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रुक्मिणी बनर्जी का कॉलम:‘असर’ की ताजा रिपोर्ट ने रखे जमीनी हालात; स्कूली शिक्षा बेहतर करने में आंकड़े होते हैं मददगार

19 दिन पहले
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रुक्मिणी बनर्जी, ‘प्रथम’ एजुकेशन फाउंडेशन से संबद्ध - Dainik Bhaskar
रुक्मिणी बनर्जी, ‘प्रथम’ एजुकेशन फाउंडेशन से संबद्ध

2005 से ‘असर’ यानी एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट लगातार पूरे देश की शिक्षा की स्थिति की झलक हमें दिखा रही है। क्या बच्चे स्कूल जाते हैं? क्या वे आसान कहानी पढ़ पाते हैं? क्या वे साधारण गणित के सवाल हल कर लेते हैं? इन प्रश्नों के उत्तर के लिए ‘असर’ सर्वेक्षण देश के हर जिले में किया जाता है। हर जिले से 30 गांव चुने जाते हैं। हर गांव में 20 परिवार और हर परिवार के सभी बच्चों की जानकारी ली जाती है।

कुल मिलाकर सालाना छह लाख बच्चे इस सर्वे में शामिल होते हैं। ‘असर’ रिपोर्ट के अनुसार 6 से 14 वर्ष के 96% से ज्यादा बच्चे विद्यालय में नामांकित तो हैं पर उनके पढ़ने और गणित की बुनियादी क्षमता को मजबूत करने की बेहद जरूरत है। तीसरी कक्षा में 30% से कम बच्चे उस कक्षा के शैक्षणिक स्तर पर हैं। यानी 70% बच्चे अभी भी सरल पाठ नहीं पढ़ पाते हैं। ‘असर’ के काम का असर नई शिक्षा नीति 2020 पर भी पड़ा है।

एनईपी में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अगर तीसरी कक्षा तक पढ़ना और साधारण गणित नहीं सीख लेते हैं, तो बाकी शिक्षा नीति का कोई मतलब नहीं रहेगा। गौर करने वाली बात यह है कि ये सारी बातें कोविड के पहले की हैं। फिलहाल, डेढ़ साल तक विद्यालय बंद रहे हैं। महामारी के दौरान घर-घर जाकर सर्वेक्षण करना संभव नहीं था।

आमतौर पर ‘असर’ सर्वेक्षण में बच्चे के साथ बैठकर उसके साथ पढ़ने की गतिविधि और गणित के आसान सवाल हल करने की प्रक्रिया की जाती है। चूंकि महामारी काल में हम बच्चों के घर नहीं जा पाए, इसलिए 2020 और 2021 में ‘असर’ की जानकारी फोन पर ली गई। फोन पर नामांकन के बारे में पूछा गया, घर में पढ़ाई कैसे करते हैं, स्कूल से उपलब्ध होने वाले सुविधाओं के बारे में जाना।

25 राज्यों व 581 जिलों में 75,234 बच्चों की जानकारी पर आधारित, 17 नवंबर 2021 को आई ‘असर’ 2021 रिपोर्ट के इन मुद्दों पर चर्चा हो सकती है-

पहला, हर राज्य में सरकारी स्कूल में नामांकन बढ़ा है। सरकारी स्कूल में नामांकित बच्चों की संख्या (लड़के-लड़कियां दोनों) 2018 की तुलना में 2021 में बढ़ी है। 2021 में 6 से 14 आयु वर्ग के 70% बच्चे सरकारी स्कूल में नामांकित हैं। अ-नामांकित बच्चों का अनुपात बढ़ा तो है, इन आंकड़ों में छोटे उम्र के बच्चे ज्यादा हैं। 7-10 साल आयु-वर्ग के 4.7% लड़कों का नाम स्कूल में नहीं है (ये आंकड़ा 2018 में 1.7% था) उसी आयु वर्ग की लड़कियों का आंकड़ा 4.1% है।

दूसरा, निजी स्कूल में नामांकित बच्चों की संख्या महामारी काल में घटी है। साथ ही ट्यूशन जाने वाले छात्रों की संख्या हर जगह बढ़ती नजर आ रही है। तीसरा, 2018 में 35.5% परिवारों के पास स्मार्टफोन था, 2021 तक यह आंकड़ा 67.6% तक पहुंच गया है। लगभग 28% परिवारों ने बताया कि महामारी काल में बच्चों की पढ़ाई के लिए फोन खरीदा है। पर घर में स्मार्टफोन होने के बावजूद एक चौथाई बच्चों की पढ़ाई के लिए फोन का इस्तेमाल नहीं हो पाया है।

यह बात ध्यान रखना जरूरी है कि घर में फोन होने का मतलब यह नहीं है कि फोन बच्चों के हाथ में हो। चौथा, पिछले साल भी देखा गया था कि सितम्बर तक 84% सरकारी स्कूल के बच्चों के हाथ में पाठ्यपुस्तक पहुंच गई थी। 2020 में निजी स्कूल के 72% बच्चों के पास पाठ्यपुस्तक थी। 2021 सितम्बर में 92% सरकारी स्कूल और 90% निजी स्कूल के बच्चों के पास पाठ्यपुस्तकें पहुंच गई थीं।

पांचवां मुद्दा कोविड के दौरान परिवार के लोगों बच्चों की पढ़ाई में मदद की। पर अब जब स्कूल खुल रहे हैं, पारिवारिक सहायता घटती हुई दिखाई दे रही है। स्कूली शिक्षा के आगे के नियोजन के लिए आंकड़े और शोध महत्वपूर्ण होते हैं। जमीनी हालात को नजर में रखते हुए आगे के कदम उठाने होंगे।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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