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संकेत उपाध्याय का कॉलम:गठबंधन बनाकर एक गुलदस्ता तैयार किया जाए; अखिलेश ने केमिस्ट्री तो बैठा ली, मैथमेटिक्स का क्या होगा

7 दिन पहले
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संकेत उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार - Dainik Bhaskar
संकेत उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में असली भूचाल आना अब शुरू हुआ है। स्वामी प्रसाद मौर्या और उनके समर्थक विधायकों के इस्तीफे के बाद ऐसा बताया जाने लगा है कि लोग हवा के रुख को समझ और देख रहे हैं और उसी दिशा में चल पड़े हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह एक नई सपा है और अब एक नई हवा है। और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अकेले ही धन, तंत्र और नेताओं से संपन्न बीजेपी से लोहा ले लिया है।

दरअसल अखिलेश की रणनीति यह है कि इस बार छोटे-छोटे गठबंधन बनाकर एक गुलदस्ता तैयार किया जाए। पर यह विवेक उनको ऐसे ही नहीं आया है। खुद को साबित करने के लिए अखिलेश कई प्रयोग करते आए हैं। यह जरूरी इसलिए हो गया था क्योंकि वह अपने पिता मुलायम सिंह और चाचा से लड़ते हुए अपना राजनीतिक वर्चस्व कायम करना चाहते थे। साख तभी बनती जब संघर्ष-प्रयोग दोनों कामयाब होते।

2012-17 में सरकार चलाने के बावजूद, संस्था चलाना और राजनीति करना एक प्रयोगशाला ही रही अखिलेश के लिए। छोटे-छोटे का गठबंधन का विचार उनको इसलिए आया क्योंकि वह 2017 व 2019 में बड़े प्रयोग करके मुंह की खा चुके हैं। अपनी ही सरकार होने के बावजूद अखिलेश ने कांग्रेस को लगभग 100 सीट थमा दीं। नतीजा- बीजेपी 300 पार हो गई।

2019 में मायावती और अखिलेश, यानी कट्टर विरोधी बसपा-सपा ने एक साथ चुनाव लड़ा। 2019 में ये प्रयोग भी पिट गया। अब तीसरा प्रयोग, छोटे छोटे दलों का एक सुपर गठबंधन। उम्मीद पर टिकी यह गठबंधन की साइकिल भी दो पहियों पर चल रही है कि अखिलेश की सपा 300 प्लस पर सफल रहे और घटक दल भी स्थानीय वर्चस्व अखिलेश के खाते में डाल दें।

अक्सर जब लोग साइकिल चलाना सीख रहे होते हैं तो सपोर्टर की तरह दो छोटे पहिये और लगा लेते हैं। वो काम क्या स्वामी प्रसाद मौर्या और उनके समर्थक करेंगे? यह जितना सरल लगता है उतना है नहीं। याद कीजिए, अखिलेश का हर प्रयोग गजब की केमिस्ट्री पर टिका था। कोई नहीं भूल सकता वो लाखों लोगों का जलसा जो राहुल-अखिलेश की साझा रैली में आता था। या वो केमिस्ट्री बनाने का प्रयास, जब अखिलेश, मुलायम और मायावती को एक मंच पर ले आए और एकता की एक नई मिसाल कायम करने की कोशिश की।

ड्रामा हाई वोल्टेज था और केमिस्ट्री गजब। पिछली दो बार, केमिस्ट्री कमाल की थी, लेकिन दिक्कत मैथमेटिक्स में हुई। अखिलेश के अंदरूनी विश्लेषण में 2017 के गठबंधन में कांग्रेस ने खूब सीट ले ली पर जीत कम हुई। वहीं 2019 में सपा के 5 ही सांसद आए। और बसपा के 10, फिर भी बहनजी ने गठबंधन तोड़ते वक्त गणित ठीक न बैठने का आरोप लगाया। इस बार भी केमिस्ट्री गज़ब है। पर चुनौती पहले से कई गुना ज्यादा है।

1. एक्सपेक्टेशन मैनेजमेंट - चाचा शिवपाल की प्रगतिशील सपा, जयंत की रालोद, ओ पी राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, तृणमूल, एनसीपी और महान दल, नोनिया समाज की जनवादी पार्टी सोशलिस्ट और अपना दल (क) की कृष्णा पटेल जैसे कई और दल। इनसे सीट शेयरिंग पर बातचीत अभी चल रही है। इतिहास गवाह है कि मुलायम सिंह इससे भी बड़े-बड़े गठबंधन चलाने में महारत रखे हुए हैं, लेकिन अखिलेश के लिए ये पहली बार होगा कि इतने दलों के इतने नेताओं की अभिलाषाओं को साथ लेकर चलेंगे।

2. गठबंधन मज़बूती या कमज़ोरी का प्रतीक? गठबंधन जितना एकता का प्रतीक है उतना ही एक पार्टी के संगठन के कमज़ोरी का भी। 2017 से अभी तक अनेकों गठबंधन की हुई सपा से एक यह सवाल लाज़िमी है कि क्या घटक दलों को दी हुई सीट से उन क्षेत्रों में अखिलेश की सपा की पैठ कम नहीं होगी? अखिलेश के लिए केमिस्ट्री वाला माहौल बना हुआ है, लेकिन मैथ्स अपनी जगह बैठा या नहीं यह नहीं मालूम। खैर, एग्जाम अब सिर पर हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)