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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:‘मेरे दुख का कारण मैं हूं’ इसकी खोज करिए, भीतर की तैयारी ठीक से कर लें, बाहर की झंझटों-दुखों से निपटना होगा आसान

22 दिन पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

‘हमारे दुख की जिम्मेदारी हमारी स्वयं की है।’ दुखी लोगों को यह बात मंत्र की तरह जीवन में उतार लेना चाहिए। संसार में थोड़े-बहुत दुखी सभी हैं। कोई दावा नहीं कर सकता कि मैं बिलकुल दुखी नहीं हूं। दुख की खूबी है कि वह हमेशा बाहर से आता लगता है। जब भी दुख आता है, लोग बाहर झांकते हैं कि किसी व्यक्ति के कारण आया, परिस्थितियों के कारण आया, घटनाओं के कारण आया। फिर, उसका निदान भी बाहर ही ढूंढने लगते हैं। लेकिन याद रखिए, जो चीज बाहर से आई नहीं, उसका इलाज बाहर कैसे मिल सकता है।

फकीरों ने गलत नहीं कहा है कि दुख हमारे भीतर से आता है। बाहर जो देख रहे हैं वह प्रतिबिंब है। ‘मेरे दुख का कारण मैं हूं’ इसकी खोज करिए। इसके लिए खुद को ढूंढना पड़ेगा और खुद को ढूंढने के लिए एकांत साधना पड़ता है।

कबीर ठीक ही कह गए हैं- ‘चर्चा करु तब चौहटे, ज्ञान करो तब दोय। ध्यान धरो तब एकिला, और न दूजा कोय।।’ सत्संग करना हो तो खुले चौराहे पर करो, कोई ज्ञान गोष्ठी यानी साधना की बात हो तो उसमें केवल जिज्ञासु और उपदेशक साथ रहें। भीड़ न हो। लेकिन, जब ध्यान करना हो, मन को एकाग्र करना हो, खुद को ढूंढना हो तो एकांत होना चाहिए। यदि भीतर की तैयारी ठीक से कर लें, तो बाहर की झंझटों-दुखों से निपटना आसान हो जाएगा।

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