• Hindi News
  • Opinion
  • Shekhar Gupta's Column – Inappropriate Comparison Of Hindutva With ISIS; Before Raising Such Topics, Congress Leaders Should Know About It.

शेखर गुप्ता का कॉलम:हिंदुत्व की आईएसआईएस से तुलना अनुचित; ऐसे विषय उठाने से पहले कांग्रेस नेता उसके बारे में जानें

6 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar
शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

एक अरसे से कई प्रकाशक मुझसे किताब लिखने का आग्रह कर रहे हैं। हर बार मैं यह बहाना दोहरा देता हूं कि संपादक नौकरियों के बीच में ही किताबें लिखते हैं। वैसे, यह बात नेताओं पर भी लागू होती है, जो नौकरियों के बीच में या सत्ता से बाहर होने पर किताबें लिखते हैं, जैसा कि कांग्रेस के नेता सलमान खुर्शीद ने हाल में किया है। उनकी किताब ने प्राइम टाइम के ‘डिबेट’ के लिए भरपूर मसाला जुटाया। खुर्शीद सुर्खियां बटोर रहे हैं।

इतनी कि आपको उनकी किताब पढ़ने की भी जरूरत नहीं है। इसमें की गई एक असावधानी भरी या अविवेकपूर्ण टिप्पणी पर विवाद है, जिसमें हिंदुत्व की तुलना आईएसआईएस या इस्लामिक स्टेट (दाएश) से की गई है। राहुल गांधी ने इस आग में घी डाला और हिंदू धर्म और हिंदुत्व के बीच के फर्क को रेखांकित करते हुए खुर्शीद के तर्क को आगे बढ़ाया है। क्या हिंदू धर्म आपको अख़लाक़ जैसे व्यक्ति की हत्या की सीख देता है?

क्या हिंदू धर्म अल्पसंख्यकों से नफरत करने की सीख देता है? ये अच्छे सवाल हैं और इनके जवाब वही होंगे जो वे चाहते हैं, ‘नहीं, वह ऐसी कोई सीख नहीं देता।’ जबकि इसके आगे हिंदुत्व के लिए उनका तर्क यह है कि हिंदुत्व यह सब करने की सीख देता है, नरेंद्र मोदी, बीजेपी और आरएसएस का आग्रह है कि हिंदू धर्म और हिंदुत्व में कोई अंतर नहीं है, वे दोनों एक ही हैं।

हिंदू धर्म और हिंदुत्व क्या है, क्या वे एक ही हैं या उनमें अंतर है? क्या हिंदू धर्म केवल एक आस्था में विश्वास और उस पर अमल है? और हिंदुत्व उसका राजनीतिक सैद्धांतिक रूप है? अगर ऐसा है तो क्या हिंदू धर्म भी इस्लामवाद या प्राचीन ईसाइयत की तरह एक राजनीतिक आस्था है? क्या हिंदुओं की भी ऐसी एक पार्टी है? क्या वह पार्टी बीजेपी है? क्या इसका सैद्धांतिक या दार्शनिक स्रोत और संरक्षक आरएसएस है?

यह एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण विमर्श है लेकिन क्या इससे वह आईएसआईएस जैसा हो जाता है? सभी सामाजिक शक्तियों में ऐसा बहुत कुछ समान है जिनके चलते धर्म और राजनीति में घालमेल हो जाता है। इसका दायरा इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग से लेकर अब्बास सिद्दीकी तक, कोलकाता के पास के फुरफुरा शरीफ के मौलवी से लेकर पुरानी केरल कांग्रेस के तत्वों तक, अकाली दल से लेकर तमाम पार्टियों तक फैला हुआ है।

इनमें से किसी को राजनीति के लिए धर्म का इस्तेमाल करने, ‘दूसरी’ आस्था वालों के खिलाफ कड़वी बातें करने से परहेज नहीं है। फिर भी क्या आप उन्हें आईएसआईएस जैसा घोषित कर देंगे? क्या वे दूसरी आस्था वालों को बड़े पैमाने पर गुलाम बना रहे हैं। उन्हें प्रताड़ित कर रहे हैं? आईएसआईएस ने यजीदियों पर अत्याचार किए, मगर खुद अपने मजहब के मुसलमानों को उनसे कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचाया।

आईएसआईएस इस्लामी धर्मतंत्र की अधिकतर या सभी हुकूमतों से क्यों नफरत करता है? क्योंकि वह केवल एक इस्लाम (और वह भी उसके अपने संस्करण वाले) के धागे में गुंथा नया ‘पैन-नेशनल’ राज्यतंत्र बनाना चाहता है। इसलिए, कोई आश्चर्य नहीं कि उसका सबसे तीखा विरोध वे देश कर रहे हैं जो इस्लामी दुनिया के ही हैं। ऐसी तुलनाएं करके हम शायद अपनी ही हदें तोड़ रहे हैं। जाहिर है, खुर्शीद कह सकते हैं कि उनका यह आशय नहीं था।

लेकिन जिस सार्वजनिक हस्ती की बातों को लोग गंभीरता से लेते हों उसे ऐसी तुलना करने से पहले क्या पुनर्विचार नहीं करना चाहिए? बेशक इसने उनकी पार्टी में ही दो मत पैदा कर दिए हैं। इससे कांग्रेस पार्टी ने वह रूप धारण कर लिया है जो अरसे से देखा नहीं गया था, एक वैचारिक मुद्दे पर खुली असहमति जताने और बहस करने वाला रूप।

अब यह फैसला उन्हें करना है कि आज यह मुद्दा उठाना विवेकसम्मत था या नहीं या क्या यह एक ऐसा वैचारिक मुद्दा है जिसे सुलझाना उनके लिए जरूरी हो गया था लेकिन इस मोड़ पर उन्होंने अनिर्णय में फंसे और मोदी सरकार से निराश हो रहे उन हिंदू मतों के बड़े हिस्से को वापस बीजेपी और आरएसएस के पाले में भेज दिया है। दुनिया के किसी भी कोने में प्रचलित किस आस्था को अपनी तुलना आईएसआईएस से की जानी नागवार नहीं गुज़रेगी? सबसे ज्यादा नाराज तो मुस्लिम ही होंगे।

हमें मालूम है कि खुर्शीद, राहुल और उनके समर्थकों के तर्कों के स्रोत क्या हैं। उनका तर्क है कि भाजपा आरएसएस का राजनीतिक मुखौटा भर ही है और वह इस सीधे से सिद्धांत पर काम करती है कि अगर करीब 50% या उससे ज्यादा हिंदू उसे वोट देंगे तो वह सत्ता में बनी रह सकती है। वे आरोप लगाते हैं कि भाजपा ने मुसलमानों को सत्ता के सभी ढांचे, राजनीति, आला सरकारी ओहदों, सुरक्षा व न्यायपालिका के पदों से व्यवस्थित तरीके से बाहर कर दिया है।

अगर ऐसा है तो क्या इससे यह साबित हो जाता है कि आरएसएस और आईएसआईएस एक जैसे हैं? बहरहाल, कोई भी बहस चाहे कितनी भी विभाजनकारी हो, हमेशा एक स्वस्थ प्रक्रिया होती है। लेकिन आलस भरा मनमाना आरोप-प्रत्यारोप ऐसी बहस को बेमानी कर देता है। अधिकतर मतदाता, चाहे वे किसी को वोट देते हों, आईएसआईएस के साथ की गई इस तुलना को असहनीय मान सकते हैं।

ज्यादा स्पष्ट रूप से कहें तो पूछा जा सकता है कि क्या ऐसा करके उस शख्स का दिमाग बदला जा सकता है जिसने मोदी को वोट दिया है? मैं केवल यह कहना चाहता हूं कि एक गाली की तरह कोई ठप्पा उछाल देना आसान लग सकता है। यह आपको कुछ देर के लिए संतोष दे सकता है या अपनी भड़ास निकालने में मदद कर सकता है, लेकिन यह किसी की राजनीतिक तकदीर में बदलाव नहीं ला सकता।

ठप्पों के इस्तेमाल की सबसे बुरी बात यह है कि यह आपके बौद्धिक आलस्य को उजागर कर देता है। दिल्ली में 1984 में या गुजरात में 2002 में हुए नरसंहार हों या उनसे पहले भिवंडी, भागलपुर, हाशिमपुरा, मुरादाबाद में हुए कांड, वे सब भीषण हत्याकांड ही थे। क्या इनमें से किसी को ‘होलोकास्ट’, जातीय विनाश कह सकते हैं? ‘होलोकास्ट’ में 60 लाख से ज्यादा यहूदियों को मारा गया। 1984 या 2002 में हजारों लोगों की हत्या क्या बुरी बात नहीं थी? बेशक थी लेकिन ‘होलोकॉस्ट’? उसे यह नाम देना यहूदियों की सबसे दर्दनाक विरासत के लिए कड़वी बात ही होगी।

ठप्पों के साथ समस्या यह नहीं कि वे बहस को भड़काते हैं बल्कि यह है कि वे तर्क-वितर्क के दरवाजे बंद कर देते हैं। इस तरह के बौद्धिक आलस्य के शिकार होने वाले अकेले सलमान खुर्शीद ही नहीं हैं। इरफान हबीब सरीखे जाने-माने वामपंथी इतिहासकार भी 2015 में ऐसी तुलना कर चुके हैं। उस समय मैंने इस स्तंभ में उनको जवाब दिया था। ऐसे ऊंचे विषय को उठाने से पहले कांग्रेसी नेताओं को आईएसआईएस के बारे में कुछ और जानकारी हासिल करनी चाहिए और चुनावी राजनीति का पाठ भी फिर से पढ़ना चाहिए।

ऐसी तुलना किसे पसंद है?
हिंदुत्व की आईएसआईएस से तुलना जैसी तुलनाओं से हम शायद अपनी ही हदें तोड़ रहे हैं। दुनिया के किसी भी कोने में प्रचलित किस आस्था को अपनी तुलना आईएसआईएस से की जानी नागवार नहीं गुज़रेगी? खुद इस्लामी देश आईएसआईएस का सबसे तीखा विरोध करते हैं। ऐसे में इस तुलना का कोई औचित्य नहीं है। ऐसा कोई तथ्य नहीं दिखता जो यह साबित कर सके कि आरएसएस और आईएसआईएस एक जैसे हैं। अधिकतर मतदाता, चाहे वे किसी को वोट देते हों, आईएसआईएस के साथ की गई इस तुलना को असहनीय मान सकते हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)