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शेखर गुप्ता का कॉलम:गुमनाम चंदा संदेह पैदा करता है कि कहीं यह घूस तो नहीं, यह वैध चुनावी भ्रष्टाचार

11 दिन पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar
शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

सुप्रीम कोर्ट को भारत में चुनावी फंडिंग की दूषित व्यवस्था को दुरुस्त करने का एक और मौका मिला है। यह उसके लिए भूलसुधार का भी अवसर है। राजनीति में जो भी भ्रष्टाचार है, उसकी जड़ चुनावी फंडिंग ही है। यह 1952 में हुए पहले आम चुनाव से ही शुरू हो गया था। भारत की तीन पीढ़ियों के सबसे बुद्धिमान लोग भी इसे 65 वर्षों में दुरुस्त न कर पाए।

अंततः इसे 1 अप्रैल 2017 को केंद्रीय बजट लागू होते ही वैध बना दिया गया। इसके बाद के पांच वर्षों में एक नई राष्ट्रीय सरकार और दो दर्जन राज्य सरकारें चुनी गईं, गिराई गईं, फिर से चुनी गईं लेकिन व्यवस्था जस की तस बनी रही। सरकार द्वारा लागू की गई गुमनाम चुनावी बॉन्ड की व्यवस्था को बहुत पहले दी गई चुनौती पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 19 सितंबर की तारीख तय की थी पर सुनवाई टल गई।

कोर्ट ने 2019 में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व में तीन सदस्यीय बेंच का गठन किया था, जिसमें जस्टिस दीपक गुप्ता, जस्टिस संजीव खन्ना भी शामिल थे। बेंच ने एक अंतरिम आदेश जारी किया था, जो इतना लचर था कि ब्रिटिश लेखक अलेक्ज़ेंडर पोप ने मानो इसी के लिए यह वाक्य लिखा था- ‘चोट पहुंचाने को राजी तो हूं मगर हमला करने से घबराता हूं।’

वैसे सर्वोच्च अदालत पर सवाल उठाने में शब्दों का बहुत सावधानी से चुनाव करना जरूरी है, खासकर इस मामले में। इसकी वजह यह है कि कोर्ट के अंतरिम आदेश से- जो उसे इस मामले पर जल्द ही विस्तार से विचार करने का मौका देता- ऐसा लगा कि उसने मामले को अनिश्चित काल के लिए लटका दिया हो। यह ‘अनिश्चित काल’ करीब साढ़े तीन साल का हो गया है और इस बीच तीन मुख्य न्यायाधीश कार्यकाल पूरा कर चुके हैं।

संभावना यही है कि जब तक इस पर सुनवाई गति पकड़ेगी तब तक हम पांचवें मुख्य न्यायाधीश के दौर में पहुंच चुके होंगे। पूरी विनम्रता व सम्मान के साथ कहना चाहता हूं कि लगता है मानो यह जोखिम से बचने का मामला बन गया है कि इसमें बहुत घालमेल है, बाद में देखा जाएगा। वैसे भी इस अंतरिम आदेश से एक दिन पहले 2019 के आम चुनाव में कई राज्यों में पहले चरण का मतदान हो चुका था।

इस आदेश में बेंच ने कहा था कि पारदर्शिता होनी चाहिए। और उसने हमें पारदर्शिता दी भी। हुआ सिर्फ इतना कि पारदर्शिता सीलबंद लिफाफे में मिली। बेंच ने कहा कि हरेक पार्टी को इन गुमनाम चुनावी बॉन्डों के जरिए मिले चंदे का ब्योरा चुनाव आयोग को 30 मई 2019 तक देना होगा। इनका खुलासा करना है या नहीं, करना है तो कैसे और कब, यह फैसला आयोग पर छोड़ दिया गया।

यानी बेंच ने गेंद को बगल के मैदान यानी आयोग के पाले में डाल दिया और आयोग उन ब्योरों को दबाकर बैठ गया। जो करने से सर्वोच्च अदालत के जज हिचक गए, उसे सेवानिवृत्त लोकसेवक करेंगे, यह उम्मीद मूर्खता ही होगी। दिवंगत अरुण जेटली ने 2017-18 के बजट में इन चुनावी बॉन्डों की घोषणा करते हुए कहा था कि यह एक आंशिक सुधार है। उन्होंने कहा था चुनावी चंदे से काले धन को खत्म करने की दिशा में यह सिर्फ पहला कदम है।

यह उचित बात लग रही थी क्योंकि तब तक यही हो रहा था कि अमीर लोग, अच्छे या उतने अच्छे नहीं कॉर्पोरेट, जमीन-जायदाद के बड़े खिलाड़ी, खनन के खुदा, अपराधी, तस्कर, ठग, यानी कोई भी उन राजनीतिक दलों और नेताओं को बोरी भरकर नकदी दे रहा था, जिन्हें वह पसंद करता था या आगे बढ़ाना चाहता था। लेकिन अब वे भारतीय स्टेट बैंक से चुनावी बॉन्ड खरीद सकते हैं, बेशक केवल सफेद पैसे से। उन्हें सफेद पैसे से ही खरीदने का प्रोत्साहन इसलिए भी मिलता है कि इन बॉन्डों के जरिए राजनीतिक चंदा देने पर टैक्स में छूट मिलती है।

इसने राजनीतिक खेमे को भी उसी सफेद दायरे में शामिल होने का मौका दिया, क्योंकि उसे जो चंदा मिलता है वह टैक्स-मुक्त है। लेकिन अगर यह पारदर्शिता की ओर पहला कदम था, तो अगला तार्किक कदम न उठाने ने रोग के इस उपचार को रोग से भी बदतर बना दिया। इसका हिसाब कुछ इस तरह है। दानकर्ता- आम तौर पर कोई कॉर्पोरेट- स्टेट बैंक जाकर बियरर चेक या बॉन्ड के जरिए उसकी रकम के बराबर मूल्य का चुनावी बॉन्ड खरीदता है और अपनी पसंद की पार्टी को सौंप देता है।

वह पार्टी उस बॉन्ड को निर्धारित बैंक खाते में जमा कर देती है। दानकर्ता को किसी को यह बताने की जरूरत नहीं है कि उसने बॉन्ड किसे सौंपा और दान पाने वाले को भी खुलासा करने की जरूरत नहीं कि पैसा कहां से मिला। इस तरह, पहले कदम ने चुनावी फंडिंग को काले से सफेद पैसे के दायरे में तो ला दिया लेकिन दूसरे कदम ने उस पर गुमनामी का पर्दा डाल दिया।

सो मामला वही रहा कि दो हितबद्ध पक्षों के बीच पूरे अंधेरे में पैसे का लेन-देन हुआ, लेकिन मतदाता नहीं जान पाएगा कि किसने किसको कितने पैसे दिए। उदाहरण के लिए, किसे मालूम कि किसी सेक्टर (मान लीजिए कि इस्पात) को अचानक शुल्कों में भारी वृद्धि करने की छूट क्यों दे दी गई, जबकि इस संदेह को दूर करने का कोई उपाय नहीं है कि इस गुटबंद उद्योग ने इन चुनावी बॉन्डों की भारी खरीद की होगी।

इसके अलावा, बाहर के किसी शख्स को तो कुछ मालूम नहीं हुआ, जबकि ‘सिस्टम’ को सब मालूम है। आखिर सरकारी बैंक को तो पता ही है कि बॉन्ड किसने खरीदे या किस दल ने कितना पैसा जमा किया। इसके बाद तो सिर्फ बॉन्ड के नंबरों का मेल करना रह जाता है। इस तरह ‘सिस्टम’ जिसके कब्जे में है वह आसानी से पता लगा सकता है कि कौन दोस्त है और कौन दुश्मन, किसे लाभ पहुंचाना है, किसे सजा देनी है।

संदिग्ध किस्म के सुधार
नए चुनावी बॉन्डों ने ‘सिस्टम’ की सफाई करने की जगह भ्रष्टाचार को वैध बना दिया है। पांच साल से ज्यादा बीत चुके हैं। भारत की चुनावी फंडिंग की व्यवस्था इस संदिग्ध किस्म के ‘सुधार’ से पहले के दौर में जैसी थी, उसके मुकाबले अब और दूषित हो चुकी है। क्या भारत अपनी सबसे सम्मानित संस्था सर्वोच्च अदालत से उम्मीद कर सकता है कि वह स्पष्टता बहाल करके भूल सुधार करेगी?

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)