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संदीप सिंह का कॉलम:‘आप’ दिल्ली और पंजाब की जनता का पैसा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर खर्च कर रही

21 दिन पहले
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संदीप सिंह कांग्रेस नेता, पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष, जेएनयू - Dainik Bhaskar
संदीप सिंह कांग्रेस नेता, पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष, जेएनयू

हाल ही में पंजाब के शिवसेना नेता सुधीर सूरी को दिनदहाड़े गोली मार दी गई। अपराधी इतने बेखौफ थे कि पुलिस की घटनास्थल पर मौजूदगी का भी फर्क नहीं पड़ा। इससे पहले पंजाबी गायब सिद्धू मूसेवाला समेत कई हाई प्रोफाइल हत्याएं हो चुकी हैं। जिस पंजाब को चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी ने ‘बदलाव’ का सपना दिखाया था, आज उस पंजाब की धरती आए दिन हत्याओं से थर्रा रही है। ‘आप’ फिलहाल गुजरात में चुनाव लड़ रही है और वहां दिल्ली और पंजाब मॉडल की बात की जा रही है।

जो भगत सिंह फांसी चढ़ने से पहले गरीबों, मजदूरों और किसानों की सत्ता चाहते थे, उन्हीं भगत सिंह की फोटो लगाकर आम जनता का अकूत पैसा विज्ञापनों पर खर्च हो रहा है। पंजाब में सरकार बनते ही 2 महीने के अंदर 37 करोड़ रुपये विज्ञापनों पर खर्च किए, जिसका लक्ष्य पंजाब नहीं बल्कि गुजरात का चुनाव रहा। ‘आप’ दिल्ली और पंजाब की जनता का पैसा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर खर्च कर रही है। क्या भगत सिंह के आदर्श यही थे?

ये वही अरविंद केजरीवाल हैं जिन्होंने सत्ता में आने के पहले दिल्ली में कांग्रेस सरकार के विज्ञापन खर्च को मुद्दा बनाया था। शीला दीक्षित सरकार का 2013-14 में विज्ञापन का बजट 33 करोड़ रुपए था। तब आरोप था कि यह सरकारी खजाने की बर्बादी है। लेकिन सत्ता में आने के बाद पहले ही वित्त वर्ष में उन्होंने 526 करोड़ विज्ञापन पर खर्च कर डाला। उसके बाद केजरीवाल सरकार ने प्रचार-प्रियता का रिकॉर्ड कायम किया है।

जब देश कोरोना से जूझ रहा था, उन्होंने 17 महीनों में विज्ञापन पर 490 करोड़ रुपए खर्च किए। मार्च 2020 में दिल्ली सरकार ने हर दिन 3 करोड़ रुपए प्रचार पर फूंक दिए। 2021-22 में 488.97 करोड़ रुपये विज्ञापन पर खर्च किया। यहां तक कि दिल्ली में पराली की समस्या से निपटने के लिए 68 लाख के डी-कंपोजर का छिड़काव किया गया और इसके प्रचार पर 23 करोड़ रुपए फूंके गए।

इसी तरह ‘दिल्ली उच्च शिक्षा और कौशल विकास गारंटी योजना’ के तहत 2021-22 में सिर्फ दो छात्रों को 10-10 लाख रुपए का लोन दिया मगर इसके प्रचार पर 19 करोड़ रुपए खर्च कर दिए। केजरीवाल सबसे ज्यादा प्रचार दिल्ली के एजुकेशन मॉडल का कर रहे हैं। दिल्ली के 84% स्कूलों में आज प्रधानाचार्य नहीं हैं। हर तीसरे स्कूल में उपप्रधानाचार्य नहीं हैं।

40% स्कूलों में टीजीटी और 22% स्कूलों में पीजीटी टीचर्स नहीं हैं। दिल्ली में कुल 16,834 शिक्षकों की पोस्ट खाली है। तकरीबन 700 स्कूलों में 10वीं और 12वीं में साइंस या मैथ नहीं पढ़ाई जाती। दिल्ली के कॉलेजों में 70% स्टाफ अस्थाई है। इस सरकार के कार्यकाल में दिल्ली में एक भी नया स्कूल नहीं बना। अरबों रुपये फूंककर इसे शिक्षा का बेहतरीन मॉडल बताया जा रहा है।

करियर की शुरुआत से पहले केजरीवाल जी ने परिवर्तन नाम का एनजीओ बनाया था। अधिकांश संस्थापक सदस्यों ने यह संस्था छोड़ दी क्योंकि वे लोकतंत्र के नाम पर अमेरिकी फंडिंग लेने के खिलाफ थे। परिवर्तन का कोई भी संस्थापक आज उनके साथ नहीं है।

केजरीवाल समझ चुके हैं कि जनता को छोटे-मोटे फायदे और प्रतीकों की राजनीति में उलझाए रखकर सत्ता में बने रहे जा सकता है। उनके लिए किसी तरह की नैतिकता, विचारधारा या मूल्य मायने नहीं रखते।

अन्ना आंदोलन के जरिए लोकपाल आंदोलन छेड़ा और जनता को यह विश्वास दिलाया कि लोकपाल आने के बाद इस देश में भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। पर क्या ऐसा हुआ? यह आंदोलन उन्होंने आरएसएस से जुड़ी संस्था विवेकानंद फाउंडेशन के साथ मिलकर आयोजित किया था।

आठ साल पहले केजरीवाल ने दिल्ली की जनता से वादा किया था कि यमुना नदी को इतना साफ कर देंगे कि लोग यमुना तट पर पिकनिक मनाएंगे। लेकिन आठ साल बाद यमुना सीवर में तब्दील हो गई है। हाल ही में छठ पर्व के अवसर पर श्रद्धालुओं को यमुना नदी में प्रवेश करने की इजाजत नहीं दी गई क्योंकि यमुना कीचड़ और दलदल से भरी है। जैसे भाजपा ने गंगा सफाई के नाम पर देश को धोखा दिया, उसी तरह केजरीवाल ने यमुना सफाई के नाम पर दिल्लीवासियों को धोखा दिया।

केजरीवाल कभी जनता से पूछते थे कि अगर जवाहर लाल नेहरू स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया या आईआईटी की जगह मंदिर बना देते तो क्या देश का विकास हो सकता था? लेकिन आज वे मांग कर रहे हैं कि नोटों पर गणेश लक्ष्मी की फोटो छाप दी जाए, इससे अर्थव्यवस्था सुधर जाएगी। वे समझ चुके हैं कि इस देश की जनता को आस्था के नाम पर बहकाकर सत्ता में बने रहा जा सकता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)