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संजय कुमार का कॉलम:विपक्ष ने साझा उम्मीदवार खड़ा किया तो 48 से 50 सीटें ऐसी हैं, जहां भाजपा हार सकती है

3 महीने पहले
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संजय कुमार, सीएसडीएस में प्रोफेसर, राजनीतिक टिप्पणीकार - Dainik Bhaskar
संजय कुमार, सीएसडीएस में प्रोफेसर, राजनीतिक टिप्पणीकार

देश में इन दिनों जैसी सियासी गहमागहमियां हैं, वो बताती हैं कि 2024 की दौड़ शुरू हो चुकी है। सभी पार्टियां अपने जनाधार को मजबूत करने या भाजपा से मुकाबले के लिए विपक्षी एकता स्थापित करने के लिए मेहनत करने लगी हैं। लेकिन विभाजित विपक्ष तो दूर, एक संयुक्त मोर्चा भी 2024 में भाजपा को हराने के लिए नाकाफी साबित हो सकता है।

जबकि अभी तो विपक्षी एकजुटता के ही आसार नहीं हैं, क्योंकि राज्यों के स्तर पर सभी पार्टियों के निजी हित हैं और उनके नेताओं की अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं। कांग्रेस ने भारत जोड़ो यात्रा आरम्भ कर दी है और भाजपा का नेतृत्व बैठकें कर रहा है। 2019 में जिन सीटों पर भाजपा दूसरे या तीसरे नम्बर पर रही थी, उन्हें जीतने की रणनीतियां बनाई जा रही हैं।

आप पार्टी दिल्ली और पंजाब के बाहर अपना जनाधार बढ़ाने के लिए कमर कसे हुए है। नीतीश कुमार अच्छी तरह समझते हैं कि संयुक्त मोर्चे के बिना भाजपा को हराया नहीं जा सकेगा, इसलिए वे विपक्षी-एकता स्थापित करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। केसीआर भी खुद को राष्ट्रीय नेता के रूप में प्रोजेक्ट करने में जुटे हैं। याद रखें कि ममता बनर्जी और शरद पवार अभी दौड़ से बाहर नहीं हुए हैं।

अलबत्ता अभी तक अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव खुलकर मैदान में नहीं उतरे हैं। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस- जो आज भी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है- किसी दूसरे नेता के नेतृत्व को स्वीकार कर सकेगी? इतने विरोधाभासों और महत्वाकांक्षाओं के साथ 2024 में एक साझा गठजोड़ बनाना आसान साबित नहीं होगा। और एक विभाजित विपक्ष स्वत: ही भाजपा की जीत की गारंटी साबित होगा।

2019 में भाजपा ने न केवल 303 सीटें जीती थीं, बल्कि अनेक सीटों पर उसकी जीत का प्रतिशत भी बहुत बड़ा था। 105 सीटें तो उसने तीन लाख वोटों के अंतर से जीती थीं, वहीं 59 अन्य पर उसकी जीत का मार्जिन दो से तीन लाख वोटों का था। 77 सीटें ही ऐसी थीं, जहां वह एक लाख से कम वोटों से जीती थी।

एक संयुक्त मोर्चा शायद इन 77 सीटों पर भाजपा को मुश्किल में डाल सकता है। 2019 में भाजपा द्वारा जीती गई सीटों पर दूसरे और तीसरे क्रम पर रही पार्टियों को मिले वोटों का विश्लेषण बताता है कि अगर विपक्षी दलों ने 2024 में साझा उम्मीदवार खड़ा किया तो 48 से 50 सीटें ऐसी हैं, जहां पर भाजपा हार सकती है।

वहीं 10 से 12 सीटें ऐसी हैं, जहां भाजपा को कड़ी चुनौती मिल सकती है। तो विपक्ष का संयुक्त मोर्चा और कुछ नहीं तो कम से कम 2024 में भाजपा की सीटों की संख्या 303 से घटाकर 240 तक तो ला ही सकता है। वोटरों का वर्तमान में जैसा मिजाज है, उसे देखकर यह असम्भव लगता है कि भाजपा को 210-215 सीटों तक रोकने में सफलता पाई जा सकेगी।

अलबत्ता तब भी भाजपा लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी और कांग्रेस को एक बड़े अंतराल से पीछे छोड़ देगी। एक बार मान भी लें कि आप पार्टी और कांग्रेस सहित सभी बड़ी पार्टियां एक मंच पर आ गईं और आपस में सम्पूर्ण एकता स्थापित कर ली, तब भी कांग्रेस अपनी सीटों की संख्या में ज्यादा इजाफा नहीं कर सकेगी।

यह सच है कि 2019 में कुल 209 सीटों पर कांग्रेस दूसरे क्रम पर रही थी, लेकिन इनमें से अधिकतर में उसका सामना भाजपा से था और हार का अंतर बहुत बड़ा था। जिन सीटों पर कांग्रेस 2019 में दूसरे, तीसरे या चौथे क्रम पर रही थी, उनका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि 2024 में कांग्रेस पिछले चुनाव की तुलना में 28 और सीटें जीत सकती है। लेकिन इससे उसकी कुल सीटें 80-82 तक ही पहुंच सकेंगी।

विभिन्न पार्टियों के राजनीतिक रुझानों को देखकर यह असम्भव ही लगता है कि आप पार्टी और कांग्रेस एक मंच पर आ सकेंगे। वास्तव में आप पार्टी कांग्रेस को भाजपा से भी बड़े दुश्मन के रूप में देखती है और यही स्थिति कांग्रेस की भी है। ऐसे में 2024 का संघर्ष त्रिस्तरीय हो सकता है- भाजपा और उसके सहयोगी, कांग्रेस और उसके सहयोगी और अन्य क्षेत्रीय पार्टियों का एक साझा मोर्चा।

अभी तक का जो परिदृश्य है, वह तो यही बताता है। आगे चलकर इसमें बदलाव हो तो अलग बात है। 2024 अभी भी बहुत दूर है। उससे पहले अनेक राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। उनके नतीजों से पता चलेगा कि हवा किस तरफ बह रही है।

राजनीतिक रुझानों को देखकर यह असम्भव लगता है कि आप पार्टी और कांग्रेस एक मंच पर आ सकेंगे। वास्तव में आप कांग्रेस को भाजपा से भी बड़े दुश्मन के रूप में देखती है और यही स्थिति कांग्रेस की भी है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)