साधना शंकर का कॉलम:अपडेट रहने की इच्छा के चलते आज लोग हर मैसेज और पोस्ट को देखना चाहते हैं

11 दिन पहले
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साधना शंकर, लेखिका, भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी - Dainik Bhaskar
साधना शंकर, लेखिका, भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी

डिजिटल डिटॉक्स और डिजिटल वेल-बीइंग के बारे में पहले ही बहुत कुछ कहा जा चुका है, लेकिन हमारे जीवन में सूचनाओं के ओवरलोड पर इतनी बातें नहीं कही जा रही हैं। आज हर किसी के पास स्मार्ट फोन है और सभी एक हाइपर-कनेक्टेड दुनिया में जी रहे हैं। फोन में मौजूद एप्स और पहने जा सकने वाले वियरेबल्स- जो आपकी फिटनेस, हेल्थ, फाइनेंस, रोशनी के लिए एक्सपोजर या नींद की गुणवत्ता तक पर नजर रखते हैं- यूजर्स के लिए अनवरत डाटा जनरेट करते रहते हैं।

इन गैजेट्स से मिलने वाला डाटा अकसर यूजर्स के द्वारा ठीक से समझा नहीं जाता है। मिसाल के तौर पर अगर आप किसी फाइनेंस सम्बंधी एप का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन मार्केट में होने वाली हलचलों को ठीक से समझ नहीं पाते तो इससे आपको बहुत कंफ्यूजन और घबराहट हो सकती है। डाटा और इंफॉर्मेशन सोशल मीडिया पर भी निरंतर स्ट्रीम होते रहते हैं। न्यूज, व्यूज और सूचनाओं से हमारा जीवन भर गया है और अकसर हम बिना सोचे-समझे कुछ भी देखते रहते हैं।

हमारे पास उस सबको प्रोसेस करने का भी समय नहीं होता। इससे भी भ्रम और तनाव की स्थिति बनती है। वैसे यह 1450 में ही शुरू हो गया था, जब जर्मन मुद्रक योहानेस गुटेनबर्ग मूवेबल टाइप टेक्नोलॉजी लेकर आए थे। इसके बाद छपी हुई सामग्रियों की बाढ़ आ गई थी। फिर कार्बन पेपर, साइक्लोस्टाइलिंग और फोटोकॉपी का आगमन हुआ। छपी चीजों की प्रतिलिपि बनाना आसान हो गया तो सूचनाओं का ओवरलोड बढ़ा। डिजिटलीकरण इस समस्या को दूसरे ही स्तर पर ले गया, क्योंकि उसमें महज एक बटन दबाने से प्रकाशन सम्भव है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, वर्ष 2010 में पूरी दुनिया में निर्मित और उपभोग की जाने वाली सूचनाओं की मात्रा 2 ज़ेटाबाइट्स थी। अब यह आंकड़ा बढ़कर 97 ज़ेटाबाइट्स पर पहुंच गया है और 2025 तक 181 ज़ेटाबाइट्स तक पहुंच सकता है। याद रहे कि एक ज़ेटाबाइट एक ट्रिलियन जीबी के बराबर होता है। सूचनाओं का यह ओवरलोड व्यक्तियों के लिए निराशा और तनाव का कारण बन सकता है। अगर आप किसी फिटनेस एप का इस्तेमाल कर रहे हैं तो अपनी मूवमेंट्स को ट्रैक करना आपके लिए एक अस्वास्थ्यकर ऑब्सेशन बन सकता है।

कोविड के समय जब हमारी जिंदगी ऑनलाइन शिफ्ट हो गई तो यह समस्या कई गुना बढ़ गई। 2021 में एक निजी कम्पनी के द्वारा कराए गए सर्वे में 52 प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने कहा कि बीते पांच सालों में उनकी जानकारियों के स्रोत कई गुना बढ़ गए हैं। 44 प्रतिशत का मानना था कि महामारी के दौर में सूचनाओं का ओवरलोड बढ़ गया और इससे रोजमर्रा के तनावों में इजाफा हुआ। कामकाज की जगहों पर भी नकारात्मक असर पड़ा है।

लोगों को विभिन्न ईमेल और यूजर अकाउंट्स को एक्सेस करना पड़ता है, उन्हें अलग-अलग पासवर्ड याद रखना पड़ते हैं और वर्कप्लेस-साइटों पर दी जाने वाली सूचनाओं से उनके काम का अकसर कोई सम्बंध नहीं होता। जैसे-जैसे काम हाईब्रिड होता जा रहा है, तनाव बढ़ रहा है। इससे निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है। आज लोग रोज ही अनेक एप्स, अकाउंट्स, ईमेल और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के बीच स्विच करते रहते हैं, जिससे उनकी एकाग्रता घट गई है। हम इसका सामना कैसे करें?

कस्टमाइज्ड और सार्थक सूचना मुहैया कराने के लिए बिजनेस हाउस द्वारा अब एआई का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो हाइपर-पर्सनलाइज्ड डाटा देती है। कैलरी काउंट करने के बजाय अब डाइट एप्स आपके द्वारा खाई जाने वाली चीजों के बारे में जरूरी बातें बताते हैं। हम सबको सूचनाओं के ओवरलोड के प्रति सतर्क रहना चाहिए और गैरजरूरी सूचनाओं को इग्नोर करना सीखना चाहिए। साथ ही, जीवन में हर चीज की गणना करने की जरूरत नहीं है, आप नतीजों को ट्रैक किए बिना भी एक्टिविटीज का मजा ले सकते हैं।

न्यूज, व्यूज और सूचनाओं से हमारा जीवन भर गया है और अकसर हम बिना सोचे-समझे कुछ भी देखते रहते हैं। हमारे पास उस सबको प्रोसेस करने का भी समय नहीं होता। इससे भ्रम और तनाव की स्थिति बनती है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं।)