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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:विज्ञान हर क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है, अकारण घिर आई उदासी से भी मुक्ति अब संभव हो गई है

12 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक। - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक।

गौरतलब है कि अवसाद से पीड़ित व्यक्ति को निरोगी किए जाने के प्रयोग सफल हो रहे हैं। जैसे हृदय में रक्त प्रवाह की सही रफ्तार बनाए रखने के लिए एक पेसमेकर यंत्र लगाया जाता है और इसी तरह शरीर में आवश्यकता अनुरूप इंसुलिन देने के लिए यंत्र मांसपेशियों में लगाया जाता है। वैसे ही अब शल्य क्रिया द्वारा एक इम्प्लांट लगाने पर अवसाद घटाया जा सकता है।

डॉक्टर कैथरीन स्केन गोस और साथियों ने यह संभव कर दिखाया है। गोया कि मशीन द्वारा मनुष्य का अवसाद घटाया जा सकता है। उसे निरोग किया जा सकता है। विज्ञान हर क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है। अकारण घिर आई उदासी से भी मुक्ति अब संभव हो गई है। अरसे पहले एक योग्य मनुष्य हमेशा चिंता ग्रस्त बना रहता था। यहां तक की चिंता के कारण से सर्दी के मौसम में भी पसीने से नहा जाता था। ज्ञातव्य है कि मस्तिष्क के एक ओर चिंता उपजाने के सेल्स होते हैं। सर्जन ने शल्य क्रिया द्वारा चिंता करने के सेल्स को हटा दिया।

शल्यक्रिया के बाद वह व्यक्ति जो कभी योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट था, अब केवल खाता-पीता है परंतु किसी तरह का विचार नहीं कर सकता। जिस कंपनी में वह अफसर था अब उसी दफ्तर का दरबान हो गया है। उसके भाई ने अदालत में मुकदमा दायर किया कि प्रीफ्रंटल शल्य क्रिया के द्वारा उसके भाई की ईश्वरीय बनावट में हस्तक्षेप किया गया है। अत: उसे भरपूर मुआवजा दिया जाए। इस अदालती प्रकरण के बाद प्रीफ्रंटल लोबेक्टमी अवैध घोषित कर दी गई थी। रणधीर कपूर द्वारा निर्देशित फिल्म ‘धरम-करम’ ऊपर वाले के डिजाइन को बदलने के प्रयास पर आधारित थी । फिल्म में एक अस्पताल में बच्चों के जन्म के समय एक पेशेवर अपराधी ने अपने शिशु के स्थान पर संगीतकार के शिशु को रख दिया और संगीतकार के नवजात शिशु को अपने साथियों को इस निर्देश के साथ सौंपा कि इसे अपराधी बनाया जाए। घटनाक्रम ऐसे चलता है कि अपराधियों की बस्ती में पलने वाला युवा, धुनों का निर्माण करने लगता है और संगीतकार के घर पलने वाला युवा अपराध करने लगता है। दरअसल ‘धरम-करम’ राज कपूर द्वारा बनाई गई यादगार फिल्म ‘आवारा’ के खिलाफ जाती है। ‘आवारा’ में प्रस्तुत किया गया था कि पालन-पोषण और आसपास का सामाजिक वातावरण ही व्यक्तित्व निर्माण करता है।

लोकप्रिय उपन्यास ‘अलकेमिस्ट’ में खुशी की तलाश में सारी दुनिया में भटकने वाला अंत में अपने ही घर में खुशी प्राप्त करता है। मनुष्य उस हिरण की तरह अपनी ही नाभि से आने वाली सुगंध की तलाश में जाने कहां-कहां भटकता है। उसी तरह निराशा से घिरा व्यक्ति भी ताउम्र इधर-उधर भटकता है। जो व्यक्ति के भीतर बसा है, उसकी तलाश में बाहर भटकना कोई अर्थ नहीं रखता। जगह-जगह खुशी की तलाश के लिए भटकने वाले लोग अपना क्लब बना लेते हैं। भोपाल की ऋतु शर्मा पांडे ने भी इसी तरह की एक संस्था संचालित की थी। बहरहाल, डॉक्टर कैथरीन और साथियों की प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने अवसाद का इलाज शल्य क्रिया द्वारा करने में सफलता प्राप्त की है।

डिजाइनर कपड़ों की तरह डिजाइनर विचार प्रक्रिया का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। अवाम इस व्यवस्था में मगन है। चिंता मुक्त भावना विहीन व्यक्ति भले ही उत्पादित खुशी में मगन रहे, परंतु साहित्य सृजन करने वालों के लिए फिक्रमंद होना आवश्यक है। सारी विचार प्रक्रिया में अवसाद कैटेलिटिक एजेंट की तरह होता है, जिससे रासायनिक प्रक्रिया को गति प्राप्त होती है। हम रोबो उत्पादन करना चाहते हैं। एक उम्रदराज अकेली रहने वाली महिला ने बच्चे के आकार का रोबोट बनवाया। यह रोबो घर के काम करता और अकेली महिला को तन्हाई से मुक्त रखता था। कुछ समय बाद डॉक्टर ने परीक्षण करके बताया कि उम्रदराज महिला को लाइलाज रोग हो गया है। इस खबर को सुनकर रोबो रोने लगा। अत: मशीन का भी मानवीकरण होता है और मनुष्य भी मशीन में बदले जा सकते हैं।

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