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रुक्मिणी बनर्जी का कॉलम:स्कूल के तीसरे सत्र पर संकट की आहट; सीखने-सिखाने की प्रक्रिया बच्चे के हिसाब से तय हो

14 दिन पहले
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रुक्मिणी बनर्जी, ‘प्रथम’ एजुकेशन फाउंडेशन से संबद्ध - Dainik Bhaskar
रुक्मिणी बनर्जी, ‘प्रथम’ एजुकेशन फाउंडेशन से संबद्ध

हम बदलावों के दौर में है। घर में लोगों का रहन-सहन, बाजार की गतिविधियां, कामकाज के तौर-तरीके भी बदले हैं। अगर स्कूली शिक्षा को दुनिया के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलना है, तो शिक्षा व्यवस्था और व्यवहार को गहराई से समझकर मूल रूप से बदलना होगा। आइए, इस विषय पर सोच-विचार करें। कोई भी पढ़ाई हो या सीखने-सिखाने की प्रक्रिया, बच्चे के वास्तविक स्तर को समझकर ही प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए।

बच्चे की रुचि, उनके सीखने का मनपसंद तरीका, उनके आसपास के माहौल को ध्यान में रखकर नियोजित करना होगा कि वे क्या-कैसे सीखेंगे। तय किए रास्ते पर, सीखने-सिखाने वाले, दोनों को सफर करना होगा। हमारी शिक्षा व्यवस्था का गठन कक्षावार सिलेबस के आधार पर किया गया है। सिलेबस के पीछे ये सोच ज़रूर रही होगी कि सभी बच्चों की पढ़ाई का मार्गदर्शन इससे हो पाए।

शायद दिए गए पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तकों की गति संपन्न और पढ़े-लिखे परिवारों के बच्चों के लिए मुश्किल नहीं है लेकिन आंकड़े और ज़मीनी अनुभव यह बताते हैं कि कक्षा तीन तक आते-आते पाठ्यक्रम आगे बढ़ जाता है और अधिकांश (70%) ग्रामीण और सरकारी स्कूल में जाने वाले बच्चे पीछे छूट जाते हैं। दो साल में महामारी से पीड़ित देश की स्थिति अब तक और भी बिगड़ गई होगी।

सवाल है कि क्या बदलाव ज़रूरी है? जवाब है हां, अगर हम चाहते हैं कि सभी बच्चों को आगे बढ़ने का मज़बूत और उपयुक्त मौका दें। कोविड में लंबे समय तक स्कूल बंद होने के कारण दूर से संपर्क बनाने के तौर-तरीके लोगों ने सीखने का प्रयास किया है। ऑनलाइन-ऑफलाइन गतिविधियां स्कूल बंद होने की वजह से की गईं। परंतु सवाल यह उठता है कि स्कूल अगर पहले की तरह नियमित रूप से खुला रहता है तो क्या हाइब्रिड मॉडल की आवश्यकता होगी?

स्कूल खुला होता है, तो बच्चों को सामूहिक रूप से पढ़ाया जाता है। सबके लिए एक ही किताब का इस्तेमाल, एक गति से होता है, लेकिन अचानक स्कूल बंद होने से नए तरीके ढूंढने पड़े। 2022 और आने वाले समय में क्या हम महामारी से मिली सीख आगे ले जा पाएंगे? आइए, बच्चों की शिक्षा को एक मंच के नजरिए से देखें। कोविड के पहले शिक्षक और अभिभावक की भूमिका स्पष्ट थी। माता-पिता, घर के अन्य सदस्य, बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजते थे। घर से बच्चा निकलता था और स्कूल पहुंचकर छात्र बन जाता था।

स्कूल में शिक्षक छात्रों को दिनभर आमने-सामने बैठाकर पढ़ाते थे। साल के आखिर में परीक्षा होती और छात्र अगली कक्षा में प्रवेश कर जाते। हर एक की जिम्मेवारियां दूसरे को पता थीं- अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजेंगे और शिक्षक छात्रों को पढ़ाएंगे। फिर, करीब दो साल पहले स्कूल अचानक बंद हो गए। पहले तो हमारे रंगमंच पर सन्नाटा फैल गया। धीरे-धीरे लोग हाथ-पैर मारने लगे। एक-दूसरे की तरफ हाथ बढ़ाने लगे। अभिभावक घर में अपने-अपने तरीके से बच्चों की पढ़ाई में हाथ बंटाने लगे।

शिक्षक छात्रों के घर तक पहुंचने लगे। मौका मिलने पर माता-पिता स्कूल तक जाने लगे। मोहल्ले में भी पढ़ने-पढ़ाने की प्रक्रिया चलने लगी। रंगमंच के अभिनेता-अभिनेत्री बदलने लगे, वेश-भूषा अलग-अलग दिखाई देने लगीं। एक दूसरे के संगीत से लोग प्रभावित होने लगे। वास्तव में रंगमंच रंगीन हो गया। उम्मीद करते हैं, कहानी ऐसे ही आगे बढ़े। बच्चों के सीखने-सिखाने में सबका मज़बूत सहयोग बना रहे।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)