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नवनीत गुर्जर का कॉलम:व्यवस्था की कहानियां, भावनाओं के तबादले; मौजूदा व्यवस्था भावनाओं के शून्य की प्रतीक

9 दिन पहले
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नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर - Dainik Bhaskar
नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

बेमुरव्वत व्यवस्था की कहानियां सोने की लंका जैसी ही हैं। हर जगह आग भी लगती है। लंका जलाई भी जाती है, लेकिन कहा यही जाता है कि सोने में निखार आ रहा है। दरअसल, मौजूदा व्यवस्था एक ऐसी संस्कृति है जिसमें रिश्तों का, भावनाओं का, काया का अपमान इन तमाम शब्दों से अनजान रहते हुए किया जाता है।

कुल मिलाकर मौजूदा व्यवस्था भावनाओं के शून्य की प्रतीक है।...और जहाँ भावनाएं नहीं होतीं, अपमान के सिवाय कुछ नहीं होता।...जैसे कोई आप से कितना भी कहे कि क्रोध करो, लेकिन जब तक आपकी आंखें सुर्ख़ न हो जाएं। मुट्ठियां भिंचने न लगें, आप क्रोध नहीं कर पाएंगे। इसी तरह जैसे कोई आपसे कितना भी कहे कि प्रेम करो, लेकिन जब तक आपकी आँंखों से अमृत न बरसे, दिल की धड़कनों से संगीत न गूंजे और सांसें महकने न लगें, तब तक आप प्रेम नहीं कर पाएंगे।

दरअसल, भावनाएं आंखों में आ जाती हैं। शरीर से, काया से भी प्रकट होने लगती हैं। भावनाएँं काया का स्वीकार हैं जिन्हें अंतर के रूपांतरण के लिए साथ लेकर चलना होता है। ... इसी स्वीकार से काया सम्मानित होती है। काया को जब यह सम्मान नहीं मिला तो अपमान के रास्ते बनते चले गए...। सामने समाज का मार्ग आया तो एक ऐसा वर्ग सामने आया जिसने खुद कुबेर बनने के लिए बाकी लोगों की काया के अपमान का रास्ता खोज लिया। ...धर्म का मार्ग आया तो हर धर्म के कट्टरपंथियों ने मासूम खुशियां कुचलीं और काया के अपमान की राह खोज ली।

इसी तरह जब सामने सत्ता का मार्ग आया तो सत्ता ने लोगों के हाथों में तरह-तरह के हथियार देकर, उन्हें मौत का रास्ता दिखाते हुए काया के अपमान का रास्ता खोज लिया। अपनी काया का दमन भयग्रस्त हुए बिना हो नहीं सकता। ...और दूसरों की काया का दमन भयग्रस्त किए बिना नहीं हो सकता। सिर्फ नाम अलग-अलग होते हैं- दमन को दुनिया वाले कभी सरकार कहते हैं, कभी भ्रष्टाचार, तो कभी मौजूदा व्यवस्था का नाम देते हैं।

गुजरात की एक युवती ने मृत्यु शैय्या पर पड़े अपने पति का स्पर्म पाने के लिए हाईकोर्ट में गुहार लगाई। हाईकोर्ट ने युवती की भावनाओं को समझा, लेकिन अस्पताल ने इसे समझने में घंटों लगा दिए। हालांकि कोर्ट का आदेश था इसलिए बहुत देर से ही सही, अस्पताल ने इसे मान लिया लेकिन व्यवस्था द्वारा त्वरित न्याय किए जाने की बात कहीं पीछे रह गई। भावनात्मक मजाक हर तरफ किया जा रहा है। अलग-अलग रूप में। अलग-अलग समय पर।

दूसरी तरफ कोरोना की तीसरी लहर की चर्चा से सिर दर्द होने लगा है, लेकिन वैक्सीन की उपलब्धता दिवास्वप्न होती जा रही है। इतनी बलशाली सरकार यह व्यवस्था तक नहीं कर पा रही है कि राज्यों को वैक्सीन सतत मिलती रहे। हालात ये हैं कि लोग वैक्सीनेशन सेंटर पर जाते हैं और घंटों इंतजार करके लौट आते हैं। कुछ राज्यों ने तो बकायदा हफ्ते में दो दिन वैक्सीनेशन की छुट्टी प्लान कर दी है। वैक्सीन ही नहीं हैं तो आखिर किया क्या जाए? छुट्टी तो की ही जा सकती है। सो की जा रही है! भावनाओं के तबादले हर क्षेत्र में धड़ल्ले से जारी हैं।