नवनीत गुर्जर का कॉलम:एक बच्ची की कहानी, जिसने मां के साथ ईश्वर भी खो दिया

5 महीने पहले
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नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर - Dainik Bhaskar
नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

कोविड के कारण जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को मुआवज़ा देने से सरकारें इनकार कर रही हैं। कह रही हैं - हम आगे की रणनीति पर पैसा खर्च करना चाहते हैं। ठीक है, सरकारें ही सही होंगी, लेकिन पीड़ा इससे भी बड़ी है। पढ़िए एक नौ बरस की बच्ची की कहानी, उसी की ज़ुबानी, जिसने मां के साथ अपना ईश्वर भी खो दिया…

मैं छोटी सी थी। नौ बरस की। बच्ची-सी। पिता घोर ईश्वरवादी हैं। मां भी थी। एक दिन मां अचानक बीमार पड़ गई। चीखें मारती। बड़ा दर्द था। आस-पड़ोस, रिश्ते-नातेदार कोई नहीं आया। सिर्फ मैं, पिता और मां की सहेली, मेरी मौसी-सी, घर में थे। मां की चीखें सुन मौसी ने मुझसे कहा- तू ईश्वर का नाम ले… कौन जाने उसके मन में दया आ जाए! वो बच्चों का कहा नहीं टालता। मां चीख रही थी और मैं आंखें मींचकर ईश्वर से कह रही थी- मेरी मां को मत मारना।

कुछ देर बाद मां की चीखें बंद हो गईं। मैंने सोचा- ईश्वर ने मेरी सुन ली। वो बच्चों की बात नहीं टालता। लेकिन कुछ ही देर में देखा कि मां की चीखें बंद होते ही बाक़ी लोगों की चीखें निकल गईं। मां मर चुकी थी। जब मुझे यह बात बताई गई तो मेरा रोष उबल पड़ा। मैंने कहा- ईश्वर किसी की नहीं सुनता। बच्चों की भी नहीं।

यह वह दिन था, जिसके बाद मैंने अपना वर्षों का नियम तोड़ दिया। ईश्वर का पाठ करने की पिताजी की बात भी नहीं मानी। पिता कठोर थे। लेकिन मैं भी ज़िद कर बैठी। जैसे ही उन्होंने कहा- ईश्वर का पाठ कर। मैंने कहा- ईश्वर कोई नहीं होता! फिर लंबी बहस हुई… पिता- ऐसा नहीं कहते! मैं- क्यों? पिता- ईश्वर नाराज़ हो जाता है। मैं- तो हो जाए! मैं जानती हूं, ईश्वर कोई नहीं होता! पिता- तू कैसे जानती है? मैं- अगर वो होता, तो मेरी बात सुनता! पिता- तूने उससे क्या कहा था? मैं- मैंने उससे कहा था- मेरी मां को मत मारना! पिता- तूने उसे कभी देखा है? वो दिखाई थोड़े ही देता है। मैं- हां तो क्या उसे सुनाई भी नहीं देता!

आख़िर एक-दो दिन बीते, कि पिता का गुस्सा फिर उबल पड़ा। मैं बच्ची-सी। मेरी उनके आगे एक न चली। उन्होंने मुझे आलथी-पालथी मारकर बैठा दिया। कहा-दस मिनट ईश्वर का चिंतन कर। मैंने आंखें मींच लीं। पर पिता के सामने अपनी हार को अपना रोष बना लिया। रोज आलथी-पालथी मारकर आंखें मींच लेती, पर चिंतन नहीं करती।

ईश्वर कौन मेरे पिता को बताने आने वाला है कि मैंने चिंतन किया या नहीं! आख़िर वो किसी की सुनता कहां है! हो सकता है, सरकारें भी खुद को ईश्वर मानती हों। वे ईश्वर होंगी भी। क्योंकि वे भी किसी की नहीं सुनतीं। बच्चों की तो बिलकुल नहीं।