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रीतिका खेड़ा का कॉलम:निगरानी लोकतंत्र को दीमक की तरह खोखला कर देती है; हैकिंग निगरानी का यंत्र है, पारदर्शिता नहीं

3 दिन पहले
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रीतिका खेड़ा; अर्थशास्त्री, दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं - Dainik Bhaskar
रीतिका खेड़ा; अर्थशास्त्री, दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं

इजरायल की एक निजी कंपनी, एनएसओ, ने पेगासस नामक हैकिंग सॉफ्टवेयर बनाया है, जिसे वह केवल अन्य देश की सरकारों को बेचती है (निजी कंपनी या व्यक्ति को नहीं)। यह सॉफ्टवेयर आपके जाने बिना, आपके फोन से 24 घंटे जानकारी भेजता रहता है। फोन से कॉन्टैक्ट, फोटो, मैसेज, इत्यादि सरकारी एजेंसी से साझा होते रहते हैं, जब तक वह फोन आप इस्तेमाल करेंगे। यह सॉफ्टवेर फोन के हार्डवेयर को प्रभावित करता है, न कि फोन में डाले गए ऐप को।

ज्यादातर हैकिंग के मामलों में जिस व्यक्ति का फोन टारगेट होता है, वह भूल से ही सही, किसी के द्वारा भेजी गई लिंक या मैसेज पर क्लिक कर देता है। पेगासस फोन को बिना इस सबके भी संक्रमित कर सकता है। जबसे इस कांड की जानकारी आई है, किसका फोन प्रभावित हुआ, यह चर्चा का महत्वपूर्ण बिंदु रहा है। पेगासस बनाने वाली कंपनी का कहना है कि वह सॉफ्टवेर सरकारी ग्राहकों को देती है और वह भी केवल जुर्म और आतंक के खिलाफ इस्तेमाल के लिए। लेकिन भारत में पक्ष-विपक्ष, सरकारी अधिकारी, मीडिया, मानव अधिकार पर काम करने वाले लोगों के नाम शामिल हैं। वास्तव में जब कंपनी माल बेच देती है, उसके बाद उसका इसपर अख्तियार नहीं कि ग्राहक उसे किस तरह इस्तेमाल करता है।

कई लोगों का कहना है, किसी का फोन इस तरह से हैक करने में दिक्कत क्या है? ज़रूर उनके पास कुछ छिपाने लायक बात होगी, वरना उन्हें ऐतराज़ क्यों होता? यह कुतर्क है। क्या आप अपने ईमेल का पासवर्ड सबको बताते हैं? यदि नहीं, तो क्या आप कुछ छिपाने लायक काम करते हैं? ज़िंदगी के हर दायरे में हम तय करते हैं कि किसके साथ, क्या साझा करेंगे। यह बदलता भी रहता है। आज अपने काम के बारे में किसी सहकर्मी से शेयर करते हैं, कल उसका पद बदलने पर शायद न करना चाहें।

मूल बात यह है कि किसे क्या बताना है, इस पर नियंत्रण आपके हाथों में है। इस नियंत्रण के अपने हाथों से निकल जाने पर हम बेबस, लाचार हो जाते हैं। और हैकिंग सॉफ्टवेयर के अटैक से यही सबसे बड़ी दिक्कत है। आपकी बातें, आपके फोटो, किस दिन, किस से कितनी बात की, यह सब आपकी अनुमति के बगैर, आपकी जानकारी के बगैर, किसी सरकार की एजेंसी के लोगों तक पहुंच जाती है। एक तरह से आप खुद को नग्न महसूस करते हैं, जिससे आपकी गरिमा का भी सवाल उठता है।

सार्वजनिक ज़िंदगी बिताने वाले, चाहे नेता हो या पत्रकार, जज या चुनाव आयोग के कमिशनर, सभी लोगों के प्रति जवाबदेह हैं। लेकिन जवाबदेही के लिए पारदर्शिता चाहिए। हैकिंग निगरानी का यंत्र है, पारदर्शिता नहीं। जब उनका फोन हैक होता है, तो उनकी निजी ज़िंदगी की जानकारी का, उन्हें काबू में रखने में इस्तेमाल हो सकता है। मसलन, यदि किसी सरकारी मुलाज़िम या पत्रकार को होम लोन की ज़रूरत है और हैकर (इस किस्से में सरकार हैकर है) को यह जानकारी मिल जाए तो वह इसके आधार पर उन्हें मदद देने का वादा करके, अपने पक्ष में खबर करवा सकते हैं, निर्णय दिलवा सकते हैं। यदि आपने दोस्त से, बॉस की बुराई की हो, तो इस जानकारी को आपके खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है।

पेगासस कांड की वजह से यह चर्चा हो रही है। लेकिन इसके अलावा निगरानी के कई यंत्र है। गूगल, वॉट्सएप, फ़ेसबुक, यह सब गुप्त तरीके से हमारी जानकारी प्राप्त करते हैं, इससे मुनाफ़ा कमाते हैं (आपकी पसंद-नापसंद के आधार पर विज्ञापन दिखाकर) और कभी-कभी आपकी जानकारी सरकार के साथ साझा करते हैं। सबसे भयावह बात यह है कि निजी कंपनियों का मुनाफ़ा नागरिकता और लोकतंत्र को कमज़ोर करने से कमाया जा रहा है।

जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र सोच और काम अहम है। ऐसी निगरानी से यह बुरी तरह प्रभावित होते हैं। निगरानी से शासन-अनुशासन, प्रजा-नागरिक, जवाबदेही-गुलामी की रेखा मिटने लगेगी। जवाबदेही लोकतंत्र को मज़बूत बनाती है और निगरानी दीमक की तरह खोखला कर देती है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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