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विराग गुप्ता का कॉलम:सरकारी सिस्टम को ठीक करने से ज्यादा जरूरी है कि अदालतें खुद के सिस्टम को ठीक करने के लिए ठोस कदम उठाएं

9 दिन पहले
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विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील - Dainik Bhaskar
विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील

भारत की न्यायिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न है और कोई पीड़ित व्यक्ति यदि अदालत में जाए तो उसे न्याय की बजाय छीछालेदर मिलती है। ऐसी बातें कोई आम आदमी बोले तो शायद उसके खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला बन जाएगा। लेकिन देश के पूर्व चीफ जस्टिस और राज्यसभा के सांसद रंजन गोगोई जब कैमरे के सामने बेबाकी से ऐसी स्वीकारोक्ति करें तो यह पूरे सिस्टम को शर्मसार करने का मामला बनता है।

चीफ जस्टिस बनने के पहले जनवरी 2018 में भी गोगोई ने चार जजों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सनसनीखेज आरोप लगाए थे। इस टूटे हुए सिस्टम को ठीक करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर उन्होंने क्या, कैसे और कितनी कार्रवाई की? इस विवाद में फंसने की बजाय गोगोई साहब के इस बयान पर सार्थक सहमति बनना चाहिए, जिसमें उन्होंने कहा है कि 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए भारत में न्यायिक सिस्टम को दुरुस्त करना होगा। जनवरी 2021 में देश की जिला अदालतों में लगभग 3.75 करोड़ और 25 हाईकोर्ट में लगभग 56 लाख मामले लंबित हैं। इनमें 70% से ज्यादा मामले फौजदारी के हैं, जिनमें बिलंब की वजह से लाखों बेगुनाह जेलों में सड़ रहे हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट पर गौर फरमाएं तो इन लंबित मामलों का फैसला आने में लगभग 324 साल लग सकते हैं।

भारत के शहरों का कायाकल्प करने के लिए नेता चीन, यूरोप व अमेरिका के मॉडल दोहराने की बात करते हैं। लेकिन यूरोप, अमेरिका की तर्ज पर जल्द न्याय का सिस्टम बनाने का अभी तक किसी सरकार ने प्रयास नहीं किया। गोगोई साहब के इंटरव्यू से प्रेरणा लेकर यदि सरकार, संसद और जज ठान लें तो इन छोटे चार कदमों से ही न्याय का भग्न मंदिर जगमग हो सकता है।
1. कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान समाज और अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ठप्प होने के बावजूद, अदालतों में 60 लाख से ज्यादा मुकदमों का बोझ बढ़ गया। थिंक टैंक सीएएससी की पेटीशन से जाहिर है कि आईपीसी की धारा 188 के तहत पुलिस को सीधे एफआईआर दर्ज करने का कानूनी हक नहीं है। इसके बावजूद देश के सभी राज्यों में छुटपुट मामलों में लाखों आपराधिक मुकदमे दर्ज कर लिए गए।

हमने इस मसले पर राष्ट्रीय बहस शुरू की, जिसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने ढाई लाख मुकदमे वापस लेने की नेक पहल की है। छत्तीसगढ़ और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के फैसलों को नजीर मानते हुए, अब सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में आदेश पारित करे तो सभी राज्यों में पुलिस, जनता और अदालतों को बेवजह के मुकदमों के बोझ से मुक्ति मिलेगी।
2. देश की राजधानी दिल्ली की जिला अदालतों के जज अपने घरों से ऑनलाइन सुनवाई कर रहे हैं। लेकिन अधिकांश मामलों में उनके पास कोई केस फाइल ही नहीं होती तो फिर सुनवाई और फैसला कैसे होगा? देश में एक लाख से ज्यादा मुकदमे 30 साल से ज्यादा पुराने हैं। सबसे पुराना मामला तो सन् 1951 से अदालतों में भटक रहा है।

बेहमई कांड में 20 लोगों के नरसंहार के आरोपियों को सजा दिलाने के लिए पीड़ित पक्ष अदालतों के चक्कर काट रहा है लेकिन केस डायरी नदारद होने से फैसला नहीं हो पा रहा। गोगोई साहब ने सही कहा है कि अदालतों में बड़ी कंपनियों और बड़े लोगों की ही सुनवाई होती है। लेकिन इसका खामियाजा तो आम जनता को ही भुगतना पड़ता है। पुराने लंबित मामलों पर पहले सुनवाई हो और नए दायर मामले कतार में सबसे पीछे जाएं। तभी सच्चे अर्थों में अदालतों में समानता और कानून का शासन लागू होगा।
3. न्यायिक व्यवस्था में मूलभूत बदलाव करने की बजाय, जजों की संख्या बढाने का प्रस्ताव, समाधान से ज्यादा समस्याएं बढ़ा सकता है। देश की निचली अदालतों में 5000 और हाईकोर्ट में 400 से ज्यादा जजों की वैकेंसी है। पिछले 2 साल से देश में विधि आयोग भी नहीं है।

पूर्व चीफ जस्टिस गोगोई के 13.5 महीने के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट के 14 और हाईकोर्ट के 146 जजों की नियुक्ति हुई थी। लेकिन रस्साकसी के चलते वर्तमान चीफ जस्टिस बोबड़े पिछले एक साल में अभी तक सुप्रीम कोर्ट में किसी भी जज की नियुक्ति नहीं कर पाए। इसलिए जजों की संख्या बढ़ाने से ज्यादा जरूरी है, खाली पदों पर भर्ती करना। इससे युवाओं को रोजगार के साथ जनता को जल्द न्याय मिलेगा।
4. जिला अदालतों में जजों की भर्ती तो परीक्षा और इंटरव्यू से होती है, लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मनमाने तौर पर जजों की नियुक्ति, ट्रांसफर और प्रमोशन होता है। सुप्रीम कोर्ट ने खुद के फैसले से जजों की नियुक्ति के लिए बनी कॉलेजियम प्रणाली को दोषपूर्ण और सड़ांधपूर्ण बताया था।

इसके बावजूद पिछले 6 सालों से सिस्टम को ठीक करने के लिए मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर यानी एमओपी में बदलाव के लिए सरकार और सुप्रीम कोर्ट में सहमति नहीं बन पा रही। ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’। सरकारी सिस्टम को ठीक करने से ज्यादा जरूरी है कि अब अदालतें खुद के सिस्टम को ठीक करने के लिए ठोस कदम उठाएं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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