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शेखर गुप्ता का कॉलम:जी-20 की मेजबानी भारत को कैसे एक नई रणनीतिक जगह और 2024 चुनाव से पहले मोदी को नया मंच दे सकती है

18 दिन पहले
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शेखर गुप्ता एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar
शेखर गुप्ता एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

बाली में जी-20 का शिखर सम्मेलन खत्म होने पर इंडोनेशिया ने समूह की अध्यक्षता का भार भारत के नरेंद्र मोदी को सौंप दिया। भारत के लिए इसका अर्थ यह होगा कि पूरे साल उसे विदेश मामलों पर उतना ध्यान देना होगा, जितना पहले नहीं दिया गया।

खासकर इसलिए कि भारत दुनिया के उस हिस्से की मेजबानी करेगा, जो दुनिया की जीडीपी में 80% और विश्व व्यापार में 75% हिस्सेदारी करता है। और यह मेजबानी एक ऐसे नेता के नेतृत्व में होगी, जिसे शानदार समारोह आयोजित करना पसंद है।

लालकृष्ण आडवाणी ने एक बार कहा था कि मोदी अच्छे ‘इवेंट मैनेजर’ हैं, और फिर ऐसा कहने की कीमत भी चुकाई। लेकिन सालभर चलने वाला प्रभावशाली प्रदर्शन कोई साधारण ‘इवेंट’ नहीं होगा। यह मोदी के 2024 के चुनाव अभियान को शानदार रंगत देगा। दुनिया भर के सबसे अहम चेहरे भारत पधारेंगे, मौके की तहजीब के तहत उन्हें भारत के नेता की तारीफ करनी ही पड़ेगी।

सालभर में करीब 100 बैठकें होंगी और तब शिखर सम्मेलन होगा। ये बैठकें देश के अलग-अलग शहरों में की जाएंगी। ‘विश्वगुरु’ को बेहद तड़क-भड़क के साथ पेश किया जाएगा। इस सबको चुनाव अभियान के साथ सफाई से जोड़ दिया जाएगा। लेकिन भारत के लिए यह कूटनीतिक-रणनीतिक दृष्टि बहुत अहम है।

सोवियत साम्राज्य के काफूर होने के बाद करीब 2 साल तक अस्थिरता की वजह से जिस तरह वैश्विक शक्ति असंतुलन की स्थिति रही, आज फिर वैसी स्थिति बन गई है। इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार तो व्लादिमीर पुतिन को माना जा सकता है, लेकिन शी जिनपिंग भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं।

सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया करीब एक चौथाई सदी तक एकध्रुवीय व्यवस्था में रही, जब तक कि उभरते चीन ने इसे चुनौती नहीं दी। इस बदलाव को इस धारणा से मदद मिली कि अमेरिका कमजोर पड़ रहा है। पहले बराक ओबामा ने ‘नेपथ्य से नेतृत्व’ का विचार दिया, इसके बाद डोनाल्ड ट्रम्प ने वैश्वीकरण से कदम पीछे खींच लिए, और जो बाइडन ने अफगानिस्तान से अपमानजनक वापसी का फैसला कर लिया। अगर 2022 के शुरू होने तक दुनिया उसी स्थिति में रहती जिस स्थिति में पहले थी, तब जी-20 को इतनी ताकत न मिलती। कुछ नाटकीय बदलावों पर नजर डालें।

अमेरिका की ताकत फिर बढ़ने लगी है। मुद्रास्फीति और दूसरी चुनौतियों के बावजूद उसकी अर्थव्यवस्था की सेहत बाकी विकसित देशों की अर्थव्यवस्था के मुकाबले बेहतर है और सुधार पर है। कबायली बगावत से लड़ाई में तालिबान से हारने के एक साल बाद वह असली मोर्चे यानी यूक्रेन में जीत दर्ज कर रहा है, जिसमें दुश्मन एक पूर्व ‘सुपर पावर’ है और जो नई उभरती ‘सुपर पावर’ चीन का सबसे मूल्यवान सहयोगी है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपनी फौज सीधे तैनात किए बिना जीत दर्ज कर रहा है। अमेरिका ने विदेश में जो लड़ाई लड़ी, उनका इतिहास देख लीजिए। जब वह किसी दूसरे की लड़ाई लड़ने के लिए सेना भेजता है, उसे हार का सामना करना पड़ता है, चाहे यह वियतनाम हो, इराक हो या मध्य पूर्व का कोई देश। जेलेंस्की के यूक्रेनियों ने बाइडन और अमेरिका पर लगे काबुल के कलंक को मिटा दिया है, भले ही वह पश्चिमी ताकतों से मिले हथियारों के बूते क्यों हो।

रूस सामरिक, कूटनीतिक, राजनीतिक स्तरों पर युद्ध हार रहा है। मुझे भारत में पुतिन के लिए व्यापक समर्थन और सोवियत संघ के लिए बचे-खुचे आकर्षण पर तरस आता है। यह इस धारणा को जन्म देता है कि युद्ध में रूस सही भूमिका में है। लेकिन अफसोस की बात है कि अपने से बेहद छोटे आकार के कमजोर दुश्मन से 9 महीने तक लड़ने के बाद पूरे 800 किमी लंबे मोर्चे से उसे पीछे हटना पड़ रहा है।

मॉस्को की आंतरिक राजनीति जो भी हो, यह रूस और पुतिन को और कमजोर करेगा। भारत के लिए यह अच्छा होगा। क्योंकि रूस अगर चीन का दोस्त बन गया और पाकिस्तान को रिझाने लगा है, तो भारत भी अपने रणनीतिक विकल्प व्यापक कर रहा है।

रणनीति के मैदान में मौका
भारत एक साल के लिए जी-20 का अध्यक्ष है। इस कारण मोदी को रणनीति के मैदान में बहुत कुछ करने का अवसर मिल सकता है। अब तक वे इसे कुशलता से चलाते रहे हैं- भारत के आर्थिक व रणनीतिक हितों में संतुलन बनाकर, रूस और अमेरिका के साथ रिश्ता निभाते हुए और चीन को अपने ऊपर हावी न होने देकर। यह जो अवसर मिला है उसका वे भारत के फायदे के लिए उपयोग करेंगे।

हम भारतीयों में यह आदत है कि दूर किसी देश में लड़ाई चल रही हो, जिससे हमारा कोई लेना-देना न हो, उसमें भी हार रहे पक्ष के साथ हम दार्शनिक या दिलचस्प रूप से नैतिक आधार पर खुद को जोड़ लेते हैं। पहला जो अफगानी जिहाद हुआ उसमें हम चाहते थे कि सोवियत पक्ष जीत जाए लेकिन वह हार गया।

दूसरे जिहाद में हम अमेरिकी पक्ष का जोश बढ़ा रहे थे और वह हार गया। अब मुखर जनमत, मीडिया, विदेश नीति के टीकाकारों, रणनीतिक मसलों के जानकारों में यह धारणा है कि रूस अपराजेय है। हम फिर पराजित पक्ष के साथ खड़े दिखेंगे।

लेकिन चीन इसे अलग तरह से देखता है। पुतिन की भारी भूल ने चीन की उभरती ताकत को जबर्दस्त झटका दिया है। उसे सहयोगी और एनर्जी के स्थायी स्रोत के रूप में रूस की जरूरत थी। युद्ध में हार से कमजोर पड़ते रूस ने चीन के गुब्बारे में पिन चुभो दी है। सबसे पहले तो इसने ‘बीआरआई’ को भारी चोट पहुंचाई है। अब जिस तरह परमाणु हथियार के इस्तेमाल की लगातार धमकी दी जा रही है, वह भी एक शर्मनाक बात है।

चीन के सभी तीनों रणनीतिक सहयोगी- उत्तरी कोरिया, पाकिस्तान और रूस परमाणु हमले की धमकी देते रहना पसंद करते हैं। करीब पांच साल पहले तक आम धारणा यह थी कि उभरता चीन 2030 तक अमेरिका से आगे निकल जाएगा। लेकिन यह अनुमान सही होता नहीं दिख रहा। ऐसे में भारत का एक साल के लिए जी-20 का अध्यक्ष बनना हमारे लिए नए अवसर पैदा करेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)