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रुचिर शर्मा का कॉलम:आर्थिक मोर्चे पर ये कारक भारत और दुनिया को प्रभावित कर सकते हैं; 2022 की झलक दिखाने वाले 10 ट्रेंड

9 दिन पहले
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रुचिर शर्मा, ग्लोबल इन्वेस्टर, बेस्टसेलिंग राइटर - Dainik Bhaskar
रुचिर शर्मा, ग्लोबल इन्वेस्टर, बेस्टसेलिंग राइटर

महामारी ने दुनिया को नया आकार दिया है। इससे सबकुछ नहीं बदल रहा है, लेकिन जनसंख्या घटने से लेकर बढ़ते ऋण और डिजिटल क्रांति तक, अनेक चीजों में तेजी आई है। यहां बता रहे हैं कि ये रुझान 2022 में किस तरह से दुनिया और भारत का भाग्य परिभाषित कर सकते हैं।

1. जन्मदर में गिरावट : जन्मदर घटने से वैश्विक आर्थिक विकास दर कम हुई, महामारी के दौरान इसमें तेजी आई। जैसे ही वायरस फैला दुनिया भर में जन्मदर 4% तक गिर गई, चीन में यह 15% गिरी। चीन में कामकाजी उम्र की आबादी 2015 से कम हो रही है और अब इसी साल या अगले साल चीन की कुल जनसंख्या भी कम होने के रास्ते पर है।

2. चीन की आर्थिक शक्ति पीक पर: जन्मदर में कमी, बढ़ता कर्ज और सरकार की दखलंदाजी से धीमी हुई चीनी अर्थव्यवस्था 2021 में दुनिया की कुल जीडीपी की एक चौथाई थी, जो महामारी से पहले एक तिहाई थी। व्यापार से ‘आत्मनिर्भरता’ की ओर लिया गया चीन का ये टर्न अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ उसके संबंधों को कमजोर कर रहा है।

पांच साल पहले भारत समेत उभरते देशों के साथ चीन की जीडीपी का लगभग बेहतरीन संबंध अब शायद ही बचा है। स्पष्ट रहे कि चीन आज भी भारत और दुनिया में विकास के लिए मायने रखता है, लेकिन उतना नहीं, जितना वह कभी था।

3. वैश्विक ऋण जाल गहराया: चार दशकों तक बढ़ने के बाद, अब महामारी के दौरान सरकारी लेनदारी से वैश्विक ऋण में और तेजी आई है। अमेरिका, चीन और जापान समेत 25 देशों का कुल ऋण जीडीपी के 300% से ऊपर हो गया है। भारत की कहानी भी दुनिया जैसी ही है। यहां पिछले साल सरकारी उधारी बढ़ने से देश का कुल कर्ज जीडीपी के 160 से बढ़कर 185% हो गया था, जो बाद में 175% तक आया।

भारत जैसे कम आय वाले देश में ये कर्ज चिंताजनक रूप से ऊंचा है, इस तरह का ऋण कई बार दिक्कतों की ओर ले जाने वाला होता है। एक पक्ष ये है कि भारत का अधिकतर ऋण रुपए में है, यानी यह धन भारत के ही पास है, विदेशों के पास नहीं, हालांकि यह ऋण का अधिक जोखिम भरा रूप है।

4. मुद्रास्फीति बढ़ेगी पर शायद दहाई में न पहुंचे: जनसंख्या घटने का अर्थ कम श्रमिक-ऊंचा वेतन। व्यापार, धन और लोगों के प्रवाह के गैरवैश्वीकरण का अर्थ है कम प्रतिस्पर्धा। धीमी उत्पादकता से लागत बढ़ती है। ये सभी वजहें मुद्रास्फीति बढ़ा रही हैं, लेकिन कुछ अनुमानों में दिखाए गए डर के विपरीत इसे 1970 जैसे दहाई के स्तर पर नहीं ले जाएंगी।

2021 में सरकार का असामान्य रूप से उच्च प्रोत्साहन खर्च 2022 में कम होना चाहिए। तकनीकी बदलाव भी कीमतों पर नियंत्रण रखना जारी रखेंगे। एक बार के लिए, भारत अच्छे कारणों से मुद्रास्फीति से बाहर है। अमेरिका व दुनिया में महंगाई भविष्यवक्ताओं की उम्मीद से दोगुनी रफ्तार से दौड़ रही है, पर भारत में उपभोक्ता मूल्य स्तर पर ये धीमी है और 2005 के बाद पहली बार वैश्विक औसत महंगाई दर से नीचे है।

5. ग्रीनफ्लेशन: ये सबको पता है कि ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ लड़ाई तांबे-एल्यूमीनियम जैसी धातुओं की मांग बढ़ा रही है और हरित नीतियां हर तरह के कच्चे माल की आपूर्ति घटा रही हैं। पिछले 5-10 सालों में नए तेल, खनिज उत्पादन में निवेश 50 फीसदी तक कम हो गया है, क्योंकि स्थानीय और राष्ट्रीय सरकारें नई उत्पादन सुविधाओं के निर्माण का विरोध करती हैं और निवेशक जीवाश्म ईंधन से दूर भागते हैं।

इसका परिणाम उपभोक्ता कीमतों में ‘ग्रीनफ्लेशन’ है, जिसमें हाल ही में 1973 के बाद सर्वाधिक बढ़ोतरी हुई है। भारत सामान के बड़े आयातकों में शामिल है, जो उसे ‘ग्रीनफ्लेशन’ के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील बनाता है।

6. उत्पादकता विरोधाभास बना रहेगा: महामारी के दौरान डिजिटल सेवाओं के तेज इस्तेमाल से वैश्विक उत्पादकता ग्रोथ में लंबे समय से हो रही गिरावट के थमने की उम्मीद खत्म हो गई है, जो 1960 के मध्य के 5% से आज 1% तक गिर गई है। एशिया में 10 हजार कर्मचारियों पर िकए गए एक अध्ययन में पाया गया कि घर से काम करने में 20% अधिक समय लगता है, लेकिन आउटपुट में मामूली 0.5% गिरावट के साथ।

तकनीकी बदलाव में तेजी के बावजूद उत्पादकता में गिरावट का विरोधाभास कायम रहता है। दुनिया भर में उन कंपनियों की संख्या बढ़ रही है, जो ब्याज तक नहीं चुका पा रही हैं। भारत में इसमें थोड़ी कमी आई है, लेकिन इसके बावजूद ये लिस्टेड कंपनियों का 35% हैं।

7. डेटा का स्थानीयकरण: डेटा को छोड़ दें तो वायरस ने हर चीज (व्यापार, धन व लोग) को अंतर्मुखी कर दिया है। कुछ राजनीतिक कारणों से डेटा को नियंत्रित करके चीन का अनुसरण कर रहे हैं तो अन्य निजता की रक्षा के नाम पर डेटा का नियमन करके यूरोप का अनुसरण कर रहे हैं। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन के अनुसार चीन, सऊदी अरब, भारत और रूस के नेतृत्व में उभर रहे देशों में सबसे प्रतिबंधात्मक डेटा व्यवस्था उभर रही है।

8. बुलबुले फटेंगे: हालांकि इसे ‘हर चीज बुलबुला’ का युग कहा गया है, लेकिन कुछ चीजों में 12 महीनों में दोगुनी कीमतें होने से क्लासिक बुलबुला होने के संकेत दिखते हैं। इन बुलबुलों ने लोकप्रिय क्रिप्टोकरंसी, स्वच्छ ऊर्जा, बिना कमाई वाली अमेरिकी टेक कंपनियों की आश्चर्यजनक रूप से भारी हिस्सेदारी और कथित रूप से ब्लैंक चेक निवेश कंपनियों को घेरा हुआ है।

पिछले एक साल से अधिक समय में इन सभी संपत्तियों में उच्चतम स्तर से 35 फीसदी या अधिक गिरावट दिखी है, जिससे ये बुलबुले शायद ही उबर सकें। उम्मीद की किरण : तकनीक उन्मुख बुलबुले कई बार कुछ संभावित ताकतवरों को पीछे छोड़ जाते हैं और इन सभी बुलबुलों में नई तकनीक शामिल होती हैं।

9. छोटे निवेशकों का पागलपन थमेगा : अमेरिका से लेकर यूरोप तक नए व युवा निवेशक ट्रेडिंग अकाउंट खोल रहे हैं, स्टॉक खरीद रहे हैं और इसके लिए रिकॉर्ड गति से कर्ज ले रहे हैं। सबसे खराब यह है कि जब कॉरपोरेट इनसाइडर बिकवाली कर रहे हैं ये रिटेल खरीदार उतने ही उत्साही बने हुए हैं।

भारत में सक्रिय रिटेल निवेशकों की संख्या पिछले दो सालों में तीन गुना होकर 1.1 करोड़ से बढ़कर 3 करोड़ हो गई है। रिटेल निवेशक अब कुल ट्रेडिंग का 60 फीसदी हिस्सा हैं, जो महामारी के पहले के सालों में 40 फीसदी से भी कम था। इस तरह के उन्माद शायद ही टिकते हों, यह बताते हुए कि भले ही पूरा स्टॉक मार्केट खतरे में न हो, रिटेल निवेशकों के साथ ही सर्वाधिक लोकप्रिय नाम होने की संभावना है।

10. भौतिक दुनिया मेटावर्स से ज्यादा महत्वपूर्ण है : भाैतिक अर्थव्यवस्था के लिए 2021 में मेटावर्स को लेकर बनी हाइप में कमी आती दिख रही है, लेकिन मांग के रुझान कुछ और ही संकेत देते हैं। डिजिटल वासियों को भौतिक आश्रय की भी जरूरत होगी। नवयुवाओं ने 2021 में हाउसिंग बाजार को बढ़ाने में मदद की और इन्हीं की वजह से कार की कीमतें बढ़ रही हैं। हर अवतार की पीछे एक इंसान है और श्रमिकों की कमी से उन कामों में भी वेतन बढ़ रहा है, जिनको ऑटोमेशन से सबसे अधिक खतरा था, जैसे ट्रक चलाना।

जन्मदर कम तो विकास भी कम!
जन्मदर घटने से वैश्विक आर्थिक विकास दर कम हुई, महामारी के दौरान इसमें तेजी आई। भारत में महामारी से पहले ही पहली बार जन्मदर वैश्विक औसत से नीचे आ गई थी। हालांकि, देश में महामारी के दौरान जन्मदर डेटा उपलब्ध नहीं है, लेकिन मुंबई से मिले शुरुआती आंकड़ों से संकेत मिलता है कि यह गिरावट चीन जैसी ही है, 2021 में यहां प्रति हजार लोगों पर जन्म 101 रह गया है, जो 2020 में 120 था। जिन देशों की जन्मसंख्या वृद्धि दर कमजोर होती है, वे 8 से 9 फीसदी की उच्च विकासदर को कायम नहीं रख पाते हैं। ऐतिहासिक रूप से यह बस हुआ नहीं है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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