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शशि थरूर का कॉलम:कहीं ‘मोदित्व’ हमारे स्वायत्त संस्थानों को खत्म न कर दे

4 महीने पहले
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शशि थरूर, पूर्व केंद्रीय मंत्री - Dainik Bhaskar
शशि थरूर, पूर्व केंद्रीय मंत्री

क्या भारत का लोकतंत्र खतरे में है? या फिर भारत पहले ही लोकतांत्रिक नहीं रहा? पांच राज्यों में सफल चुनावों के बाद यह सवाल अजीब लग सकता है। ये चुनाव लगभग पूरी स्वतंत्रता और निष्पक्षता से हुए और केवल एक राज्य में भाजपा जीती। फिर भी, अगर अमेरिकी थिंक-टैंक ‘फ्रीडम हाउस’ की वार्षिक रिपोर्ट पढ़ें, जिसमें भारत को ‘स्वतंत्र’ के स्थान पर ‘आंशिक स्वतंत्र’ कहा गया है या स्वीडन के प्रतिष्ठित वी-डेम संस्थान की मानें, जिसने भारत को ‘चुनावी तानाशाही’ बताया है, तो दुनिया के लोकतंत्रों में हमारा कद गिरता जा रहा है। चुनाव लोकतांत्रिक हो सकते हैं, लेकिन सच्चा लोकतंत्र वह है जो चुनावों के बीच होता है।

वर्ष 2014 में, जब से यह सरकार सत्ता में आई है, हमने हमारे स्वायत्त संस्थानों की स्वतंत्रता को उच्च स्तर पर कमजोर होते देखा है। फिर वह रिजर्व बैंक जैसा वित्तीय नियामक हो या केंद्रीय सूचना आयोग जैसा जवाबदेही वाला संस्थान। यहां तक कि अब तक अलंघनीय माने जाने वाले चुनाव आयोग और सैन्य बलों के उच्च स्तरीय विभागों तक पर सवाल उठने लगे हैं। अब संसद, न्यायपालिका और यहां तक कि प्रेस को भी सरकार के प्रभाव से मुक्त नहीं माना जाता।

इनके प्रणालीगत ढंग से टूटने के एक कारण की जड़ मोदित्व सिद्धांत और इसके सत्ता के सहज निरंकुश केंद्रीकरण में है। मोदित्व आरएसएस के हिंदुत्व के राजनीतिक सिद्धांत में निहित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को व्यक्त करता है, लेकिन उस पर शक्तिशाली और निर्णायक मजबूत नेता के विचार का भी निर्माण करता है, जो राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करे।

स्वायत्त जन संस्थान मोदित्व सिद्धांत के लिए खतरा हैं क्योंकि वे अपने स्वरूप में स्वतंत्र हैं। उनके अधिकार को कमजोर करने के लिए ही ‘राष्ट्रवादी’ तर्क को बढ़ाया गया कि विपक्ष और मत विरोधी परिभाषा से देशद्रोही हैं। डर यह है कि जातीय-राष्ट्रवाद भारत को ‘डिक्टोक्रेसी’ के अजीब मिश्रण की ओर ले जा रहा है, जो एक ओर डेमोक्रेसी के स्वरूपों का संरक्षण करती है, वहीं अपने आदेशों के खिलाफ कोई मतभेद भी बर्दाश्त नहीं करती।

अगर भारतीय शासन का अ-संस्थानीकरण ऐसे ही चलता रहा, तो भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा यह होगा कि लोगों का व्यवस्था पर से विश्वास उठेगा। ऐसा दुनिया के कई हिस्सों में होने लगा है। बहुचर्चित पेपर में हार्वर्ड के अध्येता याशा माउंक व रॉबर्टो फोआ तर्क देते हैं कि दुनिया में उदारवादी लोकतंत्रों की सेहत खराब हो रही है। वैश्विक डेटा के मुताबिक लोकतंत्र को समर्थन कमजोर हुआ है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर अधीरता बढ़ी है, खासतौर पर मिलेनियल्स में (80 के दशक के बाद पैदा हुए)।

वास्तव में, कई लोकतंत्रों में शासन के गैर-लोकतांत्रिक या अधिकारवादी स्वरूपों को समर्थन बढ़ा है। माउंक-फो के डेटा के अनुसार भारत की स्थिति बुरी है। करीब 70 फीसदी भारतीय उत्तरदाताओं को लगा कि ‘एक मजबूत नेता, जिसे संसद या चुनावों की परवाह न हो, वह देश चलाने के लिए अच्छा है’।

सीएसडीएस-अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के हालिया सर्वे में चार बड़े राज्यों के 50 फीसदी उत्तरदाताओं ने मौजूदा लोकतंत्र की तुलना में अधिकारवादी विकल्प को प्राथमिकता दी। जहां भारत सरकार के कई समर्थकों के लिए सिर्फ स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों का हो जाना ही पर्याप्त बचाव है, वहीं लोकतंत्र तभी फल-फूल सकता है, जब तंत्र संतुलन बनाए रखे, सहमति को प्रोत्साहित करे और संस्थागत स्वायत्तता को सुनिश्चित करे। वरना हम एक और ‘अनुदार लोकतंत्र’ बन जाएंगे।

महान जेपी तर्क देते थे कि लोकतंत्र सिर्फ भेड़ों की भीड़ नहीं है, जो हर पांच साल में अपना चरवाहा चुनती है। भारत के लोगों का व्यवस्था में विश्वास तभी रहेगा, जब यह निष्पक्षता से काम करे। अगर उनका विश्वास कमजोर हुआ तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होगी। राजनीतिक दल और सत्ताएं आती-जाती रहेंगी, लेकिन स्वतंत्र संस्थान किसी भी लोकतंत्र के स्थायी स्तंभ हैं। उनकी स्वतंत्रता, ईमानदारी और पेशेवर रवैया, उन्हें किसी भी राजनीतिक दबाव को सहने के लिए मजबूत बनाते हैं। हम मोदित्व को उन्हें खत्म न करने दें।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)