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रुक्मिणी बनर्जी का कॉलम:विद्यालयों और गांवों के अनोखे प्रयास; हमारे स्कूलों के लिए सपना जो बन सकता है हकीकत

3 महीने पहले
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रुक्मिणी बनर्जी, ‘प्रथम’ एजुकेशन फाउंडेशन से संबद्ध - Dainik Bhaskar
रुक्मिणी बनर्जी, ‘प्रथम’ एजुकेशन फाउंडेशन से संबद्ध

छत्तीसगढ़ में विद्यालय कई महीने पहले खुल गए हैं। रायपुर से, हाईवे तीर की तरह दक्षिण की ओर चला जाता है। थोड़ी देर में हम ग्रामीण इलाकों में पहुंच गए। हरे सुनहरे धान के खेत, आगे-पीछे पहाड़ी। कई पहाड़ों के ऊपर बड़े-बड़े पत्थर दिख रहे थे, मानो किसी ने बड़ी लगन से सजा कर रखे हैं। रायपुर से 160-170 किलोमीटर दूर हम कांकेर जिले में आ पहुंचे। महामार्ग छोड़कर, छोटे रास्ते से होते हुए, एक छोटे गांव में आ गए।

गांव के बीचों-बीच विद्यालय बना हुआ था। हम फाटक खोलकर अंदर पहुंचे। विद्यालय की इमारत वैसी ही थी, जैसी अक्सर सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की होती है, दो-तीन कमरे और एक बरामदा लेकिन पाठशाला परिसर में तीन बड़े और पुराने पेड़ ऐसे लगे थे कि पूरे प्रांगण को हल्की छांव मिल रही थी। बरामदे के सामने क्यारी में छोटे-छोटे, रंग-बिरंगे फूल दिख रहे थे। कक्षा के बाहर पंक्ति में काले-काले जूते और उनमें रखे लाल मोज़े दिख रहे थे।

इस लाइन से ज़ाहिर था कि आज बहुत सारे बच्चे विद्यालय में मौजूद हैं। पहली और दूसरी कक्षा के बच्चे एक साथ बैठे थे। पंक्ति से दरी पर बैठे बच्चे गणित का सवाल हल कर रहे थे। कोई 5+2 हल कर रहा था, तो कोई 6+3, लेकिन कॉपी पर नहीं बल्कि हर बच्चे के पास 10-12 कंकर-पत्थर का ढेर था। सवाल के अनुसार बच्चे पत्थर गिन रहे थे और सामने ज़मीन पर हल लिख रहे थे।

गिनने की, चॉक से ज़मीन पर लिखने की आवाज़ जैसी हल्की-हल्की आवाजों से कमरा भरा था। एक अंकीय कोई भी सवाल किसी बच्चे को दे दें, वह झट से आपको हल करके बता देगा। थोड़ी देर बाद हम सभी बाहर गए। खेल के मैदान में, भाग-दौड़ के साथ शोर मचने लगा। ऐसी खुशी की, खेलने की आवाज़ जो हिंदुस्तान की लाखों पाठशालाओं में महीनों से सुनी नहीं गई है। थोड़ी देर में मध्यांतर भोजन का समय हो गया।

बताना नहीं पड़ा, बच्चों को पता था क्या-क्या करना है। दौड़-दौड़कर थालियां लाई गईं, परिसर की दीवार के पास नलके में अच्छी तरह उन्हें धोया गया, एक-दूसरे को हाथ धोने के लिए आवाजें लगाई गईं और वे भागकर बरामदे में बैठ गए। खाना बनाने वाली मौसीजी सभी को प्यार से खाना परोसने लगीं। ऐसे सुंदर स्कूल में आकर मेरा दिल भर गया। उसी दिन शाम को, उसी जिले के एक और गांव में जाने का मौका मिला।

वहां पहुंचने के लिए कुछ देर तक जंगल के रास्ते पर सफर करना पड़ा। गांव में पहुंचते ही एक कमरा दिखा। कमरे के बाहर बरामदे में स्कूल जाने वाले उम्र के बच्चे गोले में बैठकर पढ़ाई कर रहे थे। वहीं की एक कॉलेज जाने वाली युवती उनकी मदद कर रही थी। पास ही दो बुज़ुर्ग महिलाएं बैठी थीं। दादी ने हमें बताया, गांव के हर मोहल्ले में ऐसे ही बच्चों के समूह शाम को एकसाथ बैठकर पढ़ाई करते हैं।

उस टोले-मोहल्ले का कोई स्कूल या कॉलेज जाने वाला लड़का या लड़की, बच्चों के साथ एक-डेढ़ घंटा बिताता है। छोटे बच्चों के लिए, उनकी माताओं का समूह है। समूह में चर्चा होती है और गतिविधियां भी। ये गतिविधियां मां आसानी से, काम के साथ-साथ बच्चों संग कर सकती हैं। दोनों दादियां एक मोहल्ले से दूसरे में जाती हैं, बच्चों को कहानियां सुनाती हैं।

अंधेरा होने लगा था। दादी ने दिवाली के लिए मुझे हाथ से बना तोहफा दिया, धान के पौधे से बना झूमर, जिसे घर के दरवाजे पर लगाते हैं। घर सजाने के साथ-साथ इससे चिड़िएं दाना भी खा सकती हैं। आपको लग रहा होगा कि यह सपना है, नहीं यह हकीकत है। यह हमारी भी हकीकत हो सकती है, अगर हम भी अपने विद्यालय में और गांव में प्रयास करें।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)