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शेखर गुप्ता का कॉलम:‘आप’ कांग्रेस के मुकाबले किस तरह अलग है, यह बग्गा वाले मामले से स्पष्ट

15 दिन पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar
शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

2009 से 2019 के आम चुनावों तक भाजपा ने राष्ट्रीय वोट शेयर में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर करीब दोगुनी कर ली थी। तमाम सबूत यही कह रहे हैं कि आज वह दोगुनी ताकतवर हो गई है। इस बीच, 2017 के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था गतिरोध की स्थिति में है, बेरोजगारी ऐतिहासिक ऊंचाई पर है, महंगाई चरम पर है, और दो सालों से हम महामारी का दर्द भी झेल रहे हैं। फिर भी, भाजपा के वोटर डिगे नहीं हैं।

ये केवल प्रतिबद्ध वोटर नहीं हैं, जिन्हें आप ठोस हिंदुत्ववादी मतदाता कहते हैं। उन्होंने तो 2009 में भी भाजपा को वोट दिया था। ये तो वे नए करोड़ों वोटर हैं जिन्हें भाजपा ने बाद में अपनी तरफ खींचा, और उसके प्रति जिनकी प्रतिबद्धता अडिग दिखने लगी है। बढ़ती बेरोजगारी से लेकर महंगाई तक सभी नकारात्मक बातों को वे कबूल करते हैं, उन पर झल्लाते हैं, लेकिन उनसे पूछिए कि वे किसे वोट देंगे तो उनका जवाब यही होगा- भाजपा।

अगर आप उनके तर्कों को सुनेंगे कि नरेंद्र मोदी का विकल्प कौन है, तो यह सहज बुद्धि के बहुत विपरीत नहीं लगेगा। उनका तर्क होता है कि हम राहुल गांधी को कैसे वोट दे सकते हैं? और फिर से ‘खिचड़ी गठबंधन’ भला कौन चाहता है? लेकिन जिन्हें लगता है कि ‘कोई विकल्प नहीं है’, उन्हें बता दें कि कुछ चीजों के बदलने की शुरुआत हो चुकी है। एक विकल्प उभर रहा है। लेकिन यह भाजपा का नहीं, कांग्रेस का विकल्प है।

हालांकि, मोदी के वर्चस्व के इस दौर में भी एक उल्लेखनीय तथ्य कायम है कि कांग्रेस ने 20 फीसदी का अपना न्यूनतम वोट प्रतिशत बनाए रखा है। 2014 और फिर 2019 के आम लोकसभा चुनावों में सफाया होने के बाद भी कांग्रेस के वोट भाजपा को छोड़ किन्हीं भी पांच दलों के कुल वोट से ज्यादा थे। इसलिए वह भविष्य के किसी भी भाजपा-विरोधी गठबंधन या चुनौती के लिए अहम बनी रही।

जब तक वह अपने वोट बैंक को साबुत बनाए रखेगी तब तक किसी दूसरी पार्टी या गठबंधन के लिए मोदी को चुनौती देना असंभव है। इसने कांग्रेस को सत्ता के लिए सौदेबाजी करने की ताकत भी दी है, चाहे यह गठबंधन बनाने का मामला हो या प्रशांत किशोर से निबटने का। लेकिन वह आधार अब खिसक रहा है। यह कांग्रेस के लिए बुरी खबर तो है, लेकिन भाजपा के लिए भी कोई अच्छी खबर नहीं है।

उसके गैर-पारंपरिक वोटर्स के पास यह बहाना नहीं रह जाएगा कि ‘कोई विकल्प नहीं है।’ 2014 के आसपास कांग्रेस उन राज्यों में भी हारने लगी थी, जिनमें उसका दबदबा था। सबसे उल्लेखनीय हार आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में हुई। हाल ही में पंजाब में क्या हुआ? एक राज्य जिसे कांग्रेस कुछ हद तक ‘अपना’ कह सकती थी, वहां भी उसे हार का मुंह देखना पड़ा, वह भी भाजपा की एक दूसरी ‘सेकुलर’ प्रतिद्वंद्वी ‘आप’ के हाथों।

राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के मुख्य प्रतिद्वंद्वी को चोट पहुंची। फायदा यह भी हुआ कि अरविंद केजरीवाल और ‘आप’ के रूप में एक नया, ज्यादा शोर मचाने वाला, लोकलुभावनवादी और आक्रामक प्रतिद्वंद्वी उभर आया। ‘आप’ की सरकार सुस्त कांग्रेस के मुकाबले किस तरह अलग पैमाने पर एक चुनौती बन गई है, यह तेजिंदर बग्गा वाले तमाशे से स्पष्ट है। बात केवल ‘आप’ की नहीं है।

बात कांग्रेस की अपने वफादार वोटर्स को बचाए रखने की अक्षमता की है, जब उसके सामने दूसरा कोई स्वीकार्य विकल्प मौजूद हो। आंध्र में वह विकल्प जगन थे, तेलंगाना में केसीआर, बंगाल में टीएमसी और पंजाब में ‘आप’। राजनीतिक नक्शे पर एक नजर डालने से साफ हो जाएगा कि कांग्रेस केवल राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, हरियाणा, असम, हिमाचल प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में ही उल्लेखनीय जनाधार रखती है।

इस साल के अंत में होने वाले हिमाचल प्रदेश और गुजरात के चुनावों पर नजर रखने की जरूरत है क्योंकि ‘आप’ वहां अपनी ताकत दिखाएगी। महाराष्ट्र में सहयोगी एनसीपी कांग्रेस के बूते बढ़त बना रही है। हरियाणा में कांग्रेस के संगठन में लगातार गड़बड़ी जारी है; राजस्थान में भीतरी असंतोष है और कोई नहीं जानता गुजरात में क्या हो रहा है।

भाजपा यह नहीं समझ पा रही है कि वह पुराने दुश्मन के कमजोर पड़ने पर खुश हो या नए दुश्मनों के उभार को लेकर चिंतित हो। भाजपा कभी नहीं चाहेगी कि कोई विकल्प उभरे, चाहे वह कांग्रेस का ही क्यों न हो।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)