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साधना शंकर का कॉलम:अब रोबोट केवल हमारे लिए काम ही नहीं करेंगे, बल्कि वे हमारे साथ भी काम करेंगे

13 दिन पहले
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साधना शंकर, भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी - Dainik Bhaskar
साधना शंकर, भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी

हाल ही में प्रकाशित एक खबर में बताया गया था कि कैसे भारतीय फैक्टरियां मैन्युफेक्चरिंग में रोबोट्स के उपयोग को बढ़ावा दे रही हैं। पंद्रह वर्ष पूर्व भारत में उद्योग-सम्बंधी गतिविधियों के लिए सौ से भी कम रोबोट बनाए जाते थे, आज उनकी संख्या सालाना छह हजार तक पहुंच गई है। यह चौथी औद्योगिक क्रांति या इंडस्ट्रीयल रिवोल्यूशन 4.0 की विशेषता है कि इसमें आधुनिक स्मार्ट टेक्नोलॉजी, रोबोटिक्स और इंटरनेट ऑफ थिंग्स का इस्तेमाल करते हुए परम्परागत निर्माण प्रक्रियाओं को ऑटोमेशन की ओर ले जाया जाता है।

रोबोट शब्द की ईजाद 1920 में चेक लेखक कारेल चापेक ने की थी। उन्होंने ‘रोसुम्स यूनिवर्सल रोबोट्स’ शीर्षक से एक नाटक लिखा था। साइंस फिक्शन ने इस विचार को अपनाया। उन्होंने मनुष्यों जैसी दिखने वाली ऐसी मशीनों की परिकल्पना की, जो दुनिया को जीत लेना चाहती हैं। जबकि ऐतिहासिक रूप से रोबोट ऐसी बुद्धिमान मशीनें रहे हैं, जिनका फैक्टरियों में उपयोग किया जाता है। पर अब मनुष्यों और रोबोट के रिश्ते बदल रहे हैं। रोबोट फैक्टरियों से निकलकर हमारे सामाजिक जीवन में प्रवेश कर रहे हैं।

आपमें से कइयों ने ऐसे बक्सेनुमा रोबोट्स की क्लिप्स देखी होंगी, जिन्होंने कोविड के दौरान भोजन और दवाइयों की डिलीवरी का काम किया था। भारत के अस्पतालों में अब रोबोटिक सर्जरियां भी होने लगी हैं। रोबोट अब केवल मैकेनिकल डिवाइस नहीं हैं- वे चुस्त-चपल, सक्रिय और स्वायत्त मशीनों में बदल गए हैं, जो कार चलाने से लेकर नियोजित नगर बसाने तक सब कुछ कर सकते हैं। रोबोटिक्स का दौर आ चुका है। इसमें स्मार्टफोन तकनीक में तेजी से नवोन्मेष का मुख्य योगदान है।

स्मार्टफोन के ही कारण वायरलेस कम्युनिकेशन, नैनो चिप्स, सस्ते सेंसर्स और कैमरा चलन में आए। स्मार्टफोन तकनीक ने रोबोटिक्स को भी बदला है। मशीन लर्निंग में आज जो तरक्की हुई है, उसने यह सुनिश्चित कर दिया है कि रोबोट आसपास की दुनिया के बारे में बेहतर निर्णय ले सकेंगे। अब रोबोट हमारे लिए काम नहीं करेंगे, बल्कि हमारे साथ काम करेंगे। सर्जरियों के अलावा बीमारों और बुजुर्गों के हेल्थकेयर में उनकी भूमिका बढ़ रही है।

सफाई करना, चीजों को खिसकाना, यहां तक कि ओल्ड एज होम्स में मनोरंजन करना भी रोबोट का काम बन रहा है। महामारी के दौरान बेंगलुरु के एक स्टार्टअप द्वारा बनाए गए ‘मित्र’ नाम के एक रोबोट ने भारत के अनेक अस्पतालों में सेवाएं दी थीं। उसने मरीजों की रीडिंग ली और कंसल्टेशन में सहयोग दिया। ड्राइवरलेस कारें, ट्रैफिक में मदद देने वाले ड्रोन्स, वेयरहाउस, खेती, यहां तक कि युद्ध भी : रोबोट्स सब तरफ मौजूद हैं।

रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध में रिमोट कंट्रोल, ऑटोमेटेड सिस्टम्स और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की भरपूर मदद ली जा रही है। अक्टूबर 2021 में भारत सरकार ने एक ड्रोन ट्रैफिक मैनेजमेंट पॉलिसी बनाई थी। रोजमर्रा के ऊबाऊ, दोहराव भरे या खतरनाक कामों के लिए मनुष्यों के बजाय रोबोट्स का उपयोग किया जा रहा है। इससे यह चुनौती भी निर्मित हो रही है कि कहीं रोबोट मनुष्यों की नौकरियां तो नहीं खा जाएंगे।

अनेक रिसर्चरों ने पाया है कि ऑटोमेशन की तकनीकें नए रोजगार सृजित करती हैं। पचास से अधिक आयु वाले लोगों को याद होगा कि पहले एक शहर से दूसरे में बात करने के लिए ट्रंक कॉल लगाया जाता था। टेलीफोन एक्सचेंजों में कई लोग काम करते थे। लेकिन टेलीकॉम क्रांति के बाद इस क्षेत्र में नए रोजगार निर्मित हुए हैं।

येल यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में पाया गया है कि जापान में मैन्युफेक्चरिंग में 1978 से 2017 के दौरान प्रति एक हजार कामगारों पर एक रोबोट यूनिट की स्थापना से रोजगार में 2.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी। आने वाले समय में क्या होगा, पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है, लेकिन यह तय है कि नियोक्ताओं को अब लाइफलॉन्ग लर्निंग और अपने कर्मचारियों की स्किल्स में बढ़ोतरी के लिए निवेश करना होगा। वहीं दूसरी ओर हमें रोबोट्स के साथ मिलकर काम करना सीखना होगा, आगे जिनसे हमारा रोजाना वास्ता रहने वाला है।

आने वाले समय में क्या होगा, यह पूर्वानुमान लगाना तो मुश्किल है, लेकिन यह तय है कि नियोक्ताओं को अब लाइफलॉन्ग लर्निंग और अपने कर्मचारियों की स्किल्स में बढ़ोतरी के लिए निवेश करना होगा।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)