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शेखर गुप्ता का कॉलम:लगता है कि किसी ने गैर-भाजपा मुख्यमंत्रियों को जगाकर याद दिलाया है कि जो केंद्र कर सकता है, वो भी वही कर सकते हैं

3 महीने पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar
शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

आज के स्कूली बच्चे भी आपको बता सकते हैं कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में ‘एमएडी’ सिद्धांत का क्या मतलब होता है। इसका पूरा रूप है- ‘म्युचुअली एश्योर्ड डिस्ट्रक्शन’। यानी कोई देश अगर दूसरे पर एक परमाणु हथियार से हमला करता है तो उसका जवाब तीन परमाणु हथियारों के हमले से दिया जाएगा।

चूंकि दोनों लड़ाकू देशों को विश्वास है कि दोनों तबाह हो जाएंगे, इसलिए वे शांति बनाए रखते हैं। इस सिद्धांत की बदौलत बड़ी ताकतों में 75 साल से शांति कायम है। व्लादीमिर पुतिन अब आजमा रहे हैं कि इसे कहां तक खींचा जा सकता है। लेकिन जरा देखिए कि यह ‘एमएडी’ सिद्धांत भारतीय राजनीति में किस रूप में उभर रहा है। करीब दो साल पहले इस स्तंभ में हमने बताया था कि सत्ता जिन्हें पसंद नहीं करती, उनके खिलाफ तीन तरह के हथियारों से आक्रमण की रणनीति को सफाई से लागू कर रही है।

ये तीन हथियार हैं- 1. पुलिस, जांच/टैक्स एजेंसियां और ईडी (प्रवर्तन निदेशालय), इन सभी को हम ‘एजेंसियां’ कह सकते हैं; 2. फ्रैंडली टीवी चैनल; और 3. सोशल मीडिया पर जोरदार ऑपरेशन। आपके कब्जे में कोई एजेंसी है तो कोई आरोप उछाल दीजिए, चाहे वह कितना भी मनमाना क्यों न हो; आपके फ्रैंडली टीवी चैनल प्राइम टाइम पर आरोपित व्यक्ति को बदनाम करने में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे; और इसके बाद कम-से-कम 72 घंटे तक सोशल मीडिया, खासकर ट्विटर पर उसे जाने क्या-क्या नहीं घोषित किया जाता रहेगा।

यह सब बहुत समय तक चलता रहा लेकिन अब नहीं चल पा रहा है। न हो तो ममता बनर्जी को देखिए, जिनके भतीजे और संभावित उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी और उनकी पत्नी मुश्किल में घिरी हैं। या महाराष्ट्र के उद्धव ठाकरे को देखिए, जिन्हें इस तीन-तरफा आक्रमण को तब झेलना पड़ा, जब उनके बेटे के खिलाफ अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की हत्या की साजिश में शामिल होने का मनमाना आरोप थोपा गया। प्राइम टाइम योद्धाओं और सोशल मीडिया ने लंबे समय तक यह मुहिम चलाई।

महाराष्ट्र में राज्य के दो मंत्री तो कुछ समय से जेल में बंद हैं। आखिर यह सब बदलना ही था। ऐसा लगता है कि किसी ने गैर-भाजपा मुख्यमंत्रियों को नींद से जगाकर याद दिलाया कि अगर केंद्र अपनी एजेंसियों का इस्तेमाल करके उन्हें धमका-डरा सकता है तो वे भी ऐसा कर सकते हैं। आखिर संवैधानिक व्यवस्था कहती है कि कानून-व्यवस्था का मामला राज्य सरकारों के नियंत्रण में होता है। सो जवाबी हमले की कार्रवाई दो साल पहले धीरे-धीरे शुरू हुई, अब यह एक शक्ल ले चुकी है और आगे और मजबूत होगी। यानी ‘पिक्चर अभी शुरू हुई है’।

यह कहना मुश्किल है कि इसका इलहाम सबसे पहले किसे हुआ, लेकिन इस चाल के लिए पुराने खिलाड़ी शरद पवार को श्रेय दिया जा सकता है। हालांकि पश्चिम बंगाल ने कुछ हद तक प्रतिकार का संकेत तो पहले ही दे दिया था। अगस्त 2020 में जब सुशांत सिंह राजपूत की मौत का मामला सीबीआई को सौंप दिया गया तो ‘तीन तरफा’ युद्ध का मुकम्मल रूप सामने आने लगा था।

इस युद्ध की थलसेना, नौसेना, वायुसेना के रूप में एजेंसी, टीवी चैनल और सोशल मीडिया उस आंतरिक एकजुटता के साथ हमलावर हो रहे थे, जिस एकजुटता की अपनी सेनाओं में कमी आज पुतिन को यूक्रेन युद्ध में खल रही है। लेकिन राज्य सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर प्रतिकार के कुछ पहले संकेत उभरे। अपने कुछ युवा रिपोर्टरों की मदद से मैंने इस प्रतिकार का संक्षिप्त ब्योरा तैयार किया है। इसकी शुरुआत हम महाराष्ट्र से कर रहे हैं।

राजपूत की मौत के मामले को जब सीबीआई को सौंप दिया गया तब राज्य सरकार ने राज्य में मामलों की जांच सीबीआइ से कराने की आम सहमति वापस ले ली। जल्द ही दूसरे गैर-भाजपा शासित राज्यों ने भी यही किया। एमवीए सरकार ने उस टीवी एंकर को सीधा निशाना बनाया, जो राजपूत मामले में सबसे ज्यादा शोर मचा रहे थे। अंबानी के निवास ‘एंटीला’ के मामले में केंद्र ने राज्य की पुलिस पर विफल होने का आरोप लगाकर उस मामले की जांच एनआईए को सौंप दी।

राज्य सरकार ने इसका जवाब दादरा व नागर हवेली के सांसद मोहन डेलकर की मौत और उसमें भाजपा की ‘भूमिका’ की जांच के लिए एसआईटी का गठन करके दिया। यह टकराव और तेज हुआ। पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी रश्मि शुक्ल द्वारा फोन की निगरानी रखे जाने का आरोप लगाते हुए पोस्टिंग व तबादले में रिश्वतखोरी के आरोपों की जांच की मांग की। महीने के शुरू में राज्य पुलिस ने शुक्ल के खिलाफ 700 पेज का आरोप पत्र दर्ज किया।

ताजा मामला भाजपा समर्थक सांसद नवनीत राणा और उनके विधायक पति रवि राणा को मुख्यमंत्री निवास के आगे हनुमान चालीसा का पाठ करने की धमकी देने के आरोप में गिरफ्तार किए जाने का है। इस बीच, महाराष्ट्र में शाहरुख खान के बेटे की बेमानी गिरफ्तारी के अलावा और भी बहुत कुछ हुआ है। लेकिन यह एक ही राज्य में सीमित नहीं है। बंगाल और राजस्थान में भी यही कहानी दोहराई गई।

ताजा मामला पंजाब की ‘आप’ सरकार का है, जिसने कांग्रेस नेता अलका लांबा, भाजपा नेता तेजिंदर पाल सिंह और ‘आप’ के बागी कुमार विश्वास के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई। यह जोर-आजमाइश जब चरम पर पहुंचेगी, तब हमारा ‘फुल मनोरंजन’ होगा। इसकी वजह यह है कि सभी राज्यों की पुलिस आरोप-पत्रों में मनगढ़ंत किस्से लिखने में माहिर है, लेकिन पंजाब पुलिस की रचनात्मकता का मुकाबला शायद ही कोई पुलिस करे।

आपसी गिरफ्तारी पर मुकम्मल सहमति
गैर-भाजपा राज्य सरकारें अब उन्हीं मारक हथियारों का इस्तेमाल करने लगी हैं, जिनका इस्तेमाल केंद्र सरकार उनके खिलाफ करती रही है। ‘एमएडी’ यानी ‘म्युचुअली एश्योर्ड डिटेंशन’ सिद्धांत भारत की संघीय राजनीति में विकास की ओर अग्रसर है। तुम हमारे एक आदमी को जेल भेजोगे, हम तुम्हारे दो आदमियों को जेल भेजेंगे। यानी आपसी गिरफ्तारी को लेकर मुकम्मल सहमति।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)