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शेखर गुप्ता का कॉलम:कृषि कानूनों की वापसी से मिले कुछ सबक; बिना विचार-विमर्श के, बिना बहस के आप बड़े फैसले नहीं कर सकते

15 दिन पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, दि प्रिंट - Dainik Bhaskar
शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, दि प्रिंट

तीन नए कृषि कानूनों को रद्द करने की घोषणा करके मोदी सरकार ने सही कदम उठाया है। लंबे समय से चल रहे झगड़े को सुलझाने का यही एक रास्ता था, लेकिन इससे यह तथ्य नहीं बदल जाता कि इन कृषि कानूनों से सुधार और किसानों का भला होता। यह तथ्य भी नहीं बदल जाता कि ये कानून शुरू से ही निष्प्राण और परस्पर विरोधी थे।

लोकतंत्र में यह मायने नहीं रखता कि किसी नीति के बारे में शासक कितने आश्वस्त हैं कि वह जनता के हित में है। 2020 की गर्मियों में जब यह सुधारवादी कदम उठाया गया था तब किसी को इसकी जरूरत नहीं महसूस हो रही थी। विपक्ष नदारद था। मीडिया कुल मिलाकर विरोधी नहीं था। इन सुधारों के समर्थक जिनमें यह लेखक भी शामिल था, कह रहे थे कि संकट का लाभ उठाना चाहिए। सो, संसदीय प्रक्रियाओं की बारीकियों की चिंता क्यों की जाए?

शुरू के कुछ सप्ताहों के अंदर ही साफ हो गया कि किसी ने पहले से तैयारी करने, विपक्ष या अपने सहयोगियों (मसलन शिरोमणि अकाली दल) के साथ ही मिलकर आम सहमति बनाने या इन बदलावों से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले लोगों को राजी करने की जहमत नहीं उठाई थी। बिना विचार-विमर्श के, बिना बहस के आप बड़े फैसले नहीं कर सकते।

कृषि कानूनों के मामले में पहली बड़ी गलती यह की गई कि उन्हें अध्यादेश के रूप में लाया गया। अध्यादेश जारी कर दो तो उसके बाद इसे कानून बना देना एक औपचारिकता रह जाती है। इसका अर्थ होता है कि संसद की मंजूरी निश्चित हो जाती है और बहस महज किताबी बनकर रह जाती है।

यह सब ऐसे मसलों में तो चल सकता है, जिन पर पहले से व्यापक सहमति हो या जो कम लोगों को प्रभावित करते हों लेकिन जब कृषि जैसे राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मसले को उठा रहे हों जिससे करीब आधी आबादी सीधे प्रभावित होती हो, वैसे मसले को क्या अध्यादेश के जरिए ही निबटाना जरूरी है? खेती के मामले में यह सब नहीं चलता। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते हुए ही सख्त होती है।

हरित क्रांति से पहले पांच साल तक उसके लिए जमीन तैयार की गई थी, किसानों से सीधा संवाद करके उन्हें समझाया-बुझाया गया था। उस क्रांति के विचार के देसी प्रचारक उभरे और उन्होंने किसानों को समझाया। अब हम तीन अध्यादेशों के जरिए रातोंरात उनकी आदतों और अर्थव्यवस्था को बदल डालना चाहते हैं।

हरित क्रांति 53 साल पहले आई थी। उसने अपना काम पूरा कर दिया है, ये पंजाब से समझ आता है। अगर नए कृषि कानूनों का सबसे प्रबल विरोध उस राज्य में हो रहा है जिसे इनकी सबसे ज्यादा जरूरत है तो इससे यही साबित होता है कि सुधारक ने पूर्व-तैयारी नहीं की।

बीजेपी ने आंतरिक बहस या असहमति को इस कदर उपेक्षित कर दिया है कि कोई भी यह समझने या मानने को तैयार नहीं था कि पूरे उत्तर भारत में ‘मोदी का जादू’ जिस राज्य पर नहीं चला वह पंजाब ही क्यों है। सिखों को समझने की गहरी अक्षमता ने मामले को और पेचीदा बना दिया। जब देखा कि किसान रास्ते पर नहीं आ रहे बल्कि दिल्ली की घेराबंदी करके अवज्ञा कर रहे हैं तब बदनाम करने और साजिश के झूठे आरोप लगाने की मुहिम शुरू कर दी गई। तब तक, नए कृषि कानूनों की पैरोकारी का समय निकल चुका था।

एक तो पंजाब को समझ पाने में बीजेपी की अक्षमता, इसके साथ इस तथ्य की उपेक्षा भी कि दिल्ली के पास एक बड़ा तबका है, जो आंख मूंद कर चलने को तैयार नहीं हैं। दूसरे, संसद के प्रति सम्मान की कमी भी। एक अध्यादेश उछाल दो और उसे राज्यसभा से जबरन मंजूर करवा लो, इसे पूरे देश ने देखा।

इसे एक किसान बनकर देखिए, जो न केवल अपने पारंपरिक व्यवसाय बल्कि दो पीढ़ियों वाली जीवनशैली में किए जा रहे इस नाटकीय बदलाव के प्रति सबसे शंकालु और अनजान है। वह सोचता है कि ऐसा दावा किया जा रहा है यह सब उसके लिए हो रहा है, लेकिन संसद के दोनों सदनों में इस पर बहस और वोटिंग देखने की सुविधा तक नहीं है?

बीजेपी ने अपने कदम वापस खींचने का यह दूसरा बड़ा फैसला किया है। नया भूमि अधिग्रहण विधेयक भी बिना पूर्व-तैयारी और बिना आम सहमति बनाए लाया गया था। 2019 के बाद से संसद ने कानून बनाने की ऐसी अफरातफरी खूब देखी है। उदाहरण के लिए, अनुच्छेद 370 और कश्मीर के विशेष दर्जे को लेकर किए गए फैसले को अचानक एक सुबह संसद में लाया गया।

शाम तक सब कुछ वैसे ही खत्म कर दिया गया जैसे भारतीय क्रिकेट टीम ने टी-20 विश्वकप में स्कॉटलैंड को 39 गेंदों में निबटा दिया था। कश्मीर मसले पर विपक्ष बंटा हुआ था, राष्ट्रीय जनमत पक्ष में था, कश्मीर और कश्मीरी बहुत अलग थे। इसके बाद आया नागरिकता कानून (सीएए) जिसके साथ एनआरसी का शोर भी शामिल था। लेकिन इससे बीजेपी को कुछ हासिल नहीं हुआ।

इस सबके बावजूद वह पश्चिम बंगाल हार गई और अब अपने सबसे अहम, करीबी और दोस्ताना पड़ोसी बांग्लादेश के साथ रिश्ते संभालने के लिए जोड़-तोड़ करनी पड़ रही है। अब सीएए भी मृतप्राय है। आप इस तरह का कोई कानून बनाकर खाड़ी के अरबों और बांग्लादेश से दोस्ती की भी उम्मीद नहीं रख सकते हैं। एक बार मामला जब पार्टी के हित और राष्ट्रीय हित के अहम पहलुओं का हो, तब कदम वापस खींचने के सिवा कोई रास्ता नहीं रह जाता।

आर्थिक सुधारों के मामले में भी हम दो बड़ी कदम-वापसी देख चुके हैं। हालांकि उन फैसलों का हम संपादकीय रूप से समर्थन कर चुके हैं। संसद द्वारा एक साल पहले पारित नए श्रम कानूनों को अभी तक अधिसूचित नहीं किया गया है। लघु बचत की सरकारी योजनाओं के लिए बाज़ार की स्थितियों के मद्देनजर ब्याज दरें कम करने के फैसले को वापस ले लिया गया है।

यह समझना होगा कि लोकतंत्र में संसदीय बहुमत होने के बावजूद अपनी सीमाएं हैं। दूसरा आपका चाहे कितना भी वर्चस्व क्यों ना हो भारत राज्यों का संघ है और 28 में से सिर्फ 12 राज्यों में आपके मुख्यमंत्री सत्ता में हैं। इसका अर्थ यह है कि भारत का बड़ा दायरा ऐसा है जो बिना सवाल उठाए आपके पीछे नहीं चल रहा है। राज्यों को साथ लिए बिना इसके बुनियादी ढांचे में परिवर्तन करेंगे तो विरोध होगा ही। अंतिम सबक सबसे महत्वपूर्ण है। यह एक महाद्वीपीय आकार के विविधतापूर्ण और संघीय व्यवस्था वाले देश को किसी राज्य के मुख्यमंत्री की तरह चलाने के खतरे से जुड़ा है।

हमारे अधिकतर राज्यों में विधानसभाओं के सत्र आनन-फानन चलाए जाते हैं, बहस नहीं होती, मुख्यमंत्री तानाशाह की तरह व्यवहार करते हैं। ये सभी दलों के रोग हैं। क्या इन सबसे कोई सबक लिया जाएगा? हम नहीं जानते। स्मार्ट लोग आम तौर पर जीत से ज्यादा हार से सबक सीखते हैं लेकिन हमने अब तक जो होते देखा है उसके कारण इसकी संभावना यहां कम ही नजर आती है।

अध्यादेश लाना बड़ी गलती
कृषि कानूनों के मामले में पहली बड़ी गलती यह की गई कि उन्हें अध्यादेश के रूप में लाया गया। अध्यादेश जारी कर दो तो उसके बाद इसे कानून बना देना एक औपचारिकता रह जाती है। यह सब ऐसे मसलों में तो चल सकता है, जिन पर पहले से व्यापक सहमति हो या जो कम लोगों को प्रभावित करते हों लेकिन जब कृषि जैसे राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मसले को उठा रहे हों जिससे करीब आधी आबादी सीधे प्रभावित होती हो, वैसे मसले को क्या अध्यादेश के जरिए ही निबटाना जरूरी है?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)