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रुचिर शर्मा का कॉलम:अगर उत्पादकता को सुधारा नहीं गया, तो तेल और प्रॉपर्टी में तेजी के बीच वर्ल्ड कप की मेजबानी की खुशी ज्यादा दिन नहीं चलने वाली

17 दिन पहले
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रुचिर शर्मा ग्लोबल इन्वेस्टर बेस्टसेलिंग राइटर - Dainik Bhaskar
रुचिर शर्मा ग्लोबल इन्वेस्टर बेस्टसेलिंग राइटर

अगर दुनियाभर में मंदी के गम से कुछ राहत चाहते हैं तो इस गम के केंद्र यानी लंदन से फ्लाइट पकड़ें और किसी खाड़ी देश की राजधानी पहुंच जाएं। यह वह इलाका है, जहां आर्थिक वृद्धि के अनुमानों में इजाफा नजर आ रहा है। फीफा वर्ल्ड कप की मेजबानी कर दोहा खुशी से फूला नहीं समा रहा, वहीं कतर की होटलों के भर जाने पर बाकी लोगों का स्वागत कर रहे इसके पड़ोसी भी उत्साह से लबरेज हैं।

दुबई फिर रियल एस्टेट में तेजी का मजा ले रहा है। रियाद जैसे क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी भी दौड़ में हैं और तेल से हुए फायदे को प्रॉपर्टी के बड़े प्रोजेक्ट में बदल रहे हैं। खाड़ी के कई नेताओं को लगता है कि तेल और प्रॉपर्टी की ऊंची कीमतों के बल पर आई तेजी शायद ज्यादा न टिके, लेकिन यह पुरानी समस्या अभी इंतजार कर सकती है। फिलहाल तो पार्टी जारी है।

हर 300 मीटर में 28 इमारतों के साथ दुबई सबसे ऊंची इमारतों वाला शहर बन गया है। इनमें से ज्यादातर पिछले 10 साल में बनी हैं। मैनहैटन और चीन का शेनज़ेन भी इसके सामने फीके नजर आते हैं। पिछले 10 वर्षों के अपने तीसरे और सबसे शानदार रियल एस्टेट बूम में, दुबई बेची गई इमारतों की संख्या और मूल्य के रिकॉर्ड स्थापित कर रहा है। इसमें भी ज्यादा कीमत वाले मार्केट में कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। दुबई के मशहूर अरमानी से लेकर ज़ुमा जैसे ब्रांडेड रेस्त्रां में यही चर्चा होती है कि किस अरबपति ने अपने नए लग्जरी विला के लिए कितनी कीमत चुकाई।

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात- जिसमें दुबई और अबू धाबी शामिल हैं- की खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था में 75% हिस्सेदारी है। ज्यादातर वित्तीय केंद्र भी यहीं हैं। आईपीओ से होने वाली कमाई दुनियाभर में कम हुई है। न्यूयॉर्क में तो 95% घटकर 7 अरब डॉलर पर पहुंच गई। लेकिन रियाद में ये तीन गुना, अबू धाबी में पांच गुना बढ़ी है और दुबई में शून्य से 7 अरब डॉलर हो गई है।

खाड़ी देशों में तेजी धीरे-धीरे आई है। इसके पीछे संकट के पिछले दशक में लाए गए सुधार हैं। 2020 की शुरुआत में तेल की कीमतें बढ़नी शुरू होने से इसमें और तेजी आई। साल 2014 में, जब तेल की वैश्विक कीमतों में गिरावट आई तो दुबई में प्रॉपर्टी मार्केट पर बुरा असर हुआ। इसके बाद अमीरात ने वहां टैक्स-फ्री रहना और आसान बना दिया।

अब यह शहर और ज्यादा संख्या में विदेशी खरीदारों को आकर्षित करता है। इसमें बड़े हेज फंड से लेकर रूसी अमीर तक शामिल हैं, जो यूक्रेन युद्ध के बाद से लगी पाबंदियों से बचने का रास्ता तलाश रहे हैं। सऊदी ने 2014 में तेल की कीमत में गिरावट का सामना करने के लिए और व्यापक सुधार अपनाए। इसमें कार्य-प्रणालियों में सुधार, धार्मिक पाबंदियों को कम करना, महिलाओं के लिए काम करना आसान बनाना, विदेशियों को निवेश के लिए आकर्षित करना शामिल था।

सऊदी अरब जैसे देशों में प्रति व्यक्ति आय तभी विकसित दुनिया के देशों के स्तर की ओर बढ़ती है, जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं। तेल की कीमतें घटने पर यह आय फिर गिरने लगती है। तकनीक व उत्पादन में निवेश जरूरी है।

सार्वजनिक क्षेत्र में वेतन कटौती से सऊदी को अपने बजट को तब संभालने में मदद मिली, जब तेल की कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल से कम हो गई थीं। 2015 में यह 100 डॉलर थी। नौकरी करने वाली सऊदी महिलाओं की हिस्सेदारी पांच साल में दोगुनी होकर 35% हो गई है।

यहां बहुत समय बाद आने वाले लोग अब बॉर्डर पर महिला एजेंटों द्वारा अभिवादन किए जाने और देश में कॉफी शॉप डेटिंग और हैलोवीन पार्टियां आयोजित होते देख हैरान रह जाते हैं। एक दशक पहले तक यहां सार्वजनिक तौर पर महिला-पुरुषों के मिलने तक पर पाबंदी थी। हालांकि पुराने दिन पूरी तरह ओझल नहीं हुए हैं।

धार्मिक पुलिस अब हिजाब पर जोर नहीं देती, लेकिन ज्यादातर महिलाएं अब भी हिजाब पहनती हैं। विदेशियों को अब भी घुटने न दिखाने के लिए कहा जाता है। फिर भी सऊदी लोग ऐसे समय खुलेपन की ओर बढ़ रहे हैं, जब कई देश पीछे की ओर जा रहे हैं। भले ही ऐसा लास वेगास जैसी स्वच्छंदता के साथ न हो, लेकिन रियाद पूरी गंभीरता के साथ दुबई की व्यावसायिक केंद्र वाली हैसियत को चुनौती देना चाह रहा है।

उत्पादकता बढ़ाने में टेक्नोलॉजी बड़ी भूमिका निभाती है। इस मामले में खाड़ी देश हमेशा पीछे रहे हैं। सिटी रिसर्च के मुताबिक 1980 के बाद से- छह खाड़ी अर्थव्यवस्थाओं में- मुख्य उत्पादकता प्रतिवर्ष औसतन 2% घटी है। रिसर्च इसके लिए सरकारों को जिम्मेदार मानती है, जो अच्छे नियम नहीं बना सकीं और जरूरी ऋण उपलब्ध नहीं करा सकीं।

सऊदी अरब में तेल की कीमतें घटने पर प्रति व्यक्ति आय गिरने लगती है। खाड़ी देशों को समझना होगा कि तकनीक व उत्पादन में निवेश करने पर ही उनकी अर्थव्यवस्थाएं तेल और रियल एस्टेट में उछाल और गिरावट के दुष्चक्र से मुक्त हो पाएंगी। इसके बिना वे टिकाऊ तरक्की नहीं कर पाएंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)