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शेखर गुप्ता का कॉलम:पाकिस्तान को अहमियत जताने का मौका तब तक मत दीजिए जबतक कि उसका मिजाज ना बदल गया हो

11 दिन पहले
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शेखर गुप्ता एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar
शेखर गुप्ता एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

बीते सप्ताह पाकिस्तान वह करने में कामयाब रहा, जिसमें उसे इधर कुछ समय से कामयाबी नहीं मिल रही थी। वह अपने सकारात्मक रुख और अमनपसंदगी के इरादे का दिखावा करने के लिए भारत में सुर्खियां बटोरने में सफल रहा। इस इरादे की वजह क्या है, इसकी तीन व्याख्याओं पर हम नजर डालेंगे। और हम तीन वजहें इस तर्क के पक्ष में भी पेश करेंगे कि उसके इस इरादे का हमारी ओर से सबसे अच्छा जवाब यही होगा कि हम खामोशी अख्तियार करते हुए कोई प्रतिक्रिया न दें।

प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने टीवी चैनल ‘अल अरबिया’ को दिए इंटरव्यू में कहा कि पाकिस्तान ने भारत से तीन लड़ाई लड़कर सबक सीख लिया है और अब वह अमन चाहता है। इससे कुछ दिनों पहले पाकिस्तान एयर फोर्स के वाइस मार्शल शहजाद चौधरी अपने एक कॉलम में भारत से शांति कायम करने की अपील कर चुके हैं। उनकी अपील को शांतिवादी नारा मानकर इसलिए खारिज नहीं किया गया, क्योंकि वे सत्तातंत्र व ताकतवर इंटर सर्विसेज पब्लिक रिलेशन्स से जुड़े हैं।

पाकिस्तान के इस सुर का पहला स्रोत क्या है, इसे आसानी से समझा जा सकता है। उसे इन तीन चीजों की सख्त जरूरत है- रणनीति के मामले में दम मारने की फुरसत, वित्तीय उदारता और सबसे अहम, अपनी अहमियत। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति 1950 के बाद से उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक थाती रही।

जब तक शीतयुद्ध जारी था, उसकी अहमियत इसलिए थी कि वह अफगानिस्तान (सोवियत संघ का बफर स्टेट यानी दो दुश्मन देशों के बीच का देश) और भारत (जिसे सोवियत खेमे का सदस्य नहीं तो दोस्त माना जाता रहा है) के बगल में है। सोवियत संघ जब अफगानिस्तान में हार गया, तब ओसामा बिन लादेन ने अपना अड्डा अफगानिस्तान (जिसे मुजाहिदीन के जरिए पाकिस्तान के नियंत्रण में माना जाता था) में बनाकर पाकिस्तान का वजन भौगोलिक-रणनीतिक दृष्टि से बढ़ा दिया था।

जब तक यह स्थिति कायम रही, पाकिस्तान की चांदी रही। इसने उसे अरबों डॉलर की मदद के अलावा ढेरों हथियार और कूटनीतिक समर्थन भी दिलाया। इसके साथ यह भी हुआ कि कश्मीर पर भारत के दावों के प्रति पश्चिमी देशों ने गोलमोल रवैया अपनाए रखा। लेकिन पाकिस्तानी सत्तातंत्र अफगानिस्तान में अपनी मुहिमों के साथ जो इस्लामवाद जोड़ता रहा है, वह भी वहां पैठ कर गया।

यही वजह है कि अफगानिस्तान में अमेरिका से लड़ाई ‘जीतने’ के साथ ही उसने सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को भी मार डाला। इमरान खान ने इसे ‘आजादी’ बताया तो सत्तातंत्र से जुड़े आईएसआई के तत्कालीन प्रमुख फैज हामिद समेत कई लोगों ने इसका जश्न इस्लाम की फतह के रूप में मनाया। लेकिन अफगानिस्तान को जब अमेरिका ने नजर से ओझल कर दिया, तब पाकिस्तान ने अपनी रणनीतिक थाती गंवा दी। अब चीन समेत कोई भी देश भारत के मद्देनजर उसे अहमियत देने को राजी नहीं है।

अब पाकिस्तान की अपनी रणनीतिक शतरंज पर कम ही गोटियां बची हैं। वह कोई दूसरी चाल सोचे, इसके लिए उसे सांस लेने की फुरसत चाहिए। भारत के साथ बातचीत महज ऐसा ही एक उपाय है। उसकी अर्थव्यवस्था दिवालिया हो चुकी है। उसकी हालत श्रीलंका जितनी बुरी सिर्फ इसलिए नहीं दिखती क्योंकि असली श्रीलंका पास में ही है।

पाकिस्तान यह मान बैठा है कि खाड़ी के अरब देश एक बड़े सुन्नी मुल्क और इस्लामी दुनिया के एकमात्र खुले रूप से परमाणुशक्ति सम्पन्न देश को ढहने नहीं देंगे। लेकिन अब इसके साथ शर्तें जुड़ गई हैं। इन शर्तों में एक यह है कि भारत के साथ गड़बड़ करने से बाज आओ।

पाकिस्तान द्वारा अपने पूरब में किए जाने वाले दुस्साहसों को बर्दाश्त करने का धैर्य अब किसी में नहीं है। इसके अलावा, भारत के साथ इन मुस्लिम मुल्कों के ज्यादा गहरे आर्थिक-रणनीतिक रिश्ते हैं। पाकिस्तान को अगर अपने लिए ऑक्सीजन की सप्लाई जारी रखनी है तो उसे दान देने वालों को भरोसा दिलाना होगा कि वह अब बदल गया है, कि वह अपने रणनीतिक अहंकार को परे रखकर असलियत को विनम्रता से स्वीकार कर रहा है।

इसलिए वह यह मुद्रा अपना रहा है कि ‘देखिए, हम भारत से भी बातचीत कर रहे हैं!’ पाकिस्तान की अहमियत खोने की वजह यह है कि उसका भौगोलिक-रणनीतिक वजन घट रहा है। लेकिन सिर्फ यही नहीं हुआ है। उसकी अहमियत इसलिए भी थी कि वह भारत के लिए ही नहीं बल्कि उसके जरिए पूरी विवेकी दुनिया के लिए भी इस चिंता के कारण सिरदर्द बना हुआ है कि क्या पता कब वह इस क्षेत्र में परमाणु युद्ध शुरू कर दे।

इसीलिए दिवंगत विद्वान स्टीफन कोहेन कहा करते थे कि पाकिस्तान ऐसा देश है, जो अपने सिर पर बंदूक तान कर दुनिया से बात करता है कि मुझे जो चाहिए वह दे दो वरना मैं बटन दबा दूंगा। क्या आप गड़बड़ को ठीक करने को तैयार हैं?

यह भारत के साथ लड़ाई का माहौल बनाए रखकर किया जा रहा था। जब आपको अपने ऊपर ज्यादा ध्यान खींचने की जरूरत महसूस हुई, दुश्मनी का पारा ऊपर कर दिया। यह सब तब तक तो सुरक्षित चाल रही जब तक भारत जवाबी कार्रवाई नहीं कर रहा था। उरी में सीमा पार जाकर की गई ‘स्ट्राइक’ और इसके बाद बालाकोट में बमबारी ने कायदे बदल दिए।

भारत ने जब दिखा दिया कि वह तनाव बढ़ने और यहां तक कि परमाणु खतरे तक की चिंता न करते हुए जवाब देगा, तब पाकिस्तान का झांसा नाकाम हो गया। इसने उसकी अहमियत को बेमानी साबित कर दिया। अब भारत के साथ बातचीत से शायद यह थोड़ी बहाल हो।

पाकिस्तान को जवाब न देना ही बेहतर
पाकिस्तान की चालों का सबसे अच्छा जवाब यही है कि उसे कोई जवाब ही न दें। जो भी कदम उसकी रणनीतिक प्रासंगिकता बहाल करेगा, वह भारत के लिए नकारात्मक होगा। पाकिस्तान में आटे के ट्रक के पीछे दौड़ते लोगों का वीडियो देख लीजिए। यह हालत उस मुल्क की हो गई है, जो प्रति व्यक्ति जीडीपी के आंकड़े के मुताबिक 1985 तक भारत से दो-तिहाई ज्यादा अमीर था।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)