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शीला भट्‌ट का कॉलम:2024 के आम चुनावों से पहले इन 6 परिप्रेक्ष्यों को समझें

14 दिन पहले
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शीला भट्‌ट
वरिष्ठ पत्रकार - Dainik Bhaskar
शीला भट्‌ट वरिष्ठ पत्रकार

विश्लेषण - राजनीति में सबक सीखना जरूरी

  • भाजपा 2024 के लोकसभा चुनावों में जीतेगी या नहीं, यह अनेक फैक्टर्स पर निर्भर करता है। लेकिन अगर वह कर्नाटक से जरूरी सबक सीखने को तैयार है तो वह 2024 के लिए खुद को बेहतर तरीके से तैयार कर सकेगी।

कर्नाटक के नतीजों ने 2024 के आम चुनावों को चर्चा के दायरे में ला दिया है। सबसे अधिक पूछे जाने वाले प्रश्न हैं, क्या भाजपा जीत की हैट्रिक लगा सकेगी? और क्या मतदाताओं में नरेंद्र मोदी का प्रभाव घटा है? इन प्रश्नों के जवाब देना सरल नहीं है, क्योंकि नई दिल्ली में मोदी के नौ वर्ष अत्यंत घटनाप्रधान रहे हैं और आने वाले नौ महीनों में हमें कुछ ऐसे निर्णय दिखाई देंगे, जिनके बारे में कुछ साल पहले तक सोचा भी नहीं जा सकता था।

पहली बात यह कि नए संसद भवन का उद्घाटन आधुनिक भारत के इतिहास में अपने तरह की पहली घटना है। जवाहरलाल नेहरू से डॉ. मनमोहन सिंह तक कानून-निर्माता ब्रिटिशों द्वारा, ब्रिटिशों के लिए डिजाइन किए गए संसद भवन में बैठते थे। लेकिन अब मोदी सरकार भारतीयों द्वारा, भारतीयों के लिए निर्मित संसद भवन में बैठकर नए कानून बनाएगी। जयराम रमेश इसे भले मोदी का वैनिटी-प्रोजेक्ट बताएं, लेकिन इतिहास इसे मोदी की विरासत की तरह याद रखेगा। नया संसद भवन मोदी के लिए संवैधानिक लोकतंत्र के दायरे में अपनी राष्ट्रवादी साख को और मजबूत बनाने का माध्यम है।

दूसरी बात यह कि 2014 तक किसी भी सत्ताधीश ने गम्भीरता से नहीं माना होगा कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाया जा सकता है। किसी कांग्रेस नेता, सेकुलर चिंतक या क्षेत्रीय क्षत्रप ने राम मंदिर की कल्पना के सच होने की बात नहीं सोची थी। कांग्रेस और सेकुलर पार्टियां यही मानती थीं कि राम जन्मभूमि आंदोलन भाजपा के लिए एक राजनीतिक शगूफे से बढ़कर नहीं है। 1992 में जब बाबरी मस्जिद गिराई गई थी, तब अनेक विश्लेषकों ने इसे एक ऐतिहासिक भूल करार देते हुए राष्ट्र का कलंक बताया था और वे मानते थे कि अब राम मंदिर निर्माण की कोई सम्भावना शेष नहीं रह गई है।

लेकिन मोदी ने नई दिल्ली आकर त्वरित ही यह कर दिखाया। आर्टिकल 370 की धार निकालकर कश्मीर का समकालीन इतिहास भी बदल दिया। 2024 के चुनाव राम मंदिर निर्माण के बाद होंगे, जिससे हिंदू राष्ट्रवादी मतदाताओं के नेता के तौर पर मोदी को चुनौती देना और कठिन हो जाएगा।

तीसरी बात, बीते नौ सालों में एक नई राजनीतिक परिघटना ने आकार लिया है। जहां मोदी ने करोड़ों मतदाताओं को अपनी पार्टी के समर्थक के रूप में लामबंद किया है, वहीं उनकी हाइपर-एक्टिव राजनीति ने प्रतिरोध की भी लहरें पैदा की हैं। 2019 में इस प्रतिकार की राजनीति ने आकार ग्रहण किया था और अब वह बलवती हो गई है। जिन राज्यों में भाजपा का कांग्रेस से सीधा मुकाबला है, वहां प्रतिरोधी-ताकतें राहुल गांधी का समर्थन कर रही हैं।

शाहीन बाग और किसान आंदोलन ने अनेक सरकार-विरोधी प्रदर्शनों को ताकत दी है। यूट्यूब पर सेलेब्रिटी इंफ्लूएंसर्स मोदी के विरुद्ध आक्रोश जता रहे हैं, जिन्हें करोड़ों लोगों द्वारा देखा जा रहा है। लेकिन मोदी का विरोध करने वाले भी उन्हें निरंतर चर्चाओं के केंद्र में बनाए रखते हैं। चौथी बात यह कि गत नौ सालों में सेकुलरिज्म के लिए वोट मांगने की प्रेरणा क्षीण हुई है। विपक्षी खेमा आज मोदी-विरोधी वोटों के बारे में ज्यादा बात करता है। पिछले कुछ चुनावों में मोदी-विरोधियों को वोट मिले हैं, फिर भले ही वे सेकुलर न हों। एक दशक से अल्पसंख्यकों का बड़ा वर्ग मोदी को हराने के लिए वोट डाल रहा है। पर यह स्थिति भाजपा के ही पक्ष में जाती है।

पांचवीं बात, हमें वोटों के ध्रुवीकरण और एकत्रीकरण के भेद को समझना होगा। भाजपा बंगाल और कर्नाटक में भले हार गई हो, लेकिन वहां उसने अपने विचारधारागत आधार को मजबूत किया है। आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा ने वोटों का ध्रुवीकरण होते देखा था, लेकिन सत्ता में आने के बाद मोदी अधिक साहसी व तेजतर्रार साबित हुए हैं।

उन्होंने आक्रामकता से नेहरूवादी विरासत को ललकारा और अपनी पार्टी के राष्ट्रवादी रुख को मजबूती से स्थापित किया। मोदी ने राजनीति को उस मुकाम पर ला दिया है, जहां हर चुनाव हिंदू वोटों के एकत्रीकरण की आजमाइश बन जाता है। छठी और अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह कि कर्नाटक चुनावों का भले 2024 पर सीधा असर न पड़े, लेकिन उसने भाजपा को सशक्त संदेश दिया है।

जमीनी रिपोर्टरों को पता था कि चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले ही भाजपा वहां हार गई थी, क्योंकि पार्टी 40% सरकार के आरोप को अपने से छुड़ा नहीं पाई थी। भ्रष्टाचार का मुद्दा फ्लोटिंग वोटर्स को प्रभावित करता है। मोदी ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ की बात कहकर राष्ट्रनायक बने थे। कर्नाटक में ये स्लोगन चौपट हो गया। कर्नाटक पहला ऐसा अवसर है, जब भाजपा भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चुनाव हारी है। कांग्रेस का जो हाल 2012-13 में हुआ था, उससे बचने के लिए कर्नाटक का सही पाठ पढ़ना जरूरी है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)