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डॉ. वेदप्रताप वैदिक का कॉलम:तालिबान ने शपथ-समारोह में चीन, पाक को बुलाया, पर भारत को नहीं

17 दिन पहले
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, अफगान मामलों के विशेषज्ञ - Dainik Bhaskar
डॉ. वेदप्रताप वैदिक, अफगान मामलों के विशेषज्ञ

सारी दुनिया के लोग चकित हैं कि जिस पंजशीर घाटी ने अभी तक किसी का दबदबा स्वीकार नहीं किया, वह तालिबान के आगे ढेर कैसे हो गई? पंजशीर में लगभग एक लाख वे लोग रहते हैं, जो पठान नहीं हैं, जो पश्तो नहीं बोलते हैं और जिनके पठानों की तरह परस्पर प्रतिस्पर्धी कबीले नहीं हैं। ये लोग ताजिक हैं। फारसी बोलते हैं। अफगानिस्तान में बादशाह और प्रधानमंत्री किसी भी कबीले का रहा हो, प्रशासन के उच्चतम पदों पर प्रायः ताजिक लोग ही पाए जाते हैं।

इन ताजिकों की यह घाटी इनके किले जैसी है। काबुल से लगभग 150 किमी उत्तर में बसी घाटी पर न तो नूर मुहम्मद तरक्कई और हफीजुल्लाह अमीन काबू कर पाए और न ही बबरक कारमल और नजीबुल्लाह। इन कम्युनिस्ट शासकों और इनके पहले सरदार दाऊद खान (1973-78) से भी ये पंजशीरी योद्धा हमेशा लड़ते रहे। जब तालिबान का शासन (1996-2001) आया, तब भी पंजशीर स्वायत्त-सा बना रहा।

वास्तव में ताजिक समुदाय के लोग पठानों के मुकाबले अल्पसंख्यक हैं। इसीलिए उनमें एकता की भावना अधिक है। उन्हें अफगानिस्तान के पड़ोसी ताजिकिस्तान का समर्थन भी सहज रूप से मिलता है। अहमदशाह मसूद इसी ताजिकिस्तान में रहकर छापामार गतिविधियां चलाते रहते थे। अब भी अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति रहे अमरुल्लाह सालेह और अहमदशाह के बेटे अहमद मसूद भागकर ताजिकिस्तान चले गए हैं। यदि पाकिस्तान बागी पठानों को प्रश्रय देता रहा है तो ताजिकिस्तान अफगान ताजिकों की भरपूर मदद करता है।

इस बार पंजशीर घाटी पर तालिबानी कब्जे का श्रेय पाकिस्तान लूट रहा है। यों तो पंजशीर घाटी की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि कोई भी बाहरी फौज उसके अंदर सुरक्षित घुस ही नहीं सकती। अगर पैदल सेना अंदर घुसने की कोशिश करेगी तो पहाड़ियों पर खड़े ताजिक सैनिक उन पर इतने बम और गोलियां बरसाएंगे कि वे उन संकरे रास्तों में ही ढेर हो जाएंगे लेकिन हमारा अनुमान इस बार सही निकला कि तालिबान ने पाकिस्तानी फौज की मदद से इतने हवाई हमले किए कि घाटी पर उनका कब्जा हो गया। जिस तालिबान संगठन से ईरान संपर्क में है और उनकी सरकार को मान्यता देने भी तैयार है, वह पंजशीर घाटी पर हुए हमले से नाराज क्यों है? इसलिए कि पंजशीरी ताजिक फारसीभाषी हैं, हालांकि वे हजाराओं की तरह शिया नहीं हैं।

इस बार अशरफ गनी सरकार गिरने के बाद पाकिस्तान का रवैया काफी संतुलित दिखा। वह काबुल में सर्वसमावेशी सरकार की बात करता रहा है। अहमदशाह मसूद और पूर्व राष्ट्रपति बुरहानुद्दीन रब्बानी के कई साथियों से वह कई दिनों तक इस्लामाबाद में सलाह-मशविरा करता रहा है लेकिन आखिरकार उसने तालिबान को टेका लगाने के लिए अपने जासूसी मुखिया जनरल फैज हमीद को काबुल भेज ही दिया। दुनिया को बताया तो यह गया कि हक्कानी गिरोह और मुल्ला बिरादर के बीच फंसी फांस को निकालने के लिए उन्हें काबुल भेजा गया है लेकिन काबुल में बैठकर जनरल हमीद ने पंजशेरों का काम तमाम कर दिया है।

पंजशीर घाटी पर तालिबान का कब्जा उनके काबुल के कब्जे से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। हेरात और मजारे-शरीफ के गिरते ही हमने कहा कि काबुल और कंधार तो सूखे पत्ते की तरह झड़ जाएंगे लेकिन पंजशीर के गिरने पर माना जा रहा है कि पूरे अफगान पर तालिबान की एकछत्र पकड़ बन गई है। इस पकड़ को अमली जामा पहनाने में पाकिस्तान की जो भूमिका रही है, उसके कारण तालिबान की विदेश नीति में अब एक नए अध्याय का सूत्रपात हो गया है।

अब तक तालिबान के बयानों में कहा जाता रहा है कि नई सरकार सभी देशों से अच्छे संबंध चाहती है। तालिबान नेता रूस व अमेरिका जैसे देशों से भी अच्छे संबंधों की वकालत करते रहे हैं, जिनके हजारों सैनिकों को उन्होंने मार गिराया है और उन्होंने उस चीन की ओर भी मैत्रीपूर्ण हाथ बढ़ाया है, जिसने लाखों उइगर मुसलमानों को यातना-शिविरों में पटक रखा है लेकिन असली सवाल यह है कि भारत के साथ तालिबान के संबंध कैसे रहेंगे? बेशक तालिबानी नेता शेर मुहम्मद स्थानकजई खुद जाकर हमारे राजदूत दीपक मित्तल से दोहा में मिले।

तुर्कमेनिस्तान से ‘तापी’ गैस पाइपलाइन लाने का वादा किया और कश्मीर को भारत का आंतरिक मामला बताया। लेकिन दो बातों पर ध्यान दें। उन्होंने कश्मीरी मुसलमानों पर बोलने का हक जताया और तालिबान सरकार के शपथ-समारोह का निमंत्रण अभी तक भारत को नहीं भेजा। क्या हम मानें कि तालिबान पर अब पाकिस्तान की पकड़ बढ़ती जा रही है?

हमारी भूमिका कैसी है?
तालिबान के मामले में भारत की ‘बैठे रहो और देखते रहो’ की नीति कहीं ज्यादा जिम्मेदार है। तालिबान के प्रवक्ता ने भारत को दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण राष्ट्र कहकर उससे अच्छे संबंध बनाने की घोषणा भी की है लेकिन क्या हम अपनी भूमिका सही ढंग से निभा रहे हैं?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)