग करना ज़रूरी भी है और इसमें समझदारी भी है, क्योंकि इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि नीति कितनी कारगर सिद्ध होगी। खाद्य सचिव के अनुसार इसे लागू करने में बड़ी चुनौतियां हैं और इस प्रयोग के नतीजे निराशाजनक रहे हैं। पंद्रह में से केवल 11 ज़िलों में इसे लागू कर पाए। प्रयोग में आई आपूर्ति से संबंधित चुनौतियों का उल्लेख किया गया।

आयरन को चावल में मिश्रित करने के यंत्र, उसे मिश्रित करने की प्रणाली, एकरूपता से मिश्रण करने के वैज्ञानिक तरीकों की ज़रूरत, इन सब व्यवस्थाओं में क्या मुश्किल आई, उसे विस्तार से बताया। उदाहरण के लिए, चावल को आयरन, फॉलिक एसिड और विटामिन बी-12 से परिपूर्ण करने के लिए, चावल का आटा बनाकर, उसमें यह प्री-मिक्स (मिश्रण) मिलाकर, फिर उसे चावल के दाने के रूप में पुनर्संगठित करने का प्रस्ताव है।

इन दानों को बाकी चावल के साथ समान रूप से मिलाकर (ठीक से न होने पर इनसे स्वास्थ्य को नुकसान हो सकता है) पैक किया जाएगा। इन दानों का बिल्कुल चावल के दाने समान दिखना ज़रूरी है, वरना उन्हें चावल की ‘सफाई’ करते समय कंकड़ समझकर फेंक दिया जाएगा। उल्लेखनीय यह है कि इस पूरी व्यवस्था में कितने किस्म के निजी खिलाड़ी भी हैं (जैसे प्री-मिक्स सप्लायर, यंत्र के सप्लायर, इत्यादि)।

इससे निजी खिलाड़ियों पर नियंत्रण और निगरानी के सवाल भी उठते हैं। कौन सुनिश्चित करेगा कि इस पूरी प्रक्रिया का वे निर्देशानुसार पालन करेंगे? प्रयोग में हुई चुनौतियों के बावजूद सचिव का कहना है कि इसे अब व्यापक रूप से लागू किया जाएगा। क्यों? इस सवाल पर उन्होंने बताया कि इस प्रक्रिया के सभी साझेदारों को आश्वासन की ज़रूरत थी कि वह इसमें जो निवेश करेंगे, उसमें उनके लिए ‘बिजनेस प्रपोजिशन’ (व्यापारिक लाभ) क्या है।

उनकी पूरी बात सुनकर यह सवाल ज़रूर उठता है कि इस नीति को किसके लिए लागू किया जा रहा है। क्या इसे प्री-मिक्स सप्लायर व मिश्रण करने वाले कारखानों के लिए मांग की गारंटी बनाए रखने के लिए ला रहे हैं? यदि एनीमिया के खिलाफ कदम उठाने हों, तो क्या सभी को (बिना यह देखे कि उन्हें आयरन की ज़रूरत है भी या नहीं) इतनी कम मात्रा में, चावल के साथ आयरन मिलाकर देना समझदारी भरा नीति-उपाय है, जहां उसे पकाते समय कंकड़ समझकर फेंक देने और नुकसान पहुंचने (जैसे विषाक्तता) की आशंका हो?

चावल के फॉर्टिफिकेशन का निर्णय एक उदाहरण है जिससे यह पता चलता है कि कैसे टेक्नोक्रेसी (तकनीकी तंत्र), विज्ञान-विरोधी हो सकती है और निजी क्षेत्र के हित को प्राथमिकता देती है, न कि जनहित को। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और आंगनवाड़ियों में, जहां खून की जांच हो रही है, वहां एनीमिक जनसंख्या को चिह्नित करके, उन्हें आयरन की गोलियां देना बेहतर नहीं होगा?

साथ ही क्या लोगों में पोषण शिक्षा नहीं बढ़ाना चाहिए, जैसे आयरन किन खाद्य पदार्थों में अच्छी मात्रा में उपलब्ध है या इसे ग्रहण करने की दर को बढ़ाने के लिए विटामिन-सी की कितनी अहम भूमिका है, इत्यादि। इनका लंबे समय में लाभ होंगा और इससे सरकारी हस्तक्षेप की भी कम ज़रूरत पड़ेगी। इन उपाय को भारत समेत दुनियाभर में सफलता पूर्वक आज़माया गया है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)