• Hindi News
  • Opinion
  • Stethoscope, Bioscope And Film 'Dhobi Doctor', Some Doctors Have Made Films, This Is How The Talent Cycle Revolves

जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:स्टेथोस्कोप, बायोस्कोप और फिल्म ‘धोबी डॉक्टर’, कुछ डॉक्टरों ने फिल्में बनाई हैं, प्रतिभा चक्र ऐसे ही घूमता है

8 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

ग्रामीण क्षेत्र में महामारी प्रवेश कर चुकी है। अनगिनत गांवों में बिजली नहीं है। ‘लगान’ फिल्म के लिए प्रसिद्ध आशुतोष गोवारिकर की फिल्म ‘स्वदेश’ में एक विदेश में बसा सफल-समृद्ध व्यक्ति अपने जन्म स्थान पर आकर अपनों की सहायता करना चाहता है। वह गांव के लोगों के श्रम और अपनी योग्यता से गांव के लोगों के लिए बिजली लाने में सफल होता है।

एक केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जान बचाने वाली दवा की कालाबाजारी हो रही है। ऑक्सीजन सिलेंडर क्यों फट रहे हैं? मानो अंधे द्वारा अपने-अपनों को रेवड़ी बांटने का विरोध कर रहे हों। डॉ. ए.जे क्रोनिन के उपन्यास ‘सिटेडल’ से प्रेरित फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’ विजय आनंद ने बनाई थी। सिटेडल का शाब्दिक अर्थ होता है ‘किला’।

किले पर खड़े होकर लंबी-चौड़ी फेंकने वाले जमीनी हकीकत से परिचित हैं, परंतु अव्यवस्था को लंबे समय तक अनदेखा करने को वे उपचार मानते हैं। बहरहाल ‘सिटेडल’ में एक उम्रदराज डॉक्टर, सेवानिवृत्त होने के बाद गांव में अपना क्लीनिक खोलता है। उम्रदराज डॉक्टर, दो युवा डॉक्टरों को नौकरी पर रखता है। देवानंद अभिनीत डॉक्टर को गांव की एक कन्या से प्रेम हो जाता है।

एक दिन गर्भवती कुछ सामान ले जाती है। एक अमीरजादे की कार उसे टक्कर मारती है। उसका गर्भपात हो जाता है। उसका डॉक्टर पति अमीरजादे पर मुकदमा कायम करता है। अमीरजादे का बाप गवाह खरीद लेता है। उसी समय शहर से डॉक्टर का एक दोस्त आता है, जिसकी प्रेरणा और पहल से देवानंद महानगर में डॉक्टरी करता है। कुछ ही दिनों में वे धन एवं प्रसिद्धि प्राप्त कर लेता है। अब उसके पास सबकुछ है परंतु इसी आपाधापी में वह अपनी पत्नी को नजरअंदाज करने लगता है। हेमा मालिनी अभिनीत एक सितारा नैराश्य में घिरी है। डॉक्टर देवानंद के इलाज से उसे लाभ होता है।

इस सफलता ने डॉक्टर को रोगी बना दिया है। एक दिन विजय आनंद अपने मित्र से मिलने आता है। वह एक ही नजर में देवानंद की पत्नी का एकाकीपन और व्यथा समझ लेता है। उसे आराम करने को कहता है और खुद ड्राइंग रूम की रोशनी बंद करके इंतजार करता है। सफलता के नशे में गाफिल डॉ. देवानंद लौटता है, तो डॉ. विजय आनंद कहता है कि रोशनी मत करना क्योंकि उजाले में वह हकीकत सह नहीं पाएगा और शायद विजय आनंद कह नहीं पाएगा। यह अंधेरा और उजाला बाहर नहीं है। यह लक्ष्य से भटकना और पुन: मार्ग पर लाने का प्रयास है।

फिल्म के क्लाइमैक्स में देवानंद की गर्भवती पत्नी को बहुत पहले हुए गर्भपात के कारण कुछ उलझने खड़ी हो जाती हैं। दोनों डॉक्टर मिलकर शल्य क्रिया द्वारा बच्चे को जन्म देने में सहायता करते हैं। ‘ऑल इज वेल’ मंत्र काम आता है। सिटेडल से प्रेरित फिल्म अंग्रेजी भाषा में बनी है, परंतु विजय आनंद का अंदाज ए बयां कुछ और है।

ग्रामीण क्षेत्र में शहरी बहुमंजिले अस्पताल की आवश्यकता नहीं है। जमीन ही बता देती है कि वहां, कहां कैसी इमारत टिकाऊ होगी। आज ना तो जमीन की आवाज सुनी जा रही है और ना ही जमीर की। प्रशिक्षित डॉक्टरों की कमी है। ग्रामीण क्षेत्र में महामारी कितना नुकसान करेगी, लुंज व्यवस्था चमत्कार की कामना ही कर सकती है। कहीं कोई जादू की छड़ी नहीं है और ना ही प्यार की झप्पी आज आरामदायक हो सकती है। बिमल रॉय की किशोर कुमार अभिनीत फिल्म ‘धोबी डॉक्टर’ में गांव में अस्पताल के अभाव में कन्या मर जाती है। उसका भाई परिश्रम करके डॉक्टर बनता है और शहर में ऊंचे वेतन का प्रस्ताव स्वीकार करके गांव में अस्पताल खोलता है। कुछ साहित्यकार डॉक्टर रहे हैं, जैसे ‘सॉमरसेट मॉम’, कुछ डॉक्टरों ने फिल्में बनाई हैं जैसे पूना के डॉक्टर जब्बार पटेल ने ‘जैत रे जैत’ बनाई। प्रतिभा चक्र ऐसे ही घूमता है।

खबरें और भी हैं...